विद्या और अविद्या Kapil Tiwari द्वारा आध्यात्मिक कथा में हिंदी पीडीएफ

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विद्या और अविद्या

“विद्या और अविद्या किसको कहते हैं?” तो बड़ा सारगर्भित और संक्षिप्त उत्तर देता है उपनिषद्: “अहंभाव की जन्मदात्री अविद्या है और जिसके द्वारा अहंभाव समाप्त हो जाए, वही विद्या है।“

-सर्वसार उपनिषद्, श्लोक- 3 जिससे अहंभाव जन्म ले, वो है अविद्या, और जिससे अहंभाव समाप्त हो जाए, वो है विद्या।

दो तरह का ज्ञान हो सकता है: एक ज्ञान वो जिसमें मात्र विषय की, जो दिखाई पड़ रहा है, जो ऑब्जेक्ट (वस्तु) है, उसकी बात होती है, उसको कहते हैं अविद्या।

अविद्या के माध्यम से समाज को जानने मे मदद मिलती हैं , जो हमें स्कूल, कॉलेज, युनिवर्सिटी में दी जाती हैं।

ये हमको बताती हैं कि बाहरी दुनिया कैसी है समाज कैसा है। इसके प्रमुख विषय जैसे विज्ञान, भूगोल, इतिहास, समाजशास्त्र, चिकित्सा, आदि.... जो हमको बाहर की चीजों को समझने मे सहूलियत प्रदान करती हैं। उसे अविद्या कहते हैं।

और वो ज्ञान जिसमें आप न सिर्फ़ विषय को बल्कि विषेयता को भी देख रहे हो, न सिर्फ़ ऑब्जेक्ट को बल्कि सब्जेक्ट को भी देख रहे हो, उसको कहते हैं विद्या।

ज्ञान वास्तव में सिर्फ़ तब है जब आप दृश्य के साथ-साथ दृष्टा की भी चर्चा करो। जब आप ये तो कहो ही कि क्या हुआ, साथ ही ये भी बताओ कि किसके साथ हुआ। ये तो बताओ ही कि क्या देखा, ये भी बताओ कि देखने वाला कौन था। दोनों को एक साथ बता दिया तो ये क्षेत्र हुआ विद्या का, ज्ञान का, नॉलेज का। और अगर बस ये बताया कि क्या देखा तो ये फ़िर क्षेत्र हुआ अविद्या का,। तो अविद्या ज्ञान का अभाव नहीं होती, अविद्या ज्ञान का अधूरापन होती है। अविद्या खंडित ज्ञान को कहते हैं। अविद्या उस ज्ञान को कहते हैं जहाँ ज्ञानी अपनी ओर से बिलकुल अनभिज्ञ, अपरिचित, बेखबर होता है।

जैसे कोई ज्ञानी महाराज निकले हैं ज्ञान इकट्ठा करने के लिए, पर ज्ञान के नाम पर वो बस क्या इकट्ठा कर रहे हैं? “ये खंबा कितना ऊँचा है? वहाँ हवा कैसी चल रही है? वहाँ लोग कितने बैठे हुए हैं? उस फ़ैक्टरी में क्या बन रहा है? ये सड़क कहाँ तक जाती है?” और इन सब बातों को वो किस चीज़ का नाम दे रहे हैं? ज्ञान का।

इन सब बातों में कौन सी चीज़ है जिसका वो नाम भी नहीं ले रहे? अपना नाम नहीं ले रहे, अपना नाम नहीं ले रहे बिलकुल। ये नहीं बता रहे वो कि तुम्हारी इतनी रुचि क्यों है उस सड़क की लंबाई गिनने में और तुम किस चीज़ के भूखे हो जो उस फ़ैक्टरी की ओर बार-बार पूछ रहे हो, "क्या बनता है इसमें, क्या बनता है इसमें?" और तुम्हें वहाँ कौन भा गया है जो बार-बार पूछ रहे हो, "वो लोग कौन हैं, कहाँ से आए हैं, किस परिवार के हैं, किस घर के हैं, कब तक रहेंगे, कब जाएँगे?" तुम अपना भी तो कुछ हाल बताओ। क्योंकि यूँ ही तो तुम्हें किसी चीज़ में रुचि नहीं हो जाती है। या हो जाती है? कभी ऐसा हुआ है कि तुमने कहा है कि ‘मुझे सब कुछ बताओ’? कभी तुम्हारे पास कोई ये सवाल लेकर आया है, "मुझे सब कुछ बताओ"?

अविद्या इसीलिए इतनी फैली हुई है क्योंकि अविद्या में सुरक्षा है। क्या सुरक्षा है? अविद्या में कोई तुमसे यह नहीं पूछने वाला, "तुम कौन हो, तुम कैसे हो?" तुमसे बस यह पूछा जाएगा कि तुम्हारे पास डिग्रियाँ कौन-कौन सी हैं। तुमने क्या-क्या अर्जित करा ज्ञान, यह पूछा जाएगा। यह अविद्या का क्षेत्र है। तुमसे कोई यह नहीं पूछेगा, "तुम कौन हो? अपना हाल-चाल बताओ। कहाँ से आए, कहाँ को जाना?" यह कोई नहीं पूछेगा। इसीलिए तुम पाते हो कि इतनी संस्थाएँ हैं जो अविद्या का प्रसार कर रही हैं। हमारी सारी जो व्यवस्था है, हमारे कॉलेज हैं, स्कूल हैं, हमारे विश्वविद्यालय हैं, ये वास्तव में अविद्या के केंद्र हैं, ये अविद्यालय हैं। विद्या क्या है फ़िर? विद्या तब है, जैसा हमने कहा, जिसमें दृष्टा, दृश्य दोनों की बात एक साथ हो। 'तुम कौन हो', यह ज़रूर जब पूछा जाए, मात्र तब है विद्या। क्या विद्या और अविद्या के आगे भी कुछ होता है? नहीं।

अध्यात्म विद्या ही है। बस अध्यात्म में ज्ञान के साथ-साथ एक आकांक्षा भी है। क्या आकांक्षा? मुक्ति।

सत्य यहीं हैं कि हमको सबको दोनों विद्याओं (विद्या और अविद्या) की आवश्यकता होती हैं। विद्या के लिए हम अपने सर्वोच्च्य ग्रंथों का या एक अच्छे से जानकार ग्रंथों को समझाने वाले की सहायता ले सकते हैं।

और अविद्या के लिए हम स्कूल, कॉलेज का अनुसरण कर सकते हैं।

जिन्होंने सिर्फ अविद्या को जाना बो अपनी आंतरिक दुनिया से अनजान रहेगा और आंतरिक द्वंद्वों में फस कर रह जाएगा। और जिन्होंने सिर्फ विद्या जानी बो अपनी बाहरी दुनिया में फस कर रह जाएगा क्योंकि उसे विज्ञान की समझ होगी नहीं तो बो अंधविश्वास या और भी चीजों में फस कर रह जाएगा।

और हमारे समाज की ये बड़ी विडंबना है की हमको सिर्फ अविद्या पढ़ाई जाती है बस..... हमारी आंतरिक दुनिया का कुछ पता नहीं क्योंकि ये हमारी शिक्षा पद्धति में नहीं होती हैं और ये सबसे बड़ी कमी महसूस होती हैं। इसी लिए तो हमको विज्ञान का तो पता है लेकिन खुद का कुछ नहीं पता.... जो उचित नहीं हैं।

~ कपिल तिवारी “यथार्थ”