प्यार का जाल - 2 Ritu Kumari द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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प्यार का जाल - 2

कैफे की उस पहली मुलाकात के बाद कई दिन बीत गए थे, लेकिन आरव का मन अब किसी काम में नहीं लग रहा था। वह जब भी आँखें बंद करता, उसे रिया का भीगा हुआ चेहरा और उसकी चंचल मुस्कान ही याद आती। आरव रोज़ शाम को उसी समय कैफे पहुँच जाता और उसी कोने वाली मेज़ पर बैठकर दरवाज़े की तरफ़ टकटकी लगाए देखता रहता। उसका दिल हर पल इसी उम्मीद में धड़कता कि शायद आज रिया फिर से उस दरवाज़े से अंदर आए।
तीन दिन बाद, उसकी यह उम्मीद हक़ीक़त में बदल गई। शाम के वक्त कैफे का दरवाज़ा खुला और रिया अंदर आई। आरव को देखते ही रिया के चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान तैर गई। वह सीधे आरव की मेज़ की तरफ़ बढ़ी और बिना झिझके सामने वाली कुर्सी पर बैठ गई।
"मुझे पता था तुम यहीं मिलोगे, आरव!" रिया ने अपनी कॉफ़ी का ऑर्डर देते हुए कहा।
आरव के होठों पर खुद-ब-खुद मुस्कान आ गई। "तुम इतने यकीन से कैसे कह सकती हो?"
"क्योंकि कुछ लोग और कुछ जगहें पहली ही बार में अपनी सी लगने लगती हैं," रिया ने आरव की आँखों में देखते हुए सीधे दिल पर दस्तक देने वाला जवाब दिया।
उस दिन के बाद से यह सिलसिला रोज़ का बन गया। आरव जो अक्सर अकेला रहता था और लोगों से दूरी बनाकर रखता था, अब रिया के साथ घंटों बातें करने लगा था। दोनों हर शाम कैफे में मिलते, कभी गोमती नगर के रिवरफ्रंट पर टहलते, तो कभी लखनऊ की ऐतिहासिक गलियों में घूमते। आरव एक शांत, गंभीर और समझदार इंसान था, वहीं रिया बेहद ज़िंदादिल, बेबाक और हर पल को खुलकर जीने वाली लड़की थी। दोनों एक-दूसरे से पूरी तरह अलग थे, लेकिन शायद यही फर्क उनके बीच के खिंचाव को और गहरा बना रहा था।
रिया की छोटी-छोटी बातों पर ज़ोर-ज़ोर से हँसना, आरव को चिढ़ाना और फिर अचानक सीरियस होकर गहरी बातें करना—आरव को उसकी हर अदा से प्यार होने लगा था। आरव को महसूस होने लगा था कि रिया के बिना उसकी शामें और उसकी ज़िंदगी दोनों अधूरी हैं।
एक शाम, जब सूरज ढल रहा था और आसमान में गुलाबी-नारंगी छटा बिखरी हुई थी, दोनों पार्क की एक बेंच पर बैठे थे। हल्की ठंडी हवा चल रही थी। रिया अचानक शांत हो गई और दूर ढलते सूरज को देखने लगी।
"आरव..." रिया ने बहुत धीमी और भारी आवाज़ में कहा।
"हाँ, रिया?" आरव ने उसकी तरफ देखा।
"क्या तुम्हें लगता है कि हम किसी इंसान पर इतना भरोसा कर सकते हैं कि उसके लिए अपनी पूरी दुनिया भूल जाएँ?" रिया की आँखों में अचानक एक अजीब सा सन्नाटा और उदासी छा गई थी, जिसे आरव पहचान नहीं पाया।
आरव ने थोड़ा मुस्कुराते हुए रिया के हाथ पर अपना हाथ रखा और कहा, "अगर वो इंसान सही हो, तो हाँ। प्यार और भरोसा ही तो दो लोगों को जोड़कर रखता है, रिया।"
रिया ने आरव के हाथ को देखा और फिर मुस्कुरा दी, लेकिन उसकी मुस्कान में इस बार वह पुरानी चंचलता नहीं थी। उसने धीरे से कहा, "तुम बहुत अच्छे हो, आरव। काश... काश सब कुछ इतना ही सीधा और आसान होता।"
आरव उसके इस जवाब से थोड़ा उलझन में पड़ गया, लेकिन उसने बात को आगे नहीं बढ़ाया। उस ढलती शाम में, आरव के दिल में रिया के लिए प्यार की जड़ें और गहरी हो चुकी थीं। वह मन ही मन तय कर चुका था कि अब वह अपने दिल की बात रिया से और ज़्यादा दिन नहीं छिपाएगा।
लेकिन आरव इस बात से पूरी तरह अनजान था कि रिया की इस उदासी के पीछे एक ऐसा सच छुपा हुआ था, जो आने वाले वक्त में उसकी बनी-बनाई दुनिया को पूरी तरह तहस-नहस करने वाला था।