छुट्टियों का आनंद
गर्मी की छुट्टियाँ शुरू होते ही स्कूल का माहौल पूरी तरह बदल गया था। आखिरी घंटी बजते ही बच्चे चीखते-चिल्लाते बाहर निकल पड़े। राहुल भी उनमें से एक था। कक्षा सात का यह लड़का पूरे साल पढ़ाई में अच्छा था, लेकिन गर्मी की छुट्टियों का इंतजार उसे सबसे ज्यादा रहता था। इस साल उसकी दादी-नानी दोनों ने मिलकर एक प्लान बनाया था—गाँव जाना।
दिल्ली की तपती दोपहर में राहुल की माँ पैकिंग कर रही थीं। “बेटा, ज्यादा कपड़े मत ले जाना। गाँव में धूप तेज होगी,” माँ ने कहा। राहुल ने अपनी बैग में कुछ किताबें, क्रिकेट का बैट, और अपनी डायरी डाली। डायरी में वह हर साल छुट्टियों के अनुभव लिखता था। इस बार उसने पहले पन्ने पर लिखा—“गर्मी की छुट्टियाँ 2025: गाँव की यादें।”
ट्रेन की सीटी बजी। राहुल खिड़की से बाहर देख रहा था। खेत, पेड़, और छोटी-छोटी नदियाँ नजर आने लगीं। रात को जब ट्रेन रुकी, तो स्टेशन पर दादी और नानी दोनों खड़ी थीं। दादी ने गले लगाते हुए कहा, “आ गया मेरा राजा! पूरे दो महीने हमारे पास रहेगा।” नानी ने मिठाई का डिब्बा थमाया। घर पहुँचते-पहुँचते राहुल की आँखें झपकने लगी थीं।
सुबह की पहली किरण के साथ राहुल की आँख खुली। खिड़की से आम के पेड़ दिखाई दे रहे थे। नीचे आँगन में दादी दूध निकाल रही थीं। राहुल दौड़ा-दौड़ा नीचे गया। “दादी, क्या आज नदी जाएँगे?” उसने पूछा। दादी मुस्कुराईं, “पहले नाश्ता कर लो, फिर देखेंगे।”
नाश्ते में ताजी रोटी, मक्खन और गुड़ था। राहुल ने पेट भर खाया। उसके बाद वह अपने दोस्तों को ढूँढने निकला। गाँव में उसके तीन अच्छे दोस्त थे—मुकेश, सोनू और रानी। मुकेश किसान का बेटा था, सोनू दूधवाला, और रानी स्कूल की टॉपर। चारों मिले तो योजना बनाने लगे।
“आज नदी में नहाएँगे,” मुकेश ने कहा।
“कल आम तोड़ेंगे,” सोनू ने जोड़ा।
“और परसों कहानी सुनेंगे दादी से,” रानी ने मुस्कुराते हुए कहा।
नदी का पानी ठंडा था। चारों बच्चे घंटों खेलते रहे। पानी में छप-छप, पत्थर फेंकना, और छोटी मछलियाँ पकड़ने की कोशिश। राहुल ने एक बड़ी मछली पकड़ी तो सब ताली बजाने लगे। शाम को घर लौटे तो दादी ने पूछा, “आज का दिन कैसा रहा?” राहुल ने सारी बातें बताईं। दादी ने कहा, “बेटा, शहर में ये मजा नहीं मिलता। यहाँ प्रकृति तुम्हारी दोस्त है।”
अगले दिन आम के बाग में गए। पेड़ों पर पके-पके आम लटक रहे थे। मुकेश पेड़ पर चढ़ गया और आम तोड़-तोड़कर नीचे फेंकने लगा। राहुल और सोनू नीचे इकट्ठा कर रहे थे। रानी ने कहा, “एक-एक आम सबको बाँटना है। कोई ज्यादा न ले।” शाम को सबके घर आम बाँटे गए। राहुल के घर में दादी ने आम का रस बनाया। स्वाद ऐसा कि राहुल ने तीन गिलास पी लिए।
रात को आँगन में चारपाई बिछाई गई। आसमान में तारे चमक रहे थे। दादी ने कहानी शुरू की—“एक समय की बात है, एक गरीब किसान था…” कहानी लंबी थी, लेकिन राहुल और उसके दोस्त पूरी तन्मयता से सुन रहे थे। कहानी में मेहनत, ईमानदारी और प्रकृति की महत्ता थी। कहानी खत्म होने पर राहुल ने पूछा, “दादी, क्या आज भी ऐसे लोग होते हैं?” दादी ने सिर पर हाथ फेरा, “हाँ बेटा, गाँव में अभी भी बहुत से लोग ऐसे हैं जो मेहनत से जीते हैं।”
दिन बीतते गए। एक दिन चारों ने मिलकर एक छोटा सा प्रोजेक्ट बनाने का फैसला किया। गाँव के बच्चों के लिए एक छोटी लाइब्रेरी। राहुल ने अपने साथ लाई कुछ किताबें दीं। मुकेश ने लकड़ी का बक्सा बनाया। सोनू ने दूध की दुकान से खाली डिब्बे लाए जिनमें किताबें रखी जा सकें। रानी ने नाम लिखा—“हमारी छोटी लाइब्रेरी”। गाँव के अन्य बच्चों ने भी किताबें दान कीं। एक हफ्ते में लाइब्रेरी तैयार हो गई। शाम को बच्चे वहाँ आकर पढ़ने लगे। राहुल को बहुत अच्छा लगा। उसने डायरी में लिखा—“आज मैंने कुछ ऐसा किया जो सिर्फ मेरे लिए नहीं, दूसरों के लिए भी है।”
एक दिन अचानक बारिश हो गई। गर्मी की तेज धूप के बाद बारिश जैसे वरदान थी। बच्चे बारिश में भीगते रहे। कीचड़ में फिसलना, पानी इकट्ठा करना, और कागज की नाव बनाना। राहुल की माँ फोन पर बोलीं, “बेटा, ठंड न लग जाए।” लेकिन राहुल खुश था। शाम को जब बारिश रुकी, तो इंद्रधनुष निकला। चारों ने मिलकर इंद्रधनुष की तस्वीर बनाई और दीवार पर चिपका दी।
मध्य में एक दिन मेला आया। गाँव का सालाना मेला। राहुल ने पहले कभी ऐसा मेला नहीं देखा था। झूले, मिठाइयाँ, खिलौने, और लोक नृत्य। राहुल ने दादी से पैसे लेकर एक लकड़ी का खिलौना खरीदा। मुकेश ने मिट्टी के बर्तन लिए। सोनू ने मिठाई खाई। रानी ने एक छोटी किताब खरीदी। शाम को लोक नृत्य शुरू हुआ। गाँव की औरतें और पुरुष थाली और ढोलक बजा रहे थे। राहुल भी थोड़ी देर नाचने लगा। लोग ताली बजा रहे थे। उस पल राहुल को लगा कि शहर की जिंदगी में इतनी खुशी नहीं मिलती।
लेकिन सब कुछ आसान नहीं था। एक दिन राहुल बीमार पड़ गया। तेज बुखार। दादी ने घरेलू नुस्खे अपनाए—तुलसी की चाय, हल्दी वाला दूध। रात भर दादी उसके पास बैठी रहीं। सुबह बुखार उतर गया। राहुल ने कहा, “दादी, आपने मुझे ठीक कर दिया।” दादी मुस्कुराईं, “बेटा, प्यार ही सबसे बड़ी दवा है।”
बीच में राहुल के पापा भी कुछ दिनों के लिए आए। उन्होंने देखा कि बेटा कितना खुश है। पापा ने कहा, “बेटा, तुम यहाँ बहुत कुछ सीख रहे हो। शहर लौटकर भी इन्हें याद रखना।” राहुल ने सिर हिलाया।
छुट्टियों के आखिरी हफ्ते में चारों ने एक छोटी सी नाटक तैयार किया। विषय था—“प्रकृति की रक्षा”। राहुल ने मुख्य भूमिका निभाई। गाँव के लोगों ने आकर देखा। तालियाँ बजीं। राहुल को गर्व हुआ।
आखिरी दिन आया। पैकिंग शुरू हुई। राहुल की आँखें भर आईं। मुकेश, सोनू और रानी भी आए। चारों ने गले मिलाया। “अगली छुट्टियों में फिर मिलेंगे,” राहुल ने कहा। दादी ने आशीर्वाद दिया, “बेटा, हमेशा मेहनती रहना और दूसरों की मदद करना।” नानी ने मिठाई का डिब्बा थमाया।
ट्रेन में बैठते हुए राहुल खिड़की से बाहर देख रहा था। गाँव छोटा होता जा रहा था। उसने डायरी खोली और लिखा—
“गर्मी की छुट्टियाँ सिर्फ खेलने-कूदने की नहीं होतीं। ये दोस्ती, प्रकृति, मेहनत और प्यार सिखाती हैं। इस बार मैंने सीखा कि खुशी छोटी-छोटी चीजों में छिपी होती है—आम का रस, नदी का पानी, दादी की कहानी, और दोस्तों के साथ बिताए पल। शहर लौटकर भी मैं इन यादों को संजोकर रखूँगा। और अगली छुट्टियों का इंतजार करूँगा।”
ट्रेन आगे बढ़ गई। राहुल मुस्कुरा रहा था। गर्मी की छुट्टियाँ खत्म हो गई थीं, लेकिन यादें जिंदगी भर साथ रहने वाली थीं।
(शब्द संख्या लगभग 2000)
Vijay Sharma Erry