अन्या :एक अधूरी मुस्कान rawat द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

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अन्या :एक अधूरी मुस्कान

बारिश उस दिन कुछ ज़्यादा ही तेज़ हो रही थी। आसमान जैसे खुद भी किसी गहरे दुख में डूबा हुआ था। घर के आँगन में लोगों की भीड़ थी, लेकिन उस भीड़ के बीच एक छोटी-सी लड़की बिल्कुल अकेली खड़ी थी।

उसकी उम्र सिर्फ़ बारह साल थी, लेकिन उस दिन उसकी आँखों में बचपन कहीं खो गया था।

अन्या अपनी माँ की तस्वीर को सीने से लगाए बस दरवाज़े की तरफ देख रही थी। उसे अब भी उम्मीद थी कि उसकी माँ वापस आएगी और उसे अपनी बाहों में भर लेगी।

"माँ... आप बोलती थीं ना कि कभी मुझे अकेला नहीं छोड़ोगी... फिर आज इतनी दूर क्यों चली गईं?"

उसकी आवाज़ बारिश के शोर में कहीं खो गई।

घर के बड़े लोग उसे समझाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन किसी के शब्द उसके दिल तक नहीं पहुँच रहे थे। उसके लिए तो उसकी पूरी दुनिया ही खत्म हो चुकी थी।

उसकी माँ मीरा सिर्फ़ उसकी माँ नहीं थीं, बल्कि उसकी सबसे अच्छी दोस्त भी थीं। अन्या को याद था कैसे हर रात सोने से पहले उसकी माँ उसे कहानियाँ सुनाती थीं। कैसे वह छोटी-छोटी बातों पर हँसती थीं और कैसे कहती थीं—

"अन्या, ज़िंदगी में चाहे कितनी भी मुश्किलें आएँ, लेकिन अपनी मुस्कान कभी मत खोना।"

लेकिन उस दिन के बाद अन्या की मुस्कान जैसे कहीं खो गई।

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समय कभी किसी के लिए नहीं रुकता।माँ के जाने के बाद घर वही था, कमरे वही थे, दीवारें वही थीं... लेकिन सब कुछ बदल गया था।पहले जिस घर में माँ की हँसी गूँजती थी, वहाँ अब सिर्फ़ खामोशी रहती थी।

अन्या के पिता, राजेश, भी अंदर से टूट चुके थे। वह अपनी बेटी से प्यार करते थे, लेकिन काम और अकेलेपन के बीच वह भी धीरे-धीरे बदलने लगे।

कुछ महीनों बाद एक दिन उन्होंने अन्या से कहा—

"बेटा, मैं चाहता हूँ कि हमारे घर में फिर से खुशियाँ आएँ।"

अन्या चुपचाप उन्हें देखती रही।

"तुम्हारी ज़िंदगी में भी किसी माँ की कमी नहीं रहेगी।"

अन्या कुछ समझ नहीं पाई। फिर उसके पिता ने बताया कि वह दूसरी शादी करने वाले हैं।उस रात अन्या अपनी माँ की तस्वीर के सामने बैठकर बहुत देर तक रोती रही।

"माँ... क्या कोई आपकी जगह ले सकता है?"

उस सवाल का जवाब उसे नहीं मिला।

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कुछ दिनों बाद घर में नई महिला आईं।उनका नाम कविता था।
शुरुआत में कविता ने अन्या के सिर पर हाथ रखा और प्यार से कहा—

"अब से मैं तुम्हारी माँ जैसी हूँ।"

अन्या ने पहली बार कई महीनों बाद हल्की-सी मुस्कान दी।उसे लगा शायद उसकी ज़िंदगी फिर से ठीक हो जाएगी।
कुछ समय तक सब अच्छा रहा। कविता उसके लिए नए कपड़े लातीं, उससे प्यार से बात करतीं और लोगों के सामने उसे अपनी बेटी कहतीं।

लेकिन धीरे-धीरे चीज़ें बदलने लगीं।
पहले छोटी-छोटी बातें शुरू हुईं।

"अन्या, अपना कमरा खुद साफ़ कर लिया करो।"

फिर—

"घर के काम में हाथ बँटाना सीखो।"

और कुछ समय बाद—

"तुम्हें इतना भी नहीं आता? तुम्हारी उम्र की लड़कियाँ तो पूरा घर संभाल लेती हैं।"

अन्या चुप रहती।

वह हर बात को सह लेती, क्योंकि उसे डर था कि अगर उसने कुछ कहा तो उसके पिता परेशान हो जाएंगे।समय बीतता गया।
बारह साल की अन्या अब सत्रह साल की हो चुकी थी।
वह पढ़ाई में बहुत अच्छी थी। उसके स्कूल के शिक्षक कहते थे कि अगर उसे मौका मिला तो वह बहुत आगे जा सकती है।

लेकिन घर में उसकी मेहनत किसी को दिखाई नहीं देती थी।
सुबह पाँच बजे उसका अलार्म बजता।
वह उठती, घर का काम करती, फिर कॉलेज के लिए तैयार होती।

एक दिन कविता ने कहा—
"इतनी पढ़ाई करके क्या मिलेगा? आखिर में तो घर ही संभालना है।"

अन्या ने पहली बार हिम्मत करके पूछा—

"माँ... अगर मैं कुछ बनना चाहती हूँ तो?"
कविता हँस पड़ीं।
"सपने देखने से कोई अमीर नहीं बन जाता।"

ये शब्द अन्या के दिल में उतर गए।लेकिन उसने हार नहीं मानी।
उसे अपनी असली माँ की बात याद थी—

"अपनी मुस्कान कभी मत खोना।"

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कॉलेज का पहला दिन था।अन्या ने अपनी पुरानी लेकिन साफ़ ड्रेस पहनी और आईने में खुद को देखा।
चेहरे पर थकान थी, लेकिन आँखों में एक उम्मीद थी।

"नई शुरुआत..." उसने धीरे से कहा।

वह कॉलेज पहुँची।चारों तरफ नए चेहरे थे। कोई हँस रहा था, कोई दोस्तों से मिल रहा था।अन्या थोड़ी घबराई हुई थी।
वह रास्ता ढूँढते हुए तेज़ी से चल रही थी कि अचानक किसी से टकरा गई।

उसकी किताबें ज़मीन पर गिर गईं।
"सॉरी..." उसने जल्दी से कहा और किताबें उठाने लगी।

सामने खड़ा लड़का कुछ देर उसे देखता रहा।
"आपको चलना आता है या सिर्फ़ किताबों से बात करना?"

अन्या ने ऊपर देखा।

"अगर आप रास्ते में खड़े नहीं होते तो शायद मैं टकराती नहीं।"
लड़का हैरान रह गया।
"अच्छा... जवाब भी देती हैं?"
अन्या ने किताबें उठाईं और बिना कुछ बोले आगे बढ़ गई।
वह लड़का मुस्कुराया।
"अजीब लड़की है..."

उसे नहीं पता था कि यह छोटी-सी मुलाकात आगे चलकर उसकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा मोड़ बनने वाली है।

उस शाम जब अन्या घर वापस आई तो माहौल बदला हुआ था।
कविता उसके कमरे में खड़ी थीं।

उनके हाथ में अन्या का कॉलेज का फॉर्म था।
"ये क्या है?"
अन्या घबरा गई।
"कॉलेज का फॉर्म..."
"मैंने कहा था ना, इतनी पढ़ाई की ज़रूरत नहीं है।"
"लेकिन माँ..."
कविता की आँखें सख्त हो गईं।
"कल से कॉलेज जाना बंद।"
अन्या के हाथ से बैग नीचे गिर गया।
उसकी आँखों में आँसू आ गए।

वर्षों से दबा हुआ दर्द आज पहली बार बाहर आने लगा।
क्या वह अपनी माँ का आखिरी सपना पूरा कर पाएगी?