कागज की नाव shrish sharma द्वारा क्लासिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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कागज की नाव

कागज की नाव
बरसात का महीना था। दिल्ली में पिछले 7 दिन से लगातार बारिश हो रही थी। 

अभिमन्यु, उम्र 32 साल, एक सरकारी दफ्तर में क्लर्क। रोज की तरह वो 8:32 की लोकल पकड़ने के लिए भाग रहा था। हाथ में छाता, कंधे पर बैग, और बैग के अंदर टिफिन।

पटरी के पास वाले नाले में पानी उफान पर था। तभी उसने देखा - एक छोटी सी कागज की नाव, पानी में डगमगा रही है, पर डूब नहीं रही है।

उस नाव के अंदर कुछ लिखा हुआ था।

उत्सुकता में उसने नाव उठा ली। भीगते हुए कागज पर टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में लिखा था -

"मेरा नाम गुड्डी है। मैं कक्षा 4 में पढ़ती हूँ। ये नाव मैंने अपने पापा के लिए बनाई है। अगर आपको ये मिले तो प्लीज मेरे पापा को दे दीजिएगा, वो इसी रास्ते से दफ्तर जाते हैं। - 12, लाजपत नगर गली नंबर 4"

अभिमन्यु हँसा। बच्चों की नादानी। उसने नाव को फिर से पानी में छोड़ दिया। ट्रेन आ गई।

अगले दिन फिर बारिश। फिर वही जगह। फिर एक कागज की नाव।

इस बार लिखा था - "पापा आप नाव क्यों नहीं ले गए? मैं कल से खाना नहीं खाऊंगी। - गुड्डी"

अब अभिमन्यु को अजीब लगा। वो रोज उसी समय उसी जगह से गुजरता था। क्या कोई बच्ची उसे अपना पापा समझ रही है?

तीसरे दिन, उसने तय किया कि वो इंतजार करेगा। वो 10 मिनट पहले पहुँचा। थोड़ी देर में एक 9 साल की छोटी सी बच्ची, स्कूल यूनिफॉर्म में, हाथ में कागज की नाव लिए दौड़ती हुई आई। उसने नाले में नाव छोड़ी और छुपकर देखने लगी।

अभिमन्यु उसके पास गया। "तुम गुड्डी हो?"

बच्ची डर गई। "आप कौन हो? आपने मेरी नाव क्यों उठाई?"

"मैं यहीं से गुजरता हूँ रोज। ये नाव तुम किसके लिए छोड़ती हो?"

गुड्डी की आँखों में आँसू आ गए। "मेरे पापा के लिए। वो एक साल पहले इसी बरसात में दफ्तर गए थे, फिर कभी वापस नहीं आए। मम्मी कहती है भगवान के पास चले गए। पर मेरी टीचर कहती है, अगर सच्चे मन से संदेश भेजो तो कागज की नाव भगवान तक पहुँच जाती है। तो मैं रोज पापा के लिए नाव भेजती हूँ।"

अभिमन्यु का दिल बैठ गया। उस गली के लोगों से पूछने पर पता चला, पिछले साल इसी नाले में बाढ़ आने से एक आदमी बह गया था। वो गुड्डी के पापा ही थे।

उस दिन से अभिमन्यु का नया काम शुरू हो गया।

वो रोज गुड्डी की नाव उठाता, उस पर जवाब लिखता और फिर से नाले में छोड़ देता।

"बेटा गुड्डी, पापा ने तुम्हारी नाव ले ली। पापा बहुत खुश हैं। तुम खूब पढ़ो। - पापा"

गुड्डी खुश हो जाती। वो माँ को दिखाती। माँ की आँखों में आँसू होते, पर वो कुछ कहती नहीं। वो समझ गई थी कि कोई अनजान आदमी उसकी बेटी का बचपन संभाल रहा है।

ये सिलसिला पूरी बरसात चला। 32 नावें।

फिर बरसात खत्म हुई। नाला सूख गया।

गुड्डी उदास हो गई। "अब मैं पापा को नाव कैसे भेजूंगी?"

अभिमन्यु ने उस दिन दफ्तर से छुट्टी ली। वो एक बड़ा सा चार्ट पेपर लाया, उससे एक बहुत बड़ी नाव बनाई, इतनी बड़ी कि गुड्डी उसमें बैठ सके।

उस नाव पर उसने लिखा - "गुड्डी के पापा हमेशा गुड्डी के साथ हैं, इस नाव में।"

उसने वो नाव गुड्डी के घर के आँगन में रख दी।

गुड्डी उसमें बैठकर बहुत हँसी। साल भर बाद पहली बार उसकी माँ ने भी उसे हँसते हुए देखा।

अभिमन्यु समझ गया था - कुछ नावें पानी में नहीं, दिलों में तैरती हैं। और कुछ रिश्ते खून के नहीं, बारिश के होते हैं।

कहानी खत्म नहीं हुई। हर बरसात में, आज भी, लाजपत नगर के उस नाले में दो कागज की नावें एक साथ तैरती हैं। एक छोटी वाली, और एक थोड़ी बड़ी वाली।

गाँव वाले कहते हैं, वो बाप-बेटी आज भी बातें करते हैं।