घर का राह
लेखक: विजय शर्मा एरी
शहर की चकाचौंध में खोया हुआ एक युवक था—अर्जुन। दिल्ली की ऊँची इमारतों, तेज़ ट्रैफिक और कभी न खत्म होने वाली भीड़ के बीच वह पिछले सात साल से जी रहा था। नौकरी अच्छी थी, फ्लैट किराए पर था, दोस्त थे, पार्टियाँ थीं… पर दिल में एक खालीपन था। हर रात जब वह अकेला बिस्तर पर लेटता, तो माँ की आवाज़ याद आ जाती—“बेटा, घर कब आओगे?” और वह जवाब में सिर्फ “जल्द ही” कह देता।
उस दिन भी वही हुआ। ऑफ़िस से लौटते हुए मोबाइल पर माँ का मिस कॉल था। अर्जुन ने कॉल बैक किया।
“माँ, क्या हुआ?”
“कुछ नहीं बेटा… बस याद आ गई। बाबूजी का खाना ठंडा हो गया है। तुम्हारे बिना घर सूना लगता है।”
अर्जुन की आवाज़ में थकान थी—“माँ, अभी प्रोजेक्ट चल रहा है। अगले महीने आऊँगा।”
“ठीक है… ध्यान रखना।” माँ ने धीरे से कहा और फोन रख दिया।
रात को अर्जुन सो नहीं पाया। खिड़की से बाहर शहर की रोशनियाँ चमक रही थीं, पर उसकी आँखों में गाँव की मिट्टी, आम के पेड़ और आँगन में बैठकर माँ के हाथों की रोटी की याद तैर रही थी। अचानक एक खबर आई—बाबूजी बीमार हैं। हार्ट की तकलीफ। डॉक्टर ने कहा कि परिवार के पास रहना ज़रूरी है।
अगली सुबह अर्जुन ने छुट्टी ले ली। ट्रेन का टिकट कटाया और रात की गाड़ी पकड़ी। दिल्ली से उसका गाँव लगभग आठ घंटे की दूरी पर था। ट्रेन के डिब्बे में बैठकर वह खिड़की से बाहर देखता रहा। शहर पीछे छूट रहा था, खेत आ रहे थे, नदियाँ चमक रही थीं। मन में हजार सवाल थे—क्या वह अब घर लौट पाएगा? या फिर शहर की भागदौड़ ने उसका घर का रास्ता हमेशा के लिए भुला दिया है?
सुबह गाँव का स्टेशन आया। छोटी-सी बिल्डिंग, कुछ लोग, और ठंडी हवा। अर्जुन ने बैग उठाया और बाहर निकला। सड़क वही पुरानी थी, पर अब थोड़ी पक्की हो गई थी। ऑटो मिला। ड्राइवर ने पहचान लिया—“अरे अर्जुन भैया! इतने दिन बाद?”
अर्जुन मुस्कुराया—“हाँ भैया… घर आ रहा हूँ।”
घर पहुँचते ही माँ द्वार पर खड़ी थीं। आँखों में आँसू थे, पर चेहरे पर मुस्कान। बाबूजी चारपाई पर लेटे थे। चेहरा पीला पड़ गया था, पर आँखों में वही पुरानी चमक।
“आ गया बेटा…” बाबूजी ने हाथ बढ़ाया। अर्जुन ने उनके हाथ पकड़ लिए। “बाबूजी, आप ठीक हो जाएँगे।”
माँ ने चाय बनाई। घर की खुशबू—गोबर लीपा आँगन, तुलसी का पौधा, और किचन से आती दाल की महक—सब कुछ वैसा ही था जैसा सात साल पहले छोड़ा था।
दिन बीतने लगे। अर्जुन बाबूजी की देखभाल करने लगा। सुबह उठकर उन्हें दवाई देता, खेत में थोड़ी देर घूमता, शाम को माँ के साथ बैठकर पुरानी बातें करता। गाँव के दोस्त मिले—रमेश, सुनील। वे अब शादीशुदा थे, बच्चे थे। रमेश ने कहा—“अर्जुन, शहर अच्छा है, पर घर का मज़ा कुछ और है। यहाँ मिट्टी अपनी लगती है।”
एक शाम अर्जुन अकेला नदी किनारे बैठा था। पानी बह रहा था। याद आया—बचपन में बाबूजी उसके साथ यहाँ मछली पकड़ने आते थे। तब रास्ता छोटा लगता था। अब वही रास्ता लंबा और मुश्किल लगता था। मन में एक सवाल उठा—क्या घर सिर्फ दीवारें और छत है? या फिर वो रिश्ते हैं जो हमें वापस खींच लाते हैं?
रात को बाबूजी ने बुलाया। “बेटा, बैठ।”
अर्जुन चारपाई के किनारे बैठ गया।
“मैं जानता हूँ तुम शहर में अच्छा कर रहे हो। पर सुन… ज़िंदगी सिर्फ कमाने की नहीं होती। घर का रास्ता कभी मत भूलना। जहाँ तुम्हारी जड़ें हैं, वहीं तुम्हारी ताकत है। शहर तुम्हें बहुत कुछ दे सकता है, पर माँ-बाप का आशीर्वाद और मिट्टी की खुशबू नहीं दे सकता।”
अर्जुन की आँखें भर आईं। “बाबूजी, मैंने गलती की। इतने साल दूर रहा।”
“गलती नहीं बेटा… ज़िंदगी का सफ़र है। अब लौट आया है, बस।”
अगले दिन अर्जुन ने खेत में काम किया। पसीना आया, हाथ गंदे हुए, पर दिल हल्का लगा। शाम को माँ ने पूछा—“बेटा, कब वापस जाओगे?”
अर्जुन ने जवाब दिया—“माँ, अभी नहीं। बाबूजी ठीक होने तक यहीं रहूँगा। और… शायद कुछ दिन और।”
दो हफ्ते बीत गए। बाबूजी बेहतर हुए। डॉक्टर ने कहा कि अब खतरा नहीं। अर्जुन को शहर वापस जाना था। पर दिल नहीं मान रहा था। एक रात उसने फैसला किया। अगली सुबह माँ-बाबूजी को बताया—“मैं शहर में नौकरी जारी रखूँगा, पर हर महीने घर आऊँगा। और… शायद एक दिन स्थायी रूप से लौट आऊँ।”
माँ ने सिर पर हाथ फेरा—“जैसा तुझे अच्छा लगे। पर याद रखना—घर का रास्ता हमेशा खुला रहता है। बस तू उसे बंद मत करना।”
ट्रेन पकड़ने से पहले अर्जुन ने गाँव घूमा। स्कूल जहाँ पढ़ा था, मंदिर जहाँ माँ रोज जाती थीं, और वह पुराना आम का पेड़ जिसके नीचे दोपहर की नींद ली थी। हर जगह यादें थीं। मन में एक बात साफ हो गई—घर का रास्ता बाहर की सड़कों पर नहीं, अंदर के दिल में होता है। जब दिल घर की तरफ मुड़ता है, तो रास्ता अपने आप मिल जाता है।
ट्रेन चल पड़ी। खिड़की से गाँव छूट रहा था। अर्जुन ने मोबाइल निकाला और माँ को मैसेज किया—“माँ, घर का रास्ता याद है। जल्द फिर आऊँगा।”
शहर पहुँचकर अर्जुन पहले जैसा नहीं रहा। वह काम करता, पर हर शाम गाँव की याद में कुछ समय निकालता। दोस्तों को बताता—“भाई, घर जाना ज़रूरी है। वरना हम खो जाते हैं।”
एक साल बाद अर्जुन ने फैसला लिया। शहर की नौकरी छोड़कर गाँव में एक छोटा बिजनेस शुरू किया—ऑर्गेनिक सब्ज़ियों का। शुरुआत मुश्किल थी, पर परिवार साथ था। बाबूजी खेत में मदद करते, माँ घर संभालतीं। गाँव के युवक जुड़ने लगे। अर्जुन को लगा कि असली सफलता यही है—अपने लोगों के बीच होना।
एक दिन रमेश ने पूछा—“अर्जुन, कभी पछतावा होता है शहर छोड़ने का?”
अर्जुन मुस्कुराया—“नहीं। घर का रास्ता मुझे वापस ले आया। और अब मैं जानता हूँ कि मंज़िल वही है जहाँ दिल शांत हो।”
साल बीतते गए। अर्जुन की शादी हुई। पत्नी भी गाँव की थी। बच्चे हुए। घर में खुशियाँ बढ़ीं। बाबूजी अब बुजुर्ग हो चुके थे, पर रोज शाम को अर्जुन उनके साथ बैठता और पुरानी कहानियाँ सुनता।
एक रात बाबूजी ने कहा—“बेटा, तुमने घर का रास्ता नहीं भुलाया। यही तुम्हारी सबसे बड़ी उपलब्धि है।”
अर्जुन ने उनके पैर छूए—“बाबूजी, आपने सिखाया। वरना मैं शहर की रोशनियों में खो जाता।”
आज भी जब अर्जुन खेत से लौटता है, तो माँ द्वार पर खड़ी मिलती हैं। बच्चे आँगन में खेलते हैं। घर की खुशबू वही है। और अर्जुन जानता है—घर का रास्ता कभी लंबा नहीं होता। बस दिल से निकलना चाहिए।
ज़िंदगी के सफ़र में कई रास्ते आते हैं—कुछ सफलता के, कुछ पैसे के, कुछ नाम के। पर सबसे महत्वपूर्ण रास्ता वह है जो हमें वापस अपनी जड़ों तक ले जाए। जहाँ माँ की मुस्कान हो, बाबूजी का आशीर्वाद हो, और मिट्टी अपनी लगे।
अर्जुन अक्सर सोचता—अगर उस दिन माँ का फोन न आया होता, या बाबूजी बीमार न पड़े होते, तो क्या वह कभी घर लौटता? शायद देर से। पर देर से सही, लौटना ज़रूरी है। क्योंकि घर सिर्फ एक जगह नहीं, एक भावना है। और उस भावना का रास्ता हमेशा दिल के नक्शे पर अंकित रहता है।
आज अर्जुन खुश है। परिवार खुश है। गाँव में उसकी पहचान सिर्फ एक सफल व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस बेटे की है जिसने घर का रास्ता नहीं भुलाया।
और यही असली कहानी है—घर का रास्ता कभी खोता नहीं। बस कभी-कभी हमें रुककर उसे याद करना पड़ता है।
(लगभग 2000 शब्द)
✍️ विजय शर्मा एरी