वर्जिनिटी - भाग 5 Ritu kumari द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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वर्जिनिटी - भाग 5

कमरे का भारी और स्वचालित दरवाज़ा आर्यन के बाहर जाते ही एक कड़क आवाज़ के साथ बंद हो गया। उस भारी सन्नाटे में माया काफी देर तक बेड पर सिमटी हुई पड़ी रही। उसकी आँखें लाल थीं और गालों पर आँसुओं के निशान सूख चुके थे। सामने बेड पर रखी वह लाल सिल्क की साड़ी किसी बेहद खूबसूरत ज़ंजीर की तरह चमक रही थी। माया ने उस कीमती कपड़े को छुआ, तो उसे एहसास हुआ कि यह सिर्फ़ एक लिबास नहीं, बल्कि आर्यन मल्होत्रा के मालिकाना हक़ की एक नई मुहर थी।
माया ने खुद को संभाला, बेड से नीचे पैर रखे और धीरे-धीरे चलकर आलीशान ड्रेसिंग टेबल के सामने जा खड़ी हुई। शीशे में उसने अपना चेहरा देखा—बिखरे हुए बाल, सूजी हुई आँखें और गर्दन पर आर्यन की उंगलियों के लाल निशान। उन निशानों को देखकर माया के सीने में गुस्सा और बेबसी एक साथ सुलगने लगी।
"क्या यही मेरी नियति है?" माया ने शीशे में अपनी परछाईं से सवाल किया। "एक तरफ पिता की साँसें हैं, जो उसके अहसानों की वजह से चल रही हैं, और दूसरी तरफ मेरी आत्मा, जिसे वह रोज़ कुचल रहा है।"
उसने भारी मन से वह लाल साड़ी पहनी। लाल रंग उसकी गोरी रंगत पर आग की तरह खिल रहा था, लेकिन उसके चेहरे पर केवल एक वीरानी थी। जैसे ही उसने बाल संवारे, कमरे के कोने में लगा इंटरकॉम अचानक बज उठा। माया चौक कर पीछे हटी। उसने थरथराते हाथों से रिसीवर उठाया।
दूसरी तरफ आर्यन की वही भारी, कड़क और रोबीली आवाज़ गूँजी:
"साड़ी तुम पर बहुत सुंदर लग रही है, माया। शीशे के सामने खड़ी होकर खुद को ताकना बंद करो और नीचे डायनिंग हॉल में आओ। नाश्ता तुम्हारा इंतज़ार कर रहा है।"
माया का शरीर डर से कांप उठा। उसने कमरे की दीवारों और छत पर नज़र दौड़ाई—वहाँ लगे गुप्त कैमरों के ज़रिए आर्यन उसकी हर एक हरकत पर नज़र रखे हुए था। उसे लगा जैसे वह किसी कांच के पिंजरे में कैद एक ऐसी चिड़िया है, जिसकी हर साँस पर उसके मालिक की नज़र है।
माया कमरे से बाहर निकली। विशाल हवेली का गलियारा किसी राजमहल की तरह भव्य था—ऊंचे संगमरमर के पिलर, झूमर और कीमती पेंटिंग्स। लेकिन माया के लिए यह सिर्फ़ एक आलीशान जेल थी। जब वह नीचे उतरी, तो विशाल डायनिंग टेबल के सिरहाने आर्यन बैठा हुआ था। ब्लैक सूट में उसका व्यक्तित्व बेहद रोबीला और डरावना लग रहा था। टेबल पर तरह-तरह के लज़ीज़ व्यंजन सजे थे, लेकिन माया को उन सबमें केवल ज़हर की गंध आ रही थी।
"बैठो," आर्यन ने बिना उसकी तरफ देखे, हाथ में पकड़े अख़बार को मोड़ते हुए कहा। उसकी आवाज़ में एक ऐसा हुक्म था, जिसे टालने की हिम्मत हवेली के किसी नौकर तो क्या, शहर के बड़े-बड़े बिज़नेसमैन में भी नहीं थी।
माया चुपचाप उसकी बगल वाली कुर्सी पर बैठ गई। उसने अपनी नज़रें नीची रखीं।
"अस्पताल से अभी-अभी रिपोर्ट आई है," आर्यन ने कॉफ़ी का एक घूँट लेते हुए धीमे से कहा। "तुम्हारे पिता को वेंटिलेटर से हटाकर स्पेशल वार्ड में शिफ़्ट कर दिया गया है। वे खतरे से बाहर हैं।"
यह सुनते ही माया की आँखों में पल भर के लिए राहत की चमक आई। उसके मुँह से अनजाने में निकला, "सच? क्या... क्या मैं उनसे मिलने अस्पताल जा सकती हूँ?"
आर्यन ने अपनी कॉफ़ी का कप नीचे रखा और धीरे से घुमकर सीधे माया की आँखों में झांका। उसके चेहरे पर एक कड़वी मुस्कान आ गई। वह थोड़ा आगे झुका और माया के ठंडे हाथों पर अपनी गर्म हथेली रख दी। उसकी छुअन से माया का पूरा शरीर सिहर उठा।
"जा सकती हो... लेकिन मेरी एक शर्त पर," आर्यन ने उसके कान के पास झुककर फुसफुसाया। "तुम्हें यह साबित करना होगा कि तुम मेरी वफ़ादार अमानत बन चुकी हो। जब तक मैं तुम्हारे इस जिस्म और रूह पर अपना पूरा हक़ महसूस न कर लूं, तब तक इस हवेली की चौखट तुम्हारे लिए बंद रहेगी।"
"आप इतने निष्ठुर कैसे हो सकते हैं?" माया की आवाज़ में नफ़रत और दर्द छलक पड़ा। "आपने पैसे दिए, मैंने खुद को आपके हवाले कर दिया। अब मेरे पिता ठीक हैं, तो मुझे उनसे मिलने का इतना सा हक़ भी नहीं देंगे?"
आर्यन ने झटके से माया की कलाई पकड़ी और उसे अपनी तरफ खींच लिया। दोनों के चेहरे के बीच महज़ कुछ इंच की दूरी बची। आर्यन की भूरी आँखों में जुनून का एक भयानक तूफ़ान उठ रहा था।
"हक़?" आर्यन हंसा—एक ऐसी हंसी जिसमें केवल कड़कपन था। "हक़ माँगने वाले अपनी चीज़ों की बोली नहीं लगाते, माया। तुमने अपनी आज़ादी उस रात स्टेज पर ही बेच दी थी। अब तुम मेरी ज़िद हो, मेरा जुनून हो। और जब तक यह जुनून शांत नहीं होता, तुम सिर्फ़ मेरी बाहों में रहोगी।"
माया ने उसकी आँखों में देखा—वहाँ नफ़रत, ज़बरदस्ती और एक ऐसा बेपनाह आकर्षण था जो माया को अंदर तक झकझोर रहा था। उसे अहसास हुआ कि आर्यन सिर्फ़ उसके शरीर पर नहीं, बल्कि उसकी रूह पर कब्ज़ा करना चाहता था।
आर्यन ने उसकी कलाई छोड़ी, अपनी घड़ी देखी और खड़ा हो गया। उसने माया के सिर पर हाथ रखा और उसकी ठोड़ी को उठाकर उसके कांपते होंठों को अपनी अंगूठे की छुअन से सहलाया।
"शाम को मैं जल्दी वापस आऊँगा। और उम्मीद करता हूँ कि तब तुम इस नफ़रत की जगह थोड़ा सा समर्पण लेकर मेरा इंतज़ार करोगी।"
आर्यन कड़क कदमों से हवेली के मुख्य दरवाज़े की तरफ़ बढ़ गया। उसके पीछे भारी दरवाज़ा फिर से बंद हो गया।
माया वहीं डायनिंग टेबल पर बैठी रह गई। उसकी आँखों से आँसू गिरकर लाल साड़ी के पल्लू पर जज्ब हो रहे थे। एक तरफ पिता की सलामती की खुशी थी, तो दूसरी तरफ आर्यन के उस जुनूनी जाल की दमघोंटू सच्चाई। वह समझ नहीं पा रही थी कि आर्यन की इस ज़बरदस्ती से वह नफ़रत करे या उसके दिए इस अनजाने संरक्षण के आगे घुटने टेक दे।