वो हवेली RAHMAN SHEIKH द्वारा कुछ भी में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

वो हवेली

शहर से कई किलोमीटर दूर, घने जंगलों और ऊँचे-ऊँचे पेड़ों के बीच एक पुरानी हवेली खड़ी थी।
लोग उसे “काली हवेली” के नाम से जानते थे।
कभी वह हवेली बेहद खूबसूरत हुआ करती थी—ऊँची पत्थर की दीवारें, बड़े-बड़े झरोखे, नक्काशीदार दरवाज़े और हवेली के बीचों-बीच बना एक विशाल आँगन।
लेकिन पिछले कई सालों से वहाँ कोई नहीं रहता था।
हवेली की दीवारों पर काई जम चुकी थी और जगह-जगह पत्थर टूट चुके थे। खिड़कियों के शीशे गायब थे और हवा चलने पर पुराने दरवाज़े अपने आप चर्रर… चर्रर… की आवाज़ करते हुए हिलते रहते।
हवेली के चारों तरफ इतने घने पेड़ थे कि दिन के उजाले में भी वहाँ अजीब-सा अंधेरा छाया रहता था।
गाँव वालों का कहना था कि सूरज ढलने के बाद उस हवेली के पास से गुजरना मौत को दावत देने के बराबर है।
कभी हवेली की ऊपरी मंज़िल से किसी औरत के रोने की आवाज़ आती थी…
कभी किसी बच्चे के हँसने की।
और कई बार आधी रात को हवेली की बंद खिड़की में एक सफ़ेद साया दिखाई देता था।
सबसे डरावनी बात यह थी कि हवेली के मुख्य दरवाज़े पर हमेशा एक पुराना ताला लटका रहता था…
फिर भी रात के ठीक बारह बजे हवेली के अंदर से पायल की छन-छन सुनाई देती थी।
लोग कहते थे कि बरसों पहले इस हवेली में एक ऐसा राज़ दफन हुआ था, जिसे जानने वाला कोई भी इंसान आज तक ज़िंदा वापस नहीं लौटा।
इसी वजह से गाँव के बुज़ुर्ग आज भी बच्चों को चेतावनी देते थे—
“उस हवेली की तरफ कभी मत जाना… क्योंकि वहाँ सिर्फ़ भूत नहीं रहते… वहाँ कोई ऐसी चीज़ भी जागती है, जिसका नाम लेना भी मौत को बुलाना है।”......


उस सुनसान और भुतहा हवेली की सबसे ऊपरी मंज़िल पर, जहाँ इंसान तो क्या कोई आम जिन्न भी कदम रखने से डरता था… वहीं रहता था अयान।
अयान… एक जिन्नज़ाद।
आलम-ए-जिन्नात में उसका नाम किसी पहचान का मोहताज नहीं था। उसकी रगों में साधारण जिन्नों का खून नहीं, बल्कि एक बेहद शक्तिशाली और रहस्यमयी नस्ल की ताकत दौड़ती थी।
छह फुट से भी ऊँचा कद, चौड़े कंधे, काली गहरी आँखें और चेहरे पर हमेशा छाई रहने वाली खामोशी…
अयान के आसपास मौजूद हवा तक जैसे उसके इशारे पर चलती थी।
वह इंसानों की तरह दिखाई देता था, मगर वह इंसान नहीं था।
उसके पास ऐसी शक्तियाँ थीं जिनके सामने बड़े-बड़े जिन्न भी अपना सिर झुका देते थे।
वह पलक झपकते ही एक जगह से दूसरी जगह पहुँच सकता था।
अंधेरे में उसकी आँखें चमकने लगती थीं।
वह बिना छुए किसी चीज़ को हवा में उठा सकता था।
और जब उसका गुस्सा अपनी हद पार करता…
तो उसकी आँखों का रंग बदल जाता था और पूरी हवेली की दीवारें तक काँपने लगती थीं।
लेकिन अयान की सबसे खतरनाक ताकत उसका जादू नहीं था…
उसका गुस्सा और उसकी खामोशी थी।
वह बेवजह किसी को नुकसान नहीं पहुँचाता था। मगर जिसने एक बार उसकी हद पार करने की कोशिश की, उसके लिए अयान का सामना करना आसान नहीं था।
इंसानों के लिए वह सिर्फ़ एक रहस्य था…
जिन्नों के लिए एक डर…
और उस भुतहा हवेली के लिए—
वह खुद उसका मालिक था।
कई सालों से अयान उसी हवेली में अकेला रह रहा था। रात के अंधेरे में जब पूरा शहर सो जाता, तब हवेली की सबसे ऊपरी खिड़की में उसकी काली परछाईं दिखाई देती।
लोग समझते थे कि हवेली में कोई भूत रहता है।
उन्हें क्या पता था…
जिसे वे भूत समझकर डरते हैं, वह एक ऐसा जिन्नज़ाद है जिसके सामने मौत भी कदम रखने से पहले सोचती है।
और अयान की कहानी अभी शुरू ही हुई थी…....


उसी गाँव में, जहाँ लोग सूरज ढलते ही उस भुतहा हवेली का नाम लेने से भी डरते थे, वहीं एक छोटी-सी कच्ची हवेली में रहती थी ज़ोया।
ज़ोया… गाँव की सबसे भोली और मासूम लड़की।
चेहरे पर हमेशा हल्की-सी मुस्कान, बड़ी-बड़ी मासूम आँखें और बातों में ऐसी सादगी कि सामने वाला खुद-ब-खुद उससे अपनापन महसूस करने लगे।
उसे दुनिया की चालाकियों का बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था।
वह हर इंसान पर जल्दी भरोसा कर लेती थी और किसी को दुखी देखकर खुद उदास हो जाती।
सुबह होते ही वह अपनी अम्मी का हाथ बँटाती, आँगन में पानी का छिड़काव करती और फिर गाँव की पगडंडी से होकर नदी किनारे चली जाती।
उसे फूलों से बहुत प्यार था।
रास्ते में कोई घायल चिड़िया मिल जाती तो उसे उठाकर घर ले आती और घंटों उसकी देखभाल करती।
गाँव वाले अक्सर उसकी इसी मासूमियत पर मुस्कुरा देते थे।
लेकिन ज़ोया की एक आदत ऐसी थी, जिसकी वजह से उसकी अम्मी हमेशा उसे डाँटती थीं—
उसे उस पुरानी भुतहा हवेली के पास जाने की आदत थी।
ज़ोया को वहाँ डर नहीं लगता था।
उसे लगता था कि हवेली बस एक पुरानी और अकेली जगह है।
उसे क्या पता था कि उसी हवेली की अंधेरी ऊपरी मंज़िल में कोई उसकी हर आहट से वाकिफ़ था…
जिन्नज़ाद अयान।
और शायद ज़ोया की मासूमियत ही वह चीज़ थी, जो पहली बार अयान जैसे खामोश और खतरनाक जिन्नज़ाद को अपनी तरफ खींचने वाली थी…....