हुक्म और हसरत - 19 Diksha mis kahani द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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हुक्म और हसरत - 19

🔥♥️ हुक्म और हसरत 🔥♥️

#Arsia

Chapter 19 

> 🎶 **"हमें तुमसे प्यार कितना, ये हम नहीं जानते... मगर जी नहीं सकते , तुम्हारे बिना ………


रात धीरे-धीरे और गहरी होती जा रही थी। 

महल की ऊँची दीवारों पर पसरा सन्नाटा किसी अनजाने तूफ़ान की आहट दे रहा था। 

रात का भोजन समाप्त हो चुका था।

सब कुछ सामान्य लग रहा था...

लेकिन किस्मत चुपचाप अपनी अगली चाल चल चुकी थी। 🥀

अपने कमरे में बैठी सिया अचानक अपना सिर थामकर बैठ गई।

"आह..." 😣

उसकी कनपटियों में तेज़ दर्द उठने लगा।

साँसें भारी होने लगीं।

कमरे की हर चीज़ उसकी आँखों के सामने धुँधली पड़ने लगी।

उसने बिस्तर का सहारा लेकर उठने की कोशिश की...

लेकिन उसके कदम लड़खड़ा गए। 😵‍💫

माथे पर पसीने की बूँदें उभर आईं। 

होंठ सूख चुके थे।

दिल की धड़कनें जैसे किसी अनजाने डर की चेतावनी दे रही थीं।

"को... कोई है...?" 🥺

उसकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि कमरे की दीवारों से टकराकर वहीं खो गई।

अचानक...

बाहर से तेज़ कदमों की आहट सुनाई दी। 

धड़ाम! 

दरवाज़ा खुला।

सामने अर्जुन खड़ा था।

जैसे उसे पहले ही किसी अनहोनी का एहसास हो गया हो।

उसकी नज़र जैसे ही लड़खड़ाती हुई सिया पर पड़ी...

वो बिना एक पल गंवाए उसकी ओर दौड़ा।

सिया का शरीर पूरी तरह संतुलन खो चुका था।

गिरने से पहले ही अर्जुन ने उसे अपनी बाँहों में संभाल लिया। ❤️

"राजकुमारी!" उसकी आवाज़ में पहली बार घबराहट साफ़ सुनाई दी।

सिया ने मुश्किल से उसकी ओर देखा।

"अ... अर्जुन..." 😔

उसका शरीर तप रहा था।

अर्जुन ने तुरंत उसे अपनी बाँहों में उठाकर बिस्तर पर लिटाया।

उसने इंटरकॉम उठाया।

"डॉ. सेन को तुरंत बुलाइए!" 

"अभी!"

उसकी आवाज़ कठोर थी...

लेकिन उसके हाथों की पकड़ अनजाने में काँप रही थी।
कुछ ही मिनटों में डॉक्टर और नर्स कमरे में पहुँच गए। 
डॉक्टर ने बिना समय गँवाए सिया की नब्ज़ देखी।
उसकी आँखों में टॉर्च की रोशनी डाली।

ब्लड प्रेशर मशीन लगाई।

नर्स ने तुरंत IV लाइन तैयार करनी शुरू कर दी। 
कमरे में बेचैनी फैल चुकी थी।अर्जुन कुछ कदम दूर खड़ा सब देख रहा था। सका चेहरा हमेशा की तरह शांत था।
लेकिन उसकी मुट्ठियाँ इतनी कस चुकी थीं कि उँगलियों की गाँठें सफेद पड़ गई थीं।

डॉ. सेन का चेहरा गंभीर हो गया।

"ब्लड प्रेशर लगातार गिर रहा है।"

उन्होंने नर्स से कहा—

"तुरंत IV फ्लूइड शुरू कीजिए।"

"ब्लड सैंपल लेकर टॉक्सिकोलॉजी टेस्ट के लिए भेजिए।"

कुछ क्षण बाद उन्होंने अर्जुन की ओर देखा।

"ये किसी स्लो-एक्टिंग नर्व एजेंट का असर लग रहा है।"

"ज़हर बहुत कम मात्रा में दिया गया है..."

"लेकिन अगर समय पर इलाज न मिले..."

"...तो ये जानलेवा साबित हो सकता है।" 

कमरे में जैसे समय थम गया।

अर्जुन की पलकों ने एक बार झपकना भी भूल गया।
उसकी आँखों में एक पल के लिए नमी उतर आई।वो खुद भी उस नमी से जैसे चौंक गया।
अगले ही पल उसने बिना किसी को महसूस होने दिए अपना चेहरा दूसरी ओर घुमा लिया।

उसने गहरी साँस ली...
और हमेशा की तरह अपने चेहरे पर वही ठंडी, सख्त चुप्पी ओढ़ ली। अब उसकी आँखों में सिर्फ़ एक चीज़ थी—खामोश गुस्सा। 

उसने अपने ईयरपीस को ऑन किया।

"टीम-अल्फ़ा।"

उसकी आवाज़ फिर से पहले जैसी ठंडी हो चुकी थी।

"पूरा महल तुरंत सील कर दो।"

"किचन..."

"स्टाफ..."

"मेडिकल टीम..."

"कोई भी अपनी जगह से नहीं हिलेगा।"

"महल में मौजूद हर व्यक्ति की बैकग्राउंड जाँच चाहिए।"

कुछ पल रुककर उसने सिया की ओर देखा।

उसकी नज़रें एक क्षण के लिए उसके पीले पड़े चेहरे पर ठहर गईं।

फिर उसने बेहद शांत स्वर में कहा—

"और जिसने भी ये किया है..."

"...उसे मैं खुद ढूँढ़ूँगा।" 😡

उसी समय बाहर पूरे महल में सायरन की आवाज़ गूँज उठी। 
सुरक्षा कर्मी दौड़ पड़े।हर गेट बंद कर दिया गया।
महल अब एक किले की तरह सील हो चुका था।
कमरे के भीतर...नर्स दवा लगा रही थी।
डॉक्टर लगातार मॉनिटर पर नज़र रखे हुए थे।

और अर्जुन...

वो बस कुछ कदम दूर खड़ा था।चेहरा पहले जैसा निर्विकार...
लेकिन उसकी नज़रें हर पल सिया पर थीं।
जैसे एक पल के लिए भी उसे अपनी आँखों से ओझल नहीं होने देना चाहता हो। ❤️‍🩹

"जो महसूस हुआ... पर कहा नहीं गया।" 💔

कमरे में मशीनों की धीमी बीप... बीप... की आवाज़ गूँज रही थी। ❤️‍🩹

डॉ. सेन ने एक बार फिर मॉनिटर की ओर देखा।

कुछ रिपोर्ट्स नर्स को थमाईं और गंभीर स्वर में बोले—

"अगले कुछ घंटे बहुत महत्वपूर्ण हैं।"

"दवाइयाँ अपना काम करेंगी... लेकिन अब सब कुछ इनके शरीर की प्रतिक्रिया पर निर्भर करेगा।"

"अगर कोई भी बदलाव हो, मुझे तुरंत बुलाइए।"

अर्जुन ने बिना कुछ कहे बस हल्का-सा सिर हिला दिया।

डॉक्टर और नर्स कमरे से बाहर चले गए। कमरे में फिर वही भारी खामोशी लौट आई।अर्जुन की नज़र अनायास सिया पर चली गई।उसका चेहरा पहले से कहीं ज़्यादा फीका लग रहा था।माथे पर पसीने की महीन बूँदें अब भी चमक रही थीं।

एक पल के लिए...उसकी आँखों में फिर वही नमी उतर आई।
अर्जुन ठिठक गया।
उसने अपनी ही आँखों को जैसे पहली बार महसूस किया।

"मैं...?"

वो खुद से ही हैरान था।

बरसों बाद...

उसकी आँखें किसी के लिए भीग रही थीं।

अगले ही पल उसने गहरी साँस ली।

पलकें झपकाईं...

और चेहरे पर फिर वही सख़्त मुखौटा पहन लिया। 

उसी समय...

बाहर से घबराई हुई आवाज़ें सुनाई दीं। दरवाज़ा खुला।
राजमाता, रानी माँ, रोशनी, मीरा और काव्या तेज़ी से कमरे के अंदर आए। 😨

राजमाता की नज़र जैसे ही बिस्तर पर पड़ी...

उनके हाथ से जपमाला छूटकर संगमरमर के फर्श पर बिखर गई।मोती चारों तरफ लुढ़क गए।
जैसे किसी ने पूरे परिवार की उम्मीदों को एक झटके में बिखेर दिया हो। 

"म... मेरा बच्चा..." 🥺

उनकी आवाज़ काँप गई।

अगले ही पल...
उनका शरीर लड़खड़ाया।

"राजमाता!" 😰

रानी माँ और मीरा तुरंत उन्हें संभालने दौड़ीं।
रोशनी की आँखों से आँसू बह निकले।

"दादी..." 😭

कमरे का माहौल चीखों, दुआओँ और बेचैनी से भर गया।

राजमाता के बेहोश होते ही पूरे कमरे में अफरा-तफरी मच गई। 😰
"राजमाता...!" रानी माँ घबराकर उनके पास घुटनों के बल बैठ गईं।
मीरा ने तुरंत पानी का गिलास उठाया, जबकि रोशनी की आँखों से आँसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। 🥺
"दादी माँ... आँखें खोलिए ना... प्लीज़..." 😭
रानी माँ ने काँपते हाथों से राजमाता का चेहरा सहलाया।
"रोशनी, घबराओ मत। डॉक्टर अभी आते ही होंगे।"
कुछ ही क्षणों में नर्स और एक डॉक्टर राजमाता को दूसरे कमरे में ले गए।
रानी माँ भी उनके साथ चली गईं।
रोशनी बार-बार पीछे मुड़कर सिया के कमरे की ओर देख रही थी।
"माँ... दीदी ठीक हो जाएँगी ना...?" उसकी आवाज़ डर से काँप रही थी।
रानी माँ ने उसे अपने सीने से लगा लिया। 🤍
"कुछ नहीं होगा तुम्हारी दीदी को। भगवान पर भरोसा रखो।"
रोशनी ने सिर हिलाया, लेकिन उसके आँसू अब भी नहीं थम रहे थे
अर्जुन वहीं खड़ा रहा।
उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था।लेकिन उसकी उँगलियाँ अब भी कसकर मुट्ठी में बँधी हुई थीं।


उधर…

काव्या कुछ पल दरवाज़े पर खड़ी रही।
उसने एक नज़र राजमाता की ओर देखा...
और दूसरी सिया के कमरे की ओर।
फिर बिना एक पल गंवाए वह तेज़ी से वापस सिया के कमरे की तरफ बढ़ गई। 

उसके मन में बस एक ही चिंता थी—
सिया...



काव्या धीरे-धीरे उसके पास आई।

उसने अर्जुन के चेहरे को गौर से देखा।

जब अर्जुन बाहर से सबसे ज़्यादा शांत दिखाई देता है...

तभी उसके भीतर सबसे बड़ा तूफ़ान चल रहा होता है।

"अर्जुन..." 🥺

उसने धीमे स्वर में कहा।

"मैं यहीं रुक जाती हूँ..."

"तुम थोड़ा आराम कर लो..."

"सिया के पास मैं बैठती हूँ।"

अर्जुन ने पहली बार उसकी ओर देखा।

उसकी आँखें हल्की लाल थीं।

उसने तुरंत नज़रें फेर लीं।

ताकि कोई उनमें छिपी नमी पढ़ न सके।

कुछ क्षण बाद उसने शांत स्वर में कहा—

"नहीं, काव्या..."

"अभी नहीं।"

"लेकिन अर्जुन—"

"मैंने कहा ना..."

उसकी आवाज़ ऊँची नहीं हुई...

लेकिन उसमें ऐसा दृढ़ आदेश था कि कोई आगे कुछ कह ही नहीं सका।

"अभी नहीं।" 😑

काव्या समझ गई।

इस समय अर्जुन सिर्फ़ महल का सुरक्षा प्रमुख नहीं था...

और शायद सिर्फ़ एक बॉडीगार्ड भी नहीं।

सिया...
उसके लिए क्या थी...

शायद खुद अर्जुन भी अभी उस सच को स्वीकार नहीं कर पाया था।

लेकिन एक बात साफ़ थी—उसकी खामोशी...
उसकी आँखों की बेचैनी...
और हर पल सिया पर टिकी उसकी नज़रें...

बहुत कुछ कह रही थीं। 💔

काव्या ने बिना कुछ कहे हल्का-सा सिर झुकाया।

दरवाज़ा बंद हो गया। 

कमरे में अब सिर्फ़ दो लोग रह गए थे...एक...

जो बेहोशी में भी ज़िंदगी से लड़ रही थी।
और दूसरा...जो अपने जज़्बातों से। 




मशीनों की धीमी बीप... बीप... की आवाज़ उस खामोशी को और भारी बना रही थी। ❤️‍🩹

अर्जुन कुछ क्षण वहीं खड़ा रहा, 
उसने तुरंत महाराज का नंबर मिलाया।
कुछ ही सेकंड में कॉल जुड़ गई।
"हाँ अर्जुन?" दूसरी तरफ़ से महाराज की गंभीर आवाज़ सुनाई दी।
"महाराज..." अर्जुन का स्वर हमेशा की तरह संयत था।
"राजकुमारी की तबीयत अचानक बहुत बिगड़ गई है। डॉक्टर को शक है कि उन्हें स्लो-एक्टिंग नर्व एजेंट दिया गया है। पूरा महल सील कर दिया गया है।"
कुछ क्षणों के लिए दूसरी तरफ़ पूरी खामोशी छा गई।
फिर महाराज की भारी आवाज़ सुनाई दी—
"मैं अभी शहर से बाहर हूँ... लेकिन जितनी जल्दी हो सके लौट रहा हूँ।"
उन्होंने गहरी साँस ली।
"अर्जुन..."
"जी, महाराज।"
"मैं तुम्हें सिर्फ़ अपने राज्य का सुरक्षा प्रमुख समझकर ये ज़िम्मेदारी नहीं दे रहा।"
उनकी आवाज़ और गंभीर हो गई।
"मेरी बेटी का ख़याल रखना..."
कुछ पल रुककर उन्होंने कहा—
"सिर्फ़ भावी रानी समझकर नहीं..."
"...मेरी बेटी समझकर।" ❤️
अर्जुन की उँगलियाँ मोबाइल पर और कस गईं।
उसने बिना देर किए उत्तर दिया—
"अपने प्राण रहते राजकुमारी पर कोई आँच नहीं आने दूँगा, महाराज।"
दूसरी तरफ़ से बस एक शब्द सुनाई दिया—
"मुझे तुम पर भरोसा है।"
कॉल कट गई। 
अर्जुन ने कुछ पल मोबाइल को देखा...
उसका जबड़ा अब भी कसकर भींचा हुआ था।
आँखें लाल थीं...लेकिन चेहरे पर वही सख़्त, निर्विकार भाव थे। 

उसने धीरे-धीरे एक कुर्सी खींची...

और सिया के सिरहाने बैठ गया।

कुछ पल तक वो बस उसे देखता रहा।

फिर बहुत सावधानी से उसने सिया का हाथ अपने हाथों में ले लिया। 🤍

उसकी उँगलियाँ ठंडी पड़ चुकी थीं।

अर्जुन ने अनायास उन्हें अपनी हथेलियों में समेट लिया।

उसी स्पर्श के साथ...

एक याद उसके ज़ेहन में कौंध गई। 🌸

वही सुबह...

जब सिया ने ज़बरदस्ती उसकी घायल हथेलियों पर मरहम लगाया था।

वो बार-बार अपना हाथ छुड़ाना चाहता रहा...

लेकिन उसने छोड़ा नहीं।

उसने अपनी लंबी, नाज़ुक उँगलियाँ उसकी खुरदुरी उँगलियों में उलझा दी थीं...

और धीमे से कहा था—

"मैं आपके साथ हूँ, अर्जुन।" 🤍

अर्जुन की उँगलियाँ अनजाने में उसी तरह सिया की उँगलियों में उलझ गईं।

वो एक पल के लिए ठिठक गया।

उसने तुरंत अपनी पकड़ ढीली करनी चाही...

लेकिन कर नहीं पाया।

उसने हल्का-सा भौंहें सिकोड़ीं।

"ये... क्या हो रहा है?"

उसने मन ही मन खुद से पूछा।

"मैं ऐसा व्यवहार क्यों कर रहा हूँ?"

कुछ पल तक वो खुद ही अपने सवालों में उलझा रहा।

फिर उसने जैसे खुद को समझाया—

"उसने... उस दिन मेरी परवाह की थी।"

"जब सबने सिर्फ़ मेरी सख़्ती देखी थी... उसने मेरे ज़ख्म देखे थे।"

"आज... सिर्फ़ अपना फ़र्ज़ निभा रहा हूँ।"

उसने गहरी साँस ली।

जैसे अपने ही दिल को यक़ीन दिलाना चाहता हो।

लेकिन जाने क्यों...

उसका हाथ अब भी सिया का हाथ छोड़े बिना बैठा था। 🥀

उसने दूसरी हथेली से बहुत धीरे से सिया के माथे पर आई पसीने की बूँदें अपने रूमाल से पोंछ दीं।

"डॉक्टर ने कहा है..."

उसने धीमे स्वर में कहा।

"...आप ठीक हो जाएँगी, राजकुमारी।"

"इसलिए हार मानने का प्रश्न ही नहीं उठता।"

उसकी आवाज़ पहले जैसी स्थिर थी।

लेकिन शब्दों के बीच छिपी बेचैनी को शायद वही सुन सकता था।

सिया ने बेहोशी में हल्की-सी करवट ली।

उसकी उँगलियाँ अनजाने में अर्जुन की उँगलियों को थोड़ा और कस गईं। 🤍

अर्जुन की साँस एक पल को रुक गई।

उसने नीचे देखा।

उसकी पकड़...

बिल्कुल वैसी ही थी...

जैसी उस दिन उसकी उँगलियाँ उसकी उँगलियों में उलझी थीं।

एक पल के लिए...

उसके होंठों पर बहुत हल्की-सी मुस्कान आई।

इतनी हल्की...

कि अगले ही पल गायब भी हो गई।

उसने तुरंत अपना चेहरा दूसरी ओर घुमा लिया।

"आप सचमुच अजीब हैं, राजकुमारी..."

उसने बहुत धीमे स्वर में कहा।

"पहले मेरी दीवारों में दरार डाल दी..."

"और अब... बेहोशी में भी मेरा हाथ छोड़ने का नाम नहीं ले रहीं।"

उसने एक गहरी साँस ली।

फिर बहुत शांत स्वर में बोला—

"आपको कुछ नहीं होगा।"

"जब तक मैं साँस ले रहा हूँ... किसी को आपको छूने नहीं दूँगा।" 🥀

उसी क्षण...

धड़ाम!! 

कमरे का दरवाज़ा ज़ोर से खुला।

तेज़ कदमों की आवाज़ पूरे कमरे में गूँज उठी। 
अर्जुन एक झटके से खड़ा हो गया।
पलक झपकते ही उसके चेहरे पर फिर वही सख़्त मुखौटा लौट आया।
उसने धीरे से सिया का हाथ तकिए पर रखा...

और मुड़कर दरवाज़े की ओर देखा।

अगले ही पल...

उसकी आँखें सिकुड़ गईं।

"तुम...?!" 😳

दरवाज़े पर खड़ा चेहरा देखकर कमरे की हवा जैसे थम गई।

उस शख़्स की साँसें तेज़ चल रही थीं...

आँखों में घबराहट भी थी...
और एक ऐसा सच भी...
जो पूरे महल की नींव हिला देने वाला था। 👀

💞तुम्हें खोने का डर क्यों है,
ये सवाल मैं खुद से हर पल करता हूँ।
फिर याद आता है...
कुछ रिश्ते इज़हार नहीं माँगते,
बस किसी की सलामती की दुआ बन जाते हैं। 🌸


जारी(..)

© Diksha 

प्रिय पाठकों,

यह भाग 2000+ शब्दों का है। इसे लिखने में मुझे बहुत समय, मेहनत और प्यार लगा है। यदि आपको यह अध्याय पसंद आया हो, तो कृपया इसे रेटिंग दें और अपने रिव्यू ज़रूर साझा करें।

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— Diksha "मिस कहानी" 🌸💗