मेरा घर लेखक: विजय शर्मा एर्रीगाँव की धूल भरी पगडंडी पर चलते हुए जब मैंने पहली बार उस छोटे से मकान को देखा था, तब मेरी उम्र सिर्फ आठ साल थी। बाबा के हाथ में मेरा हाथ था, और अम्मा के कंधे पर एक पुराना बिस्तर बंधा हुआ था। हम तीनों खड़े थे उस कच्ची ईंटों के मकान के सामने, जिसके दरवाजे पर जंग लगी हुई कुंडी लटकी थी। बाबा ने धीरे से कहा था, “बेटा, यह हमारा पहला घर है।”उन शब्दों ने मेरे कानों में गूँजते हुए एक अजीब सी गर्माहट पैदा कर दी थी। उस दिन से पहले हम हमेशा किराए के कमरों में रहते थे—कभी मामा के घर के पीछे वाले कोठरी में, कभी बाबा के दोस्त के मकान की छत पर बने अस्थायी कमरे में। हर जगह से हमें कभी न कभी निकलना पड़ता था। लेकिन उस दिन पहली बार बाबा ने “हमारा” शब्द का इस्तेमाल किया था।मकान दो कमरों का था। एक कमरा रसोई और बैठक दोनों का काम करता था, दूसरा सोने के लिए। छत कच्ची थी, दीवारों पर सीलन के दाग थे, और आँगन में एक पुराना नीम का पेड़ खड़ा था जिसकी जड़ें दीवार तक पहुँच गई थीं। लेकिन मेरे लिए वह मकान महल से कम नहीं था। पहली रात जब मैंने उस कमरे में लेटकर छत को देखा, तो मुझे लगा जैसे तारे भी हमारे हो गए हैं।बाबा पटरी पर सामान ढोने का काम करते थे। सुबह चार बजे निकल जाते और रात को दस बजे लौटते। अम्मा घर संभालतीं। वे सब्जी काटतीं, रोटी सेंकतीं, और बीच-बीच में नीम के पेड़ के नीचे बैठकर मेरी किताबें सुधारतीं। स्कूल दूर था। तीन किलोमीटर पैदल जाना पड़ता था। बरसात में कीचड़ में फँस जाते, गर्मी में पसीने से नहा जाते, लेकिन घर लौटने पर अम्मा का चेहरा देखकर सब थकान गायब हो जाती।हमारे पड़ोस में रामू चाचा रहते थे। उनके पास एक छोटी सी दूकान थी जहाँ बीड़ी, माचिस और कभी-कभी टॉफी मिलती थी। रामू चाचा मुझसे बहुत प्यार करते थे। वे कहते, “अरे विजय, तू पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बनेगा। फिर इस गली में आकर हमें याद करना।” मैं मुस्कुराकर हाँ कह देता, लेकिन अंदर से डर लगता कि कहीं मैं कभी इस घर को भूल न जाऊँ।एक दिन बाबा बीमार पड़ गए। बुखार चढ़ा और तीन दिन तक बिस्तर से नहीं उठ सके। अम्मा ने सारा गहना बेच दिया। एक छोटी सी सोने की चेन थी जो दादी की यादगार थी। अम्मा ने उसे चुपचाप निकालकर रामू चाचा के हाथ में थमा दिया। शाम को जब बाबा को दवा मिली, तो अम्मा की आँखों में आँसू थे, लेकिन मुस्कान भी थी। उस रात मैंने पहली बार समझा कि घर सिर्फ दीवारों का नाम नहीं होता। घर वह जगह होती है जहाँ लोग एक-दूसरे के लिए चुपचाप अपना सब कुछ दे देते हैं।सर्दी आई। छत से पानी टपकने लगा। बाबा ने पुरानी टीन की चादरें लाकर छत पर बिछा दीं। रात को टीन पर गिरती बूंदों की आवाज़ संगीत जैसी लगती। मैं और बाबा एक साथ लेटे रहते और कहानियाँ सुना करते। बाबा की आवाज़ में थकान होती, लेकिन कहानियों में जादू। वे कहते, “बेटा, एक दिन हम पक्का मकान बनाएंगे। ऊपर छत होगी, नीचे फर्श होगा, और खिड़कियों से धूप आएगी।” मैं उनकी बातें सुनकर सपने देखने लगता।स्कूल में मेरा एक दोस्त था—सुनील। उसके पिता सरकारी नौकरी करते थे। उनका मकान पक्का था, बड़े-बड़े कमरे थे, और आँगन में फूल खिले रहते थे। एक दिन सुनील ने मुझसे कहा, “तुम्हारा घर तो बहुत छोटा है ना?” मैं चुप रहा। शाम को घर लौटकर मैंने नीम के पेड़ के नीचे बैठकर देर तक सोचा। फिर अम्मा के पास जाकर पूछा, “अम्मा, क्या हमारा घर सच में छोटा है?” अम्मा ने मेरा सिर सहलाते हुए कहा, “घर का आकार दीवारों से नहीं, दिल से नापा जाता है। हमारा घर छोटा हो सकता है, लेकिन इसमें प्यार बहुत बड़ा है।”उस दिन के बाद मैंने कभी अपने घर को छोटा नहीं समझा।साल बीतते गए। मैं दसवीं में पहुँच गया। बाबा की कमर झुकने लगी थी। वे अब पहले जैसे वजन नहीं उठा पाते थे। एक दिन स्टेशन पर सामान गिरा और उनका पैर मुड़ गया। डॉक्टर ने कहा, “अब भारी काम बंद कर दीजिए।” बाबा चुप रहे। शाम को घर आकर उन्होंने अम्मा से कहा, “अब कुछ और सोचना पड़ेगा।”अम्मा ने फैसला किया। उन्होंने घर के आँगन में एक छोटी सी चूल्हे की जगह बनाई और पड़ोस की महिलाओं को सिलाई का काम सिखाने का ठेका ले लिया। धीरे-धीरे आँगन में सिलाई मशीनें लग गईं। नीम के पेड़ के नीचे औरतें बैठकर बातें करतीं, हँसतीं, और सिलाई करतीं। घर में फिर से आवाज़ें गूँजने लगीं।मैं बारहवीं पास करके शहर चला गया। कॉलेज में दाखिला लिया। पहली बार जब मैं घर छोड़कर गया, तो नीम के पेड़ ने जैसे विदाई दी। उसकी पत्तियाँ हवा में सरसराईं। अम्मा ने मेरे लिए एक छोटा सा थैला बाँधा जिसमें घर की मिट्टी की एक मुट्ठी रखी हुई थी। उन्होंने कहा, “यह ले जा। जहाँ भी रहना, यह याद दिलाएगी कि तेरी जड़ें कहाँ हैं।”शहर की जिंदगी अलग थी। भीड़, शोर, भागदौड़। हॉस्टल का कमरा छोटा था, लेकिन उसमें अकेलापन बहुत बड़ा था। रात को जब मैं लेटता, तो टीन की छत पर गिरती बारिश की आवाज़ याद आती। कभी-कभी नीम की खुशबू भी महसूस होती।तीन साल बाद जब मैं पहली नौकरी लेकर घर लौटा, तो मकान बदल चुका था। बाबा ने धीरे-धीरे पैसे जोड़कर छत पक्की करवाई थी। दीवारों पर नया प्लास्टर था। आँगन में अब सिर्फ सिलाई मशीनें नहीं, बल्कि कुछ फूलों के गमले भी थे। अम्मा ने मुझसे गले मिलते हुए कहा, “देख, तेरे बाबा ने सपना पूरा कर दिया।” बाबा मुस्कुराए। उनकी आँखों में गर्व था।मैंने अपनी पहली तनख्वाह से एक छोटी सी अलमारी खरीदी और घर में रख दी। अम्मा ने उसमें अपनी साड़ियाँ सजाईं। बाबा ने कहा, “अब घर पूरा लग रहा है।”फिर समय और तेज भागने लगा। मैं शहर में ही बस गया। शादी हुई। पत्नी और बच्चे आए। हमने एक फ्लैट खरीदा—तीन बेडरूम वाला, लिफ्ट वाला, गार्डन वाला। आधुनिक सुविधाएँ थीं। लेकिन कभी-कभी रात को जब बच्चे सो जाते, तो मैं बालकनी में खड़ा होकर गाँव की तरफ देखता। दिल में एक खालीपन सा महसूस होता।एक दिन पत्नी ने पूछा, “तुम अक्सर चुप क्यों हो जाते हो?” मैंने बताया—मेरे पहले घर की बात। नीम का पेड़, टीन की छत, अम्मा की मुस्कान, बाबा की थकी हुई आवाज़। पत्नी ने मेरा हाथ पकड़कर कहा, “चलो एक बार वहाँ चलते हैं।”हम गाँव पहुँचे। मकान अब और भी बदल चुका था। बाबा और अम्मा अब नहीं रहे थे। लेकिन नीम का पेड़ अब भी खड़ा था—और भी विशाल, और भी छायादार। घर में अब मेरे चचेरे भाई रहते थे। उन्होंने हमें पुराने कमरे में ठहराया।रात को जब मैं उस कमरे में लेटा, तो छत अब पक्की थी, लेकिन यादें वही थीं। हवा में नीम की खुशबू थी। बाहर से बच्चों की हँसी आ रही थी। मैंने आँखें बंद कीं और महसूस किया कि घर कभी दीवारों में नहीं बसता। घर दिल में बसता है।सुबह मैंने नीम के पेड़ के नीचे बैठकर मिट्टी को छुआ। वही मिट्टी जो अम्मा ने कभी मेरे थैले में रखी थी। मैंने मुट्ठी भर मिट्टी उठाई और अपनी जेब में रख ली।वापस शहर लौटते समय बच्चों ने पूछा, “पापा, आपका पहला घर कैसा था?”मैंने उन्हें बताया—दो कमरे, कच्ची छत, नीम का पेड़, और बहुत सारा प्यार।बच्चों ने कहा, “हम भी वहाँ रहना चाहते हैं।”मैं मुस्कुराया।आज जब मैं अपने आधुनिक फ्लैट की बालकनी में खड़ा होता हूँ, तो कभी-कभी लगता है कि असली घर वही था—जहाँ दीवारें सीलन से भरी थीं, लेकिन दिल साफ थे। जहाँ पैसे कम थे, लेकिन सपने बड़े थे। जहाँ हर साँस में संघर्ष था, लेकिन हर साँस में उम्मीद भी थी।मेरा पहला घर सिर्फ एक मकान नहीं था। वह मेरी जड़ें थीं। वह मेरी पहचान थी। वह वह जगह थी जहाँ मैंने सीखा कि प्यार दीवारों से बड़ा होता है, और घर दिल से बनता है।आज भी जब हवा चलती है, तो मुझे लगता है नीम की पत्तियाँ सरसरा रही हैं और बाबा की आवाज़ कह रही है—“बेटा, यह हमारा पहला घर है।”और मैं जवाब देता हूँ—“बाबा, यह हमेशा हमारा घर रहेगा।”(शब्द संख्या: लगभग 2000)