ब्लूबेरी कॉटेज - भाग 2 Anamika द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

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ब्लूबेरी कॉटेज - भाग 2

ब्लूबेरी कॉटेज

भाग - २ 

लेखिका "अनामिका"

​अमित ने कांपते हाथों से जैसे ही उस बंद कमरे की कुंडी खोली और दरवाज़ा पीछे धकेला, अंदर का नज़ारा देखकर उसके रोंगटे खड़े हो गए।

​कमरे में कोई मौजूद नहीं था, लेकिन चारों तरफ़ अफ़रा-तफ़री, चीखों और खौफ़नाक सन्नाटे की गूंज साफ़ सुनाई दे रही थी। ऐसा लग रहा था मानो तीन-चार लोग किसी चीज़ से बुरी तरह डरकर बाहर की तरफ़ भाग रहे हों। सीमा और अनन्या ने घबराकर अमित का हाथ कसकर पकड़ लिया।

​अमित ने हिम्मत जुटाकर कमरे में दो कदम और आगे बढ़ाए। उसकी नज़र अचानक पलंग के नीचे पड़ी। अंधेरे में एक छोटा सा बच्चा दुबककर बैठा हुआ था, जो डर से थर-थर कांप रहा था। अमित की सांसें थम गईं। लेकिन जैसे ही उसने आंखें झपककर उसे दोबारा गौर से देखने की कोशिश की... वहां कोई नहीं था। पूरा कमरा पल भर में बिल्कुल शांत हो गया।

​इस अनहोनी और खौफ़नाक मंज़र ने तीनों को अंदर तक हिलाकर रख दिया था।

​धीरे-धीरे रात गहरी होती गई। तीनों ने मिलकर घर की धूल-मिट्टी साफ़ की, रसोई में मिले राशन से खाना बनाया और सुकून से डिनर किया। थकावट के कारण खाना खाते ही सब अपने-अपने कमरों में सोने चले गए।

​रात के करीब ढाई बजे अनन्या की प्यास से आंख खुली। वह पानी पीने के लिए दबे पांव किचन की तरफ बढ़ी। हॉल में पहुंचते ही वह ठिठक गई—वहां वह छोटा बच्चा बेबस खड़ा था और उसके सामने दो खौफनाक आदमी खड़े थे। उनमें से एक के हाथ में चाकू चमक रहा था।

​यह खौफनाक मंज़र देख अनन्या के हलक से एक दिल दहला देने वाली चीख निकली।

​"अनन्या!" चीख सुनते ही अमित और सीमा बदहवास होकर हॉल की तरफ भागे। लेकिन रोशनी होते ही वहां सन्नाटा पसरा था—न वो बच्चा था, न वो आदमी। सब कुछ एकदम सामान्य था। माता-पिता ने इसे अनन्या का बुरा सपना समझा, उसे चुप कराया और दिलासा देकर अपने साथ सुलाने ले गए।

​अगली सुबह कोहरे से ढकी चाय की गुमटी पर दो-तीन लोग अजीब सी खामोशी में कॉटेज की ओर घूर रहे थे। तभी वहां एक पुलिस इंस्पेक्टर दो कांस्टेबलों के साथ पहुंचा।

​"भाई, क्या आसपास से कोई गायब है?" इंस्पेक्टर ने पूछा।

​"नहीं तो साहब... क्या हुआ?" एक आदमी ने अचरज से कहा।

​इंस्पेक्टर ने बताया, "कल शाम मोड़ पर एक भयानक हादसा हुआ था। जब तक पुलिस पहुंची, कार धमाके में पूरी तरह जलकर खाक हो चुकी थी। गाड़ी का न कोई नंबर बचा, न कोई कागज़ात। इसीलिए पूछताछ कर रहे हैं कि क्या किसी का कोई मेहमान आने वाला था?"

​बात करते-करते इंस्पेक्टर ने देखा कि टपरी वाला आदमी बार-बार उस कॉटेज की काली पड़ती खिड़कियों की ओर घूर रहा है।

​"क्या बात है? उस कॉटेज में कोई रुका है क्या?" इंस्पेक्टर ने कड़क आवाज़ में पूछा।

​टपरी वाले ने एक पल के लिए खिड़की की तरफ देखा, फिर अपनी खौफनाक, बेजान आवाज में फुसफुसाया, "नहीं साहब... उस घर में कभी कोई नहीं रुकता। वहां कोई नहीं आया।"

​"ठीक है, कुछ पता चले तो खबर देना," कहकर पुलिस आगे बढ़ गई, जबकि टपरी वाला एक रहस्यमयी मुस्कान के साथ कॉटेज की खिड़की को घूरता रहा।

दोपहर के वक्त सीमा और अनन्या घर का कोना-कोना खंगालते हुए हवेली के सबसे पिछले हिस्से में पहुंचे। वहां उन्हें धूल से अटा एक पुराना स्टोर रूम दिखाई दिया। दोनों जरूरत का कुछ सामान ढूंढने के इरादे से कमरे के भीतर दाखिल हुईं।

​सफाई करते-करते अनन्या का पैर एक पुरानी, चरमराती लकड़ी की अलमारी से टकराया। अलमारी का दरवाजा अपने आप थोड़ा सा खुल गया। भीतर झांकने पर अनन्या को पीला पड़ चुका, धूल से लिपटा कई साल पुराना एक अखबार मिला। उत्सुकतावश जैसे ही उसने अखबार झाड़कर खोला, पन्नों पर छपी मुख्य खबर देखकर उसकी और सीमा की रूह कांप गई।

​अखबार में इसी कॉटेज की तस्वीर छपी थी और बड़े अक्षरों में लिखा था— "कॉटेज बना हैवानियत का ठिकाना: बच्चों का अपहरण करने वाले गिरोह ने मासूम को उतारा मौत के घाट!"

​अखबार के मुताबिक, दो-तीन खौफनाक अपराधियों का एक गिरोह अमीर घर के बच्चों को अगवा कर इसी कॉटेज में छिपाकर रखता था। भारी फिरौती वसूलने के बाद भी वे बेरहमी से उन मासूमों की हत्या कर देते थे। उस खबर के साथ छपी बच्चे और अपराधियों की धुंधली तस्वीरों को देखते ही अनन्या के हाथ से अखबार छूट गया—यह वही बेबस बच्चा और वही दो खौफनाक आदमी थे, जिन्हें उसने और अमित ने देखा था!

​डर के मारे दोनों के चेहरे का रंग उड़ गया। वे बदहवास हालत में चीखते-चिल्लाते हुए भागकर नीचे अमित के पास पहुंचीं।

​हाँपते हुए जब सीमा और अनन्या ने अमित के हाथ में वह अखबार थमाया और पूरी बात बताई, तो अमित के भी होश उड़ गए। तीनों का दिल दहल उठा। अब सब कुछ आईने की तरह साफ था—उन्हें जो दिख रहा था, वे कोई वहम नहीं बल्कि इस कॉटेज में मार दिए गए उस मासूम और उसके कातिलों की भटकती हुई आत्माएं थीं। यह अहसास होते ही कि वे एक भूतिया हवेली में भयानक आत्माओं के साथ कैद हैं, तीनों डर से थर-थर कांपने लगे।

तभी कमरे के कोने में रखी पुरानी अलमारी का दरवाज़ा अपने आप धीरे से खुला और उसमें लगा पुराना शीशा नीचे गिरकर चकनाचूर हो गया।

​ज़मीन पर बिखरे काँच के टुकड़ों पर नज़र पड़ते ही तीनों के चेहरे का रंग उड़ गया। वहाँ काँच पर उन तीनों में से किसी की भी परछाईं नज़र नहीं आ रही थी...

दूसरा भाग समाप्त,कहानी जारी है....