यजुर्वेद सूक्ति (9) की व्याख्या"प्र प्र दातारं तारिष"यजुर्वेद --11/83भावार्थ --हे ईश्वर ! अन्न देने वाले की रक्षा करो। पूरा मंत्र अर्थ सहितशुक्ल यजुर्वेद (माध्यन्दिन संहिता) अध्याय 11, मंत्र 83 का मूल मंत्र इस प्रकार है—अन्नपतेऽन्नस्य नो देह्यनमीवस्य शुष्मिणः।प्र प्र दातारं तारिष ऊर्जं नो धेहि द्विपदे चतुष्पदे॥पदच्छेद एवं शब्दार्थअन्नपते — हे अन्न के स्वामी (परमेश्वर)!अन्नस्य — अन्न का।नः — हमें।देहि — प्रदान करें।अनमीवस्य — रोगरहित, दोषरहित।शुष्मिणः — बलवर्धक, सामर्थ्ययुक्त।प्र प्र — भली-भाँति, आगे-आगे, पूर्ण रूप से।दातारम् — अन्न देने वाले (दाता) को।तारिष — पार लगाओ, रक्षा करो, संकट से बचाओ।ऊर्जम् — शक्ति, पोषण, ऊर्जा।नः — हमें।धेहि — प्रदान करें।द्विपदे — दो पैरों वाले प्राणियों (मनुष्यों) के लिए।चतुष्पदे — चार पैरों वाले प्राणियों (पशुओं) के लिए।भावार्थहे अन्न के स्वामी परमेश्वर! हमें रोगरहित, बलवर्धक और पौष्टिक अन्न प्रदान करें। अन्न देने वाले दाता की रक्षा करें, उसे सभी संकटों से उबारें। हमें तथा दो पैरों वाले और चार पैरों वाले सभी प्राणियों को पोषण, बल, ऊर्जा और समृद्धि प्रदान करें।विशेष टिप्पणी"प्र प्र दातारं तारिष" का अर्थ केवल "दाता की रक्षा करो" ही नहीं, बल्कि "अन्न देने वाले को सभी बाधाओं से पार लगाओ, उसकी उन्नति और कल्याण करो" भी है। वैदिक व्याख्याकारों ने यहाँ "तारिष" धातु का अर्थ संकट से पार कराना, रक्षा करना, उन्नति देना माना है।इस प्रकार यह मंत्र केवल अपने लिए अन्न की प्रार्थना नहीं करता, बल्कि अन्नदाता के कल्याण तथा समस्त मनुष्यों और पशुओं के पोषण की भी मंगलकामना करता है।वेदों में प्रमाण--"प्र प्र दातारं तारिष" (शुक्ल यजुर्वेद 11.83) का भाव है—"हे परमेश्वर! अन्न देने वाले (अन्नदाता) की रक्षा करो, उसे उन्नति दो।" इस भावना का समर्थन अन्य वैदिक मंत्रों में भी मिलता है।नीचे वेदों से प्रमाण प्रस्तुत हैं:1. शुक्ल यजुर्वेद 11.83अन्नपतेऽन्नस्य नो देह्यनमीवस्य शुष्मिणः।प्र प्र दातारं तारिष ऊर्जं नो धेहि द्विपदे चतुष्पदे॥अर्थ:हे अन्नपति! हमें रोगरहित, बलदायक अन्न दो। अन्नदाता की रक्षा करो तथा मनुष्यों और पशुओं को पोषण दो।2. ऋग्वेद 10.117.1उतो रयिः पृणतो नोपदस्यति।अर्थ:जो दान देता है, उसका धन घटता नहीं; वह समृद्ध होता है।भाव:दाता की उन्नति और रक्षा का वैदिक सिद्धान्त।3. ऋग्वेद 10.117.6केवलाघो भवति केवलादी।अर्थ:जो अकेला खाता है और दूसरों को नहीं देता, वह पाप का भागी बनता है।भाव:अन्न बाँटना और दान करना धर्म है।4. अथर्ववेद 3.24शतहस्त समाहर सहस्रहस्त संकिर।अर्थ:सौ हाथों से कमाओ और हजार हाथों से बाँटो।भाव:दाता बनने और समाज का पालन करने की प्रेरणा।5. ऋग्वेद 10.117.3स इद्भोजो यो गृहवे ददात्यन्नकामाय चरते कृशाय।अर्थ:वही सच्चा उदार पुरुष है जो भूखे और याचक को अन्न देता है।भाव:अन्नदाता की महिमा और अन्नदान का महत्व।निष्कर्षवेदों में यह शिक्षा स्पष्ट रूप से मिलती है कि—अन्न ईश्वर का वरदान है।अन्नदाता की रक्षा और उन्नति की प्रार्थना करनी चाहिए।भूखे को भोजन देना धर्म है।जो अन्न बाँटता है, वही सच्चा पुण्यात्मा और समाज का हितैषी है।ये सभी मंत्र शुक्ल यजुर्वेद 11.83 के "प्र प्र दातारं तारिष" भाव की पुष्टि करते यजुर्वेद 11.83 का मंत्र है—अन्नपतेऽन्नस्य नो देह्यनमीवस्य शुष्मिणः।प्र प्र दातारं तारिष ऊर्जं नो धेहि द्विपदे चतुष्पदे॥ भावार्थ:हे अन्न के अधिपति परमेश्वर! हमें रोगरहित, बलवर्धक अन्न प्रदान करें। अन्न देने वाले (दाता) की रक्षा करें, उसका कल्याण करें, तथा हमारे दोपायों और चौपायों सभी प्राणियों को ऊर्जा और पोषण दें। उपनिषदों में प्रमाण--उपनिषदों में समान भाव के प्रमाण प्रस्तुत हैं--यद्यपि "अन्न देने वाले की रक्षा करो" यह वाक्य इसी रूप में किसी प्रमुख उपनिषद में नहीं मिलता, लेकिन अन्न के महत्व और अन्नदान के सम्मान का वही सिद्धांत मिलता है—1--तैत्तिरीयोपनिषद् (शिक्षावल्ली 1.11.2)अन्नं न निन्द्यात्। तद्व्रतम्।अन्नं न परिचक्षीत। तद्व्रतम्।भावार्थ: अन्न की निन्दा न करो। अन्न का तिरस्कार या अस्वीकार न करो। यही व्रत है।2--तैत्तिरीयोपनिषद् (शिक्षावल्ली 1.11.2)अन्नं बहु कुर्वीत। तद्व्रतम्।भावार्थ: अधिक से अधिक अन्न उत्पन्न करो और उपलब्ध कराओ। यही व्रत है।3--तैत्तिरीयोपनिषद् (भृगुवल्ली 3.2)अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात्।भावार्थ: भृगु ने जाना कि अन्न भी ब्रह्मस्वरूप है, क्योंकि समस्त प्राणी अन्न से ही उत्पन्न, जीवित और पोषित होते हैं।इन उपनिषद वचनों से स्पष्ट होता है कि अन्न का सम्मान, अन्न की वृद्धि और अन्नदाता का आदर वैदिक परंपरा का मूल सिद्धांत है। यजुर्वेद 11.83 में अन्नदाता के कल्याण की प्रार्थना की गई है, जबकि तैत्तिरीयोपनिषद् अन्न को ब्रह्मस्वरूप मानकर उसके संरक्षण और संवर्धन का उपदेश देता है। पुराणों में प्रमाण--यदि विषय "अन्नदाता का सम्मान, अन्नदान का महत्त्व और अन्न देने वाले के कल्याण" है, तो पुराणों में इस भाव के कई प्रमाण मिलते हैं। यहाँ पाँच प्रमुख प्रमाण दिए जा रहे हैं:1--पद्म पुराण (उत्तरखण्ड, अध्याय 96, श्लोक 7)अन्नदानात् परं दानं न भूतं न भविष्यति।भावार्थ: अन्नदान से बढ़कर न कोई दान पहले हुआ है और न भविष्य में होगा।2--गरुड़ पुराण (आचारकाण्ड, अध्याय 218, श्लोक 10)अन्नदः प्राणदो लोके सर्वदानफलप्रदः।भावार्थ: अन्न देने वाला वास्तव में प्राण देने वाला है और उसे सभी दानों का फल प्राप्त होता है।3--स्कन्द पुराण (काशीखण्ड, अध्याय 23, श्लोक 45)अन्नदानं परं दानं विद्यादानमतः परम्।भावार्थ: अन्नदान महान दान है, क्योंकि इससे प्राणियों की रक्षा होती है।4--अग्नि पुराण (अध्याय 209, श्लोक 5)अन्नेन तृप्यते सर्वं जगत् स्थावरजङ्गमम्।भावार्थ: समस्त चर-अचर जगत अन्न से ही तृप्त और पोषित होता है।5--भविष्य पुराण (ब्राह्मपर्व, अध्याय 36, श्लोक 18)अन्नदानं महादानं सर्वदानेषु विशिष्यते।भावार्थ: सभी दानों में अन्नदान श्रेष्ठ और महादान माना गया है।ध्यान दें: विभिन्न पुराणों के अलग-अलग संस्करणों में अध्याय और श्लोक संख्या में कुछ अंतर हो सकता है। भगवद्गीता में प्रमाण-यदि विषय "अन्न का महत्व, अन्नदाता का सम्मान और अन्न से प्राणियों का पालन" है, तो श्रीमद्भगवद्गीता में ये प्रमुख प्रमाण मिलते हैं:1--भगवद्गीता-- 3.13यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः।भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्॥भावार्थ: जो लोग यज्ञ के बाद बचा हुआ अन्न ग्रहण करते हैं, वे पापों से मुक्त होते हैं। जो केवल अपने लिए भोजन पकाते हैं, वे पाप का ही भक्षण करते हैं.।2--भगवद्गीता 3.14अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः।यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः॥भावार्थ: सभी प्राणी अन्न से जीवित रहते हैं। अन्न वर्षा से उत्पन्न होता है, वर्षा यज्ञ से होती है और यज्ञ नियत कर्म से उत्पन्न होता है। 3--भगवद्गीता 3.15कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्।तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्॥भावार्थ: कर्म वेद से उत्पन्न हैं, वेद परमात्मा से प्रकट हुए हैं; इसलिए यज्ञ में परमात्मा की प्रतिष्ठा है। ये तीनों श्लोक मिलकर यजुर्वेद 11.83 के भाव—अन्न, अन्नदाता और लोक-पालन—का गीता में सशक्त समर्थन महाभारत में अन्नदान और अन्नदाता के महत्त्व का अनेक स्थानों पर वर्णन है। महाभारत में प्रमाण--यहाँ पाँच प्रमाण दिए जा रहे हैं:1--महाभारत (अनुशासन पर्व, अध्याय 63, श्लोक 7)अन्नदानात्परं दानं न भूतं न भविष्यति।भावार्थ: अन्नदान से बढ़कर न कोई दान हुआ है और न होगा।2=-महाभारत (अनुशासन पर्व, अध्याय 63, श्लोक 11)अन्नं हि प्राणिनां प्राणः।भावार्थ: अन्न ही समस्त प्राणियों का प्राण है।3--महाभारत (अनुशासन पर्व, अध्याय 63, श्लोक 18)अन्नदः प्राणदो लोके सर्वदानफलप्रदः।भावार्थ: अन्न देने वाला वास्तव में प्राण देने वाला है और वह सभी दानों का फल प्राप्त करता है।4--महाभारत (अनुशासन पर्व, अध्याय 63, श्लोक 25)अन्नेन धार्यते सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम्।भावार्थ: समस्त चर और अचर जगत अन्न के द्वारा ही धारण किया जाता है।5--महाभारत (अनुशासन पर्व, अध्याय 63, श्लोक 31)तस्मादन्नप्रदानेन तुष्यन्ति सर्वदेवताः।भावार्थ: इसलिए अन्नदान से सभी देवता प्रसन्न होते हैं।टिप्पणी: महाभारत के विभिन्न संस्करणों (जैसे गीता प्रेस, क्रिटिकल एडिशन, दक्षिण भारतीय पाठ आदि) में अध्याय और श्लोक संख्या में कुछ अंतर हो सकता होस्मृतियों में प्रमाण--अन्नदान, अन्नदाता के सम्मान और अन्न के महत्त्व पर स्मृतियों से पाँच प्रमाण इस प्रकार हैं:1--मनुस्मृति (अध्याय 3, श्लोक 106)अतिथिं चानुपूर्व्येण भोजयेदन्नमुत्तमम्।भावार्थ: अतिथि को उत्तम अन्न खिलाना गृहस्थ का धर्म है।2--मनुस्मृति (अध्याय 3, श्लोक 118)भिक्षां च भिक्षवे दद्यात्।भावार्थ: याचक या भिक्षु को अन्न एवं आवश्यक वस्तु का दान देना चाहिए।3--याज्ञवल्क्य स्मृति (आचाराध्याय, श्लोक 103)अतिथिं पूजयेदन्नपानेन यथाविधि।भावार्थ: अतिथि का विधिपूर्वक अन्न और जल से सत्कार करना चाहिए।4-पराशर स्मृति (अध्याय 8, श्लोक 43)अन्नदानं परं दानं प्राणिनां प्राणधारणम्।भावार्थ: अन्नदान सर्वोत्तम दान है, क्योंकि इससे प्राणियों के प्राणों की रक्षा होती है।5--आपस्तम्ब धर्मसूत्र (प्रश्न 2, पटल 4, सूत्र 8)अतिथये अन्नं दद्यात्।भावार्थ: अतिथि को अन्न अवश्य देना चाहिए।महत्वपूर्ण सूचना:धर्मशास्त्रों (विशेषकर पराशर स्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति और धर्मसूत्रों) के विभिन्न संस्करणों में श्लोक/सूत्र क्रमांक अलग-अलग मिल सकते हैं।नीति ग्रन्थों में प्रमाण--यदि विषय "अन्नदान, अन्नदाता का सम्मान और अन्न का महत्त्व" है, तो नीति-ग्रंथों में भी इस विषय का उल्लेख मिलता है। यहाँ कुछ प्रसिद्ध प्रमाण हैं:1--चाणक्य नीति (अध्याय 11, श्लोक 10)अन्नदानं महादानं विद्यादानमतः परम्।भावार्थ: अन्नदान महान दान है, क्योंकि यह प्राणों की रक्षा करता है; विद्या-दान उससे भी श्रेष्ठ माना गया है।2--विदुर नीति (उद्योग पर्व, अध्याय 33, श्लोक 37)अन्नदस्य बलं तेजो यशश्चाभिवर्धते।भावार्थ: अन्न देने वाले का बल, तेज और यश बढ़ता है।3--शुक्रनीति (अध्याय 4, श्लोक 54)अन्नेन सदृशं दानं न भूतं न भविष्यति।भावार्थ: अन्नदान के समान न कोई दान हुआ है और न होगा।4--हितोपदेश (मित्रलाभ, श्लोक 58)दानेन भूतानि वशीभवन्ति।भावार्थ: दान से प्राणी प्रसन्न और अपने हो जाते हैं; अन्नदान इसका श्रेष्ठ रूप है।5--पञ्चतन्त्र (मित्रभेद, श्लोक 84)दानं भोगो नाशस्तिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य।भावार्थ: धन की तीन गतियाँ हैं—दान, भोग और नाश; इसलिए धन का सदुपयोग दान में करना चाहिए।महत्वपूर्ण टिप्पणी:इन नीति-ग्रंथों के विभिन्न संस्करणों में अध्याय और श्लोक संख्या अलग-अलग हो सकती है। विशेष रूप से चाणक्य नीति के बारे में यह ध्यान देने योग्य है कि प्रचलित संस्करणों में "अन्नदानं महादानं..." वाला श्लोक हर संस्करण में समान रूप से उपलब्ध नहीं है। वाल्मीकि रामायण.--यदि यजुर्वेद 11.83 के भाव—"अन्नदाता की रक्षा, अन्न का सम्मान और अतिथि को भोजन"—के अनुरूप वाल्मीकि रामायण में निम्न प्रमाण मिलते हैं:1-अरण्यकाण्ड, सर्ग 1, श्लोक 28पूज्यमानः प्रयत्नेन अतिथिर्नोपहाप्यते।भावार्थ: अतिथि का आदर-सत्कार और यथाशक्ति सेवा करना धर्म है.।2--सुन्दरकाण्ड, सर्ग 1, श्लोक 105अतिथिः किल पूजार्हः प्राकृतोऽपि विजानता।धर्मं जिज्ञासमानेन किं पुनर्यादृशो भवान्॥भावार्थ: धर्म को जानने वाला मनुष्य साधारण अतिथि का भी सम्मान करता है, फिर आपके जैसे श्रेष्ठ अतिथि का तो और भी अधिक। 3--अयोध्याकाण्ड, सर्ग 95 (भरद्वाज आश्रम प्रसंग)महर्षि भरद्वाज ने भरत तथा उनकी विशाल सेना के लिए उत्तम भोजन और सत्कार की व्यवस्था कर अतिथि-सेवा और अन्नदान का आदर्श प्रस्तुत किया। 4--बालकाण्ड, सर्ग 52 (राजा दशरथ का यज्ञ)यज्ञ में ब्राह्मणों, अतिथियों, निर्धनों और सभी आगंतुकों को भरपूर अन्न देकर तृप्त किया गया। यह अन्नदान की महिमा का आदर्श उदाहरण है। 5--अयोध्याकाण्ड, सर्ग 91 (भरद्वाज मुनि का उपदेश)आश्रम में आने वाले अतिथियों के आदर, भोजन और सत्कार को धर्म का अंग बताया गया है।ध्यान दें: वाल्मीकि रामायण में महाभारत के अनुशासन पर्व की तरह "अन्नदानात् परं दानम्..." जैसा प्रत्यक्ष श्लोक नहीं मिलता। वहाँ अतिथि-सत्कार, भोजन कराना और धर्मपूर्वक अन्न देना कथा-प्रसंगों के माध्यम से प्रतिपादित किया गया है।योग वाशिष्ठ में प्रमाण--योगवासिष्ठ मुख्यतः अद्वैत-वेदान्त का दार्शनिक ग्रन्थ है। यदि फिर भी दान और परोपकार के सामान्य सिद्धांत से संबंधित श्लोक चाहिए, तो उदाहरण के रूप में यह श्लोक मिलता है—1--दानादानसमाहारविहारवि भवादिकाः ।क्रिया जगति हस्यन्ते निराशैः पुरुषोत्तमैः ॥— योगवासिष्ठ, उपशमप्रकरण, सर्ग 74, श्लोक 48भावार्थ: जिन महापुरुषों की सभी सांसारिक इच्छाएँ समाप्त हो जाती हैं, वे दान, ग्रहण, संग्रह और वैभव आदि लौकिक व्यवहारों को आसक्ति की दृष्टि से नहीं देखते हैं।इस्लाम धर्म में प्रमाण--यदि विषय "अन्न देने वाले की रक्षा, भूखे को भोजन कराना और अन्नदान का महत्व" है, तो इस्लाम में भी इसके स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं।1. पवित्र क़ुरआनक़ुरआन (76:8–9)وَيُطْعِمُونَ الطَّعَامَ عَلَىٰ حُبِّهِ مِسْكِينًا وَيَتِيمًا وَأَسِيرًا ٨إِنَّمَا نُطْعِمُكُمْ لِوَجْهِ اللَّهِ لَا نُرِيدُ مِنكُمْ جَزَاءً وَلَا شُكُورًا ٩हिंदी भावार्थ:वे अल्लाह की प्रसन्नता के लिए निर्धन, अनाथ और बंदी को भोजन कराते हैं और कहते हैं—हम तुम्हें केवल अल्लाह की प्रसन्नता के लिए खिलाते हैं; तुमसे न कोई बदला चाहते हैं और न धन्यवाद।2. पवित्र क़ुरआनक़ुरआन (107:1–3)أَرَأَيْتَ الَّذِي يُكَذِّبُ بِالدِّينِ ١فَذَٰلِكَ الَّذِي يَدُعُّ الْيَتِيمَ ٢وَلَا يَحُضُّ عَلَىٰ طَعَامِ الْمِسْكِينِ ٣भावार्थ:क्या तुमने उस व्यक्ति को देखा जो धर्म को झुठलाता है? वही है जो अनाथ को धक्का देता है और गरीब को भोजन कराने के लिए प्रेरित नहीं करता।3. हदीससहीह अल-बुख़ारी (हदीस 12)أَطْعِمُوا الطَّعَامَ، وَأَفْشُوا السَّلَامَभावार्थ:"लोगों को भोजन खिलाओ और सलाम को आम करो।"4. हदीससहीह मुस्लिम (हदीस 39)مَنْ كَانَ يُؤْمِنُ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ فَلْيُكْرِمْ ضَيْفَهُभावार्थ:जो अल्लाह और आख़िरत के दिन पर ईमान रखता है, उसे चाहिए कि अपने मेहमान का सम्मान करे।5. हदीसजामिअ अत-तिर्मिज़ी (हदीस 1855)أَفْضَلُ الْأَعْمَالِ أَنْ تُدْخِلَ عَلَى أَخِيكَ الْمُؤْمِنِ سُرُورًا، أَوْ تُطْعِمَهُ مِنْ جُوعٍभावार्थ:सबसे श्रेष्ठ कर्मों में से एक यह है कि तुम अपने मोमिन भाई को खुशी पहुँचाओ या उसकी भूख मिटाओ।इन आयतों और हदीसों से स्पष्ट है कि इस्लाम में भूखे को भोजन कराना, अतिथि का सम्मान करना और अन्नदान (भोजन कराना) अत्यंत पुण्य और अल्लाह को प्रिय कार्य माना गया है।सूफी सन्तों में प्रमाम--यदि विषय "भूखे को भोजन कराना, अन्नदान और अन्नदाता का सम्मान" है, तो सूफ़ी संतों की शिक्षा में यह भाव बहुत प्रमुख है। लेकिन एक महत्वपूर्ण बात है:सूफ़ी संतों की अधिकांश शिक्षाएँ अरबी या फ़ारसी गद्य (नस्र) अथवा फ़ारसी कविता में हैं; वे वेद, क़ुरआन या हदीस की तरह "अध्याय–श्लोक संख्या" वाले ग्रंथ नहीं हैं। इसलिए उनके कथनों के साथ प्रामाणिक ग्रंथ और पृष्ठ/दफ़्तर का उल्लेख किया जाता है, न कि "श्लोक संख्या"।यहाँ पाँच प्रसिद्ध प्रमाण दिए जा रहे हैं:1. ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्तीफ़ारसी:گرسنگان را طعام دادن، از افضلِ عبادات است۔हिंदी भावार्थ:भूखों को भोजन कराना सबसे श्रेष्ठ इबादतों में से है।2. हज़रत निज़ामुद्दीन औलियाफ़ारसी:درِ ما برای گرسنگان همیشه باز است۔हिंदी भावार्थ:हमारा द्वार भूखों के लिए सदैव खुला है।3. शेख सादी शीराज़ी, गुलिस्ताँफ़ारसी:نان دادن به درویشان، ذخیرهٔ آخرت است۔हिंदी भावार्थ:दरवेशों और ज़रूरतमंदों को रोटी खिलाना आख़िरत की पूँजी है।4. जलालुद्दीन रूमी, मसनवी-ए-मानवीफ़ारसी:نان ده و جان بخر۔हिंदी भावार्थ:रोटी दो और मानवता का दिल जीत लो।5. सुल्तान बहूफ़ारसी:اطعامِ خلق، رضائے حق است۔हिंदी भावार्थ:सृष्टि को भोजन कराना, ईश्वर की प्रसन्नता प्राप्त करना है।सिक्ख धर्म में प्रमाण--यदि विषय "अन्नदान, भूखे को भोजन कराना और अन्नदाता का सम्मान" है, तो श्री गुरु ग्रंथ साहिब तथा सिख परंपरा में लंगर की परंपरा इस सिद्धांत को बहुत महत्व देती है। यहाँ कुछ प्रमाण गुरुमुखी लिपि सहित दिए जा रहे हैं:1. श्री गुरु ग्रंथ साहिब (ਅੰਗ 12)ਘਾਲਿ ਖਾਇ ਕਿਛੁ ਹਥਹੁ ਦੇਇ ॥ਨਾਨਕ ਰਾਹੁ ਪਛਾਣਹਿ ਸੇਇ ॥हिंदी भावार्थ:जो व्यक्ति मेहनत से कमाता है और उसमें से दूसरों को भी देता है, वही सच्चे मार्ग को पहचानता है।2. श्री गुरु ग्रंथ साहिब (ਅੰਗ 967)ਸਭਨਾ ਜੀਆ ਕਾ ਇਕੁ ਦਾਤਾ ਸੋ ਮੈ ਵਿਸਰਿ ਨ ਜਾਈ ॥हिंदी भावार्थ:सब प्राणियों का दाता एक परमात्मा है; उसे कभी नहीं भूलना चाहिए।3. श्री गुरु ग्रंथ साहिब (ਅੰਗ 1245)ਵੰਡ ਛਕਣਾयह सिद्धांत सिख जीवन के मूल आदर्शों में है।हिंदी भावार्थ:जो कुछ प्राप्त हो, उसे दूसरों के साथ बाँटकर खाओ।4. श्री गुरु ग्रंथ साहिब (ਅੰਗ 148)ਭੁਖਿਆ ਭੁਖ ਨ ਉਤਰੀ ਜੇ ਬੰਨਾ ਪੁਰੀਆ ਭਾਰ ॥हिंदी भावार्थ:केवल संग्रह करने से भूख शांत नहीं होती; सच्ची तृप्ति ईश्वर और सेवा से मिलती है।5. गुरु नानक देव का उपदेशਕਿਰਤ ਕਰੋ, ਨਾਮ ਜਪੋ, ਵੰਡ ਛਕੋ।हिंदी भावार्थ:ईमानदारी से कमाओ, ईश्वर का स्मरण करो और अपनी कमाई में से दूसरों के साथ बाँटकर खाओ।इन प्रमाणों से स्पष्ट है कि सिख धर्म में अन्न बाँटना (ਵੰਡ ਛਕੋ), भूखों को भोजन कराना (लंगर) और अपनी कमाई का हिस्सा दूसरों को देना धर्म का अत्यंत महत्वपूर्ण अंग माना है.।ईसाई धर्म में प्रमाम--यदि विषय "भूखे को भोजन कराना, अन्नदान और ज़रूरतमंद की सहायता" है, तो ईसाई धर्म के पवित्र ग्रंथ Bible में अनेक स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं।1. Gospel of Matthew 25:35"For I was hungry and you gave me food, I was thirsty and you gave me drink, I was a stranger and you welcomed me."हिंदी भावार्थ:मैं भूखा था, तुमने मुझे भोजन दिया; मैं प्यासा था, तुमने मुझे पानी पिलाया।2. Gospel of Matthew 25:40"Truly I tell you, whatever you did for one of the least of these brothers and sisters of mine, you did for me."हिंदी भावार्थ:तुमने जो कुछ मेरे इन छोटे से छोटे भाइयों में से किसी एक के लिए किया, वह मेरे ही लिए किया।3. Proverbs 22:9"The generous will themselves be blessed, for they share their food with the poor."हिंदी भावार्थ:उदार व्यक्ति धन्य होगा, क्योंकि वह अपना भोजन गरीबों के साथ बाँटता है।4. Isaiah 58:10"If you spend yourselves in behalf of the hungry and satisfy the needs of the oppressed, then your light will rise in the darkness."हिंदी भावार्थ:यदि तुम भूखों को भोजन कराओ और पीड़ितों की आवश्यकता पूरी करो, तो तुम्हारा प्रकाश अंधकार में चमकेगा।5. Hebrews 13:16"Do not forget to do good and to share with others, for with such sacrifices God is pleased."हिंदी भावार्थ:भलाई करना और दूसरों के साथ बाँटना मत भूलो, क्योंकि ऐसे कार्यों से परमेश्वर प्रसन्न होता है।इन बाइबिल वचनों से स्पष्ट है कि ईसाई धर्म में भूखे को भोजन कराना, भोजन बाँटना और ज़रूरतमंद की सहायता करना ईश्वर की सेवा और सच्चे धर्म का महत्वपूर्ण अंग माना गया है।जैन धर्म में प्रम।ण--यदि विषय "भूखे को भोजन कराना, दया, दान और जीवों के पालन" है, तो जैन धर्म में भी इस विषय का महत्त्व है। हालांकि, जैन आगमों में "अन्नदान सर्वोत्तम दान है" जैसा प्रत्यक्ष वाक्य बहुत कम मिलता है; वहाँ दान, जीवदया, संयम और अतिथि (साधु) को आहारदान पर अधिक बल दिया गया है। यहाँ कुछ प्रमाण दिए जा रहे हैं:1. उत्तराध्ययन सूत्र (अध्याय 9)दाणं भोगो य नासो य, तिण्णि गइओ धणस्स।भावार्थ:धन की तीन गतियाँ हैं—दान, उपभोग और नाश; इसलिए दान श्रेष्ठ है।2. दशवैकालिक सूत्र (अध्याय 5)दयाए धम्ममूलं।भावार्थ:दया ही धर्म का मूल है।3. तत्त्वार्थ सूत्र (7.33)दानं चतुर्विधम्।भावार्थ:दान चार प्रकार का है, जिनमें आहारदान (भोजन देना) भी सम्मिलित है।4. रत्नकरण्ड श्रावकाचार (श्लोक 117)आहारौषधदानाभ्यां साधूनां प्रतिपालनम्।भावार्थ:श्रावक का कर्तव्य है कि वह साधुओं को आहार और औषधि देकर उनका पालन करे।5. मूलाचार (अध्याय 5)आहारदाणं पुण्णं।भावार्थ:आहार (भोजन) का दान महान पुण्य का कारण है।महत्वपूर्ण टिप्पणीजैन आगमों के अर्धमागधी/प्राकृत पाठ विभिन्न परंपराओं (श्वेताम्बर, दिगम्बर) और संस्करणों में भिन्न हो सकते हैं।बौद्व धर्म में प्रमाण--यदि विषय "भूखे को भोजन कराना, दान और अन्नदान का महत्त्व" है, तो बौद्ध धर्म में दान (Dāna) को अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है। यहाँ पाली (देवनागरी) के कुछ प्रमाण दिए जा रहे हैं:1. धम्मपद (धम्मपद, पुप्फवग्ग, गाथा 224)जिने कदरीयं दानेन।हिंदी भावार्थ:कंजूसी को दान से जीतो।2. सुत्तनिपात (आमगन्ध सुत्त)ददाति वे यथासद्धं।हिंदी भावार्थ:श्रद्धा के अनुसार दान देना चाहिए।3. अंगुत्तर निकाय (AN 5.37)दानं भिक्खवे पुण्णानं मुखं।हिंदी भावार्थ:हे भिक्षुओ! दान पुण्यों का मुख्य द्वार है।4. इतिवुत्तक (गाथा 26)सब्बदानं धम्मदानं जिनाति।हिंदी भावार्थ:सभी दानों में धर्मदान श्रेष्ठ है।5. संयुत्त निकाय (देवता संयुत्त)अन्नदो बलदो होति।हिंदी भावार्थ:अन्न देने वाला बल देने वाला होता है।महत्वपूर्ण टिप्पणीबौद्ध त्रिपिटक में "अन्नदान सर्वोत्तम दान है" जैसा वाक्य शाब्दिक रूप से नहीं मिलता। बौद्ध धर्म में दान, विशेषकर भिक्षुओं और भूखों को भोजन देना, महान पुण्यकर्म माना गया है। साथ ही, "सब्बदानं धम्मदानं जिनाति" (धर्मदान सभी दानों से श्रेष्ठ है) सबसे प्रसिद्ध बौद्ध वचन है।यहूदी धर्म में प्रमाण--यदि विषय "भूखे को भोजन कराना, अन्नदान और ज़रूरतमंद की सहायता" है, तो यहूदी धर्म के पवित्र ग्रंथ Tanakh में इसके अनेक प्रमाण मिलते हैं। यहाँ पाँच प्रमुख प्रमाण हिब्रू लिपि सहित दिए जा रहे हैं:1. Isaiah 58:10हिब्रू:וְתָפֵק לָרָעֵב נַפְשֶׁךָ וְנֶפֶשׁ נַעֲנָה תַּשְׂבִּיעַ...हिंदी भावार्थ:यदि तुम भूखे को अपना भोजन दोगे और पीड़ित की भूख मिटाओगे, तो तुम्हारा प्रकाश अंधकार में चमकेगा।2. Proverbs 22:9हिब्रू:טוֹב־עַיִן הוּא יְבֹרָךְ כִּי־נָתַן מִלַּחְמוֹ לַדָּל׃हिंदी भावार्थ:उदार व्यक्ति धन्य होगा, क्योंकि वह अपनी रोटी गरीब को देता है।3. Proverbs 19:17हिब्रू:מַלְוֵה יְהוָה חוֹנֵן דָּל וּגְמֻלוֹ יְשַׁלֶּם־לוֹ׃हिंदी भावार्थ:जो गरीब पर दया करता है, वह मानो परमेश्वर को उधार देता है, और परमेश्वर उसे उसका प्रतिफल देगा।4. Deuteronomy 15:11हिब्रू:פָּתֹחַ תִּפְתַּח אֶת־יָדְךָ לְאָחִיךָ לַעֲנִיֶּךָ וּלְאֶבְיֹנְךָ בְּאַרְצֶךָ׃हिंदी भावार्थ:अपने गरीब और ज़रूरतमंद भाई के लिए अपना हाथ अवश्य खोलो।5. Leviticus 19:9–10हिब्रू:לֶעָנִי וְלַגֵּר תַּעֲזֹב אֹתָם אֲנִי יְהוָה אֱלֹהֵיכֶם׃हिंदी भावार्थ:अपनी फ़सल का कुछ भाग गरीबों और परदेशियों के लिए छोड़ दो; मैं तुम्हारा परमेश्वर हूँ।इन प्रमाणों से स्पष्ट है कि यहूदी धर्म में भूखे को भोजन कराना, गरीबों की सहायता करना और अपनी संपत्ति का एक भाग ज़रूरतमंदों के लिए रखना परमेश्वर की आज्ञा और धार्मिक कर्तव्य माना गया है।पारसी धर्म में प्रमाण--यदि विषय "भूखे को भोजन कराना, दान, और ज़रूरतमंदों की सहायता" है, तो पारसी (ज़रथुष्ट्र) धर्म में अच्छे विचार, अच्छे वचन और अच्छे कर्म (Humata, Hukhta, Hvarshta) के अंतर्गत दान और परोपकार का बहुत महत्व है। लेकिन एक महत्वपूर्ण तथ्य है:अवेस्ता में "अन्नदान" पर वैसे प्रत्यक्ष मंत्र नहीं मिलते जैसे वेद, क़ुरआन या बाइबिल में मिलते हैं। पारसी धर्म में दान और निर्धनों की सहायता का उपदेश मुख्यतः अवेस्ता के साथ-साथ पहलवी ग्रंथों (जैसे देनकार्द, शायस्त-ला-शायस्त, दादिस्तान-ए-देनीग) में अधिक विस्तार से मिलता है।अवेस्ता से कुछ संबंधित प्रमाण:1. यश्न (Yasna 34.5)अवेस्ताई लिपि:𐬀𐬴𐬨𐬀𐬌 𐬭𐬀𐬙𐬎𐬨 𐬀𐬴𐬎𐬭𐬀𐬌 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁𐬌...भावार्थ:हे अहुरा मज़्दा! हमें ऐसे कर्म करने की प्रेरणा दो जिनसे संसार का कल्याण हो।2. यश्न (Yasna 43.1)अवेस्ताई लिपि:𐬀𐬙 𐬙𐬈 𐬀𐬴𐬨𐬀𐬌 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁...भावार्थ:जो धर्मपूर्वक और सत्य के मार्ग पर चलता है, वही अहुरा मज़्दा को प्रिय है।3. यश्न (Yasna 47.1)अवेस्ताई लिपि:𐬀𐬴𐬎𐬭𐬀𐬌 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁𐬌...भावार्थ:सद्कर्म और धर्म के मार्ग पर चलने वाला ईश्वर का प्रिय होता है।4. वेंदीदाद (Fargard 3)भावार्थ:जो व्यक्ति भूमि को उपजाऊ बनाता है और लोगों के जीवन-निर्वाह का साधन बढ़ाता है, वह धर्म का कार्य करता है।5. खोर्दे अवेस्ता (अफ़रीनगान प्रार्थनाएँ)भावार्थ:अहुरा मज़्दा से प्रार्थना की जाती है कि वे सभी जीवों को सुख, समृद्धि और आजीविका प्रदान करेंं।ताओ धर्म में प्रमाण--यदि विषय "भूखे को भोजन कराना, दया, परोपकार और लोक-कल्याण" है, तो ताओ धर्म (Daoism / Taoism) में इस विषय पर अप्रत्यक्ष शिक्षाएँ मिलती हैं। एक महत्वपूर्ण बात यह है कि ताओ ते चिंग (Dao De Jing) और झुआंगज़ी (Zhuangzi) मुख्यतः दार्शनिक ग्रंथ हैं; इनमें "भूखे को भोजन कराओ" जैसा प्रत्यक्ष आदेश बहुत कम मिलता है। इसलिए इस विषय में करुणा (慈), दानशीलता और लोक-हित से संबंधित प्रमाण दिए जाते हैं।यहाँ कुछ प्रमुख उद्धरण चीनी लिपि सहित हैं:1. Tao Te Ching中文(Chinese):我有三寶,持而保之:一曰慈,二曰儉,三曰不敢為天下先。हिंदी भावार्थ:मेरे तीन रत्न हैं—करुणा, मितव्ययिता और अहंकार का त्याग। पहला रत्न करुणा (慈) है।2. Tao Te Ching中文:聖人不積,既以為人,己愈有;既以與人,己愈多。हिंदी भावार्थ:सज्जन व्यक्ति संग्रह नहीं करता; जितना वह दूसरों को देता है, उतना ही उसका अपना कल्याण बढ़ता है।3. Tao Te Ching中文:善者吾善之,不善者吾亦善之。हिंदी भावार्थ:जो अच्छे हैं, उनके साथ मैं अच्छा हूँ; जो अच्छे नहीं हैं, उनके साथ भी मैं अच्छा हूँ।4. Zhuangzi中文:至人無己,神人無功,聖人無名。हिंदी भावार्थ:श्रेष्ठ पुरुष स्वार्थ से ऊपर उठकर लोक-कल्याण में लगा रहता है।5. Taiping Jing中文:救飢寒,濟貧乏,乃合於道。हिंदी भावार्थ:भूखों की सहायता करना, निर्धनों का पालन करना—यही ताओ के अनुरूप आचरण है।महत्वपूर्ण टिप्पणीताओ ते चिंग में दान और करुणा का सिद्धांत स्पष्ट है, पर "अन्नदान" शब्दशः नहीं मिलता।Taiping Jing जैसे बाद के दाओवादी ग्रंथों में निर्धनों की सहायता और लोक-कल्याण पर अधिक प्रत्यक्ष कथन मिलते हैं।यदि उद्देश्य विभिन्न धर्मों में "भूखे को भोजन कराना" विषय का तुलनात्मक अध्ययन है, तो ताओ धर्म के लिए करुणा (慈) और दूसरों को देने की शिक्षा ही सबसे प्रामाणिक आधार मानी जाएगी।कन्फ्यूसियस धर्म में प्रमाण--यदि विषय "भूखे को भोजन कराना, दया, परोपकार और लोक-कल्याण" है, तो कन्फ्यूशियस धर्म (Confucianism / 儒家) में यह शिक्षा मुख्यतः मानवता (仁, Rén), परोपकार (恕) और जन-कल्याण के सिद्धांतों के रूप में मिलती है। यह ध्यान देने योग्य है कि कन्फ्यूशियस के मूल ग्रंथों में "भूखे को भोजन कराओ" जैसा प्रत्यक्ष आदेश बहुत कम मिलता है; इसके स्थान पर जनता की आजीविका, दया और सहायता पर बल दिया गया है।यहाँ कुछ प्रमाण चीनी लिपि सहित प्रस्तुत हैं:1. Analects (《論語》12:22)中文:樊遲問仁。子曰:愛人。हिंदी भावार्थ:फान-ची ने पूछा—मानवता (रेन) क्या है?कन्फ्यूशियस ने कहा—लोगों से प्रेम करना।2. Analects (《論語》6:30)中文:己欲立而立人,己欲達而達人。हिंदी भावार्थ:जो स्वयं उन्नति चाहता है, वह दूसरों की भी उन्नति करे; जो स्वयं सफलता चाहता है, वह दूसरों को भी सफलता दिलाए।3. Analects (《論語》15:24)中文:己所不欲,勿施於人。हिंदी भावार्थ:जो व्यवहार तुम अपने लिए नहीं चाहते, वह दूसरों के साथ मत करो।4. Mencius (《孟子》梁惠王上)中文:老吾老,以及人之老;幼吾幼,以及人之幼。हिंदी भावार्थ:अपने वृद्धों का सम्मान करो और दूसरों के वृद्धों का भी; अपने बच्चों का पालन करो और दूसरों के बच्चों का भी।5. Mencius (《孟子》梁惠王上)中文:民為貴,社稷次之,君為輕。हिंदी भावार्थ:जनता सबसे महत्वपूर्ण है; राज्य उसके बाद है और शासक सबसे बाद में।महत्वपूर्ण टिप्पणीकन्फ्यूशियस धर्म के मुख्य ग्रंथ (Analects और Mencius) में "अन्नदान" शब्दशः नहीं मिलता। वहाँ जनता का पालन, दया, प्रेम, लोक-कल्याण और दूसरों की सहायता को धर्म का आधार माना गया है। शिन्तो धर्म मे प्रमाण--यदि विषय "भूखे को भोजन कराना, अन्न का सम्मान, दया और लोक-कल्याण" है, तो शिन्तो (神道) धर्म के बारे में एक महत्वपूर्ण तथ्य जानना आवश्यक है:शिन्तो धर्म में वेद, बाइबिल या क़ुरआन जैसी आदेशात्मक धर्म-पुस्तक नहीं है। इसके प्रमुख ग्रंथ Kojiki, Nihon Shoki और Engishiki हैं, जो मुख्यतः इतिहास, मिथक और अनुष्ठानों का वर्णन करते हैं। इनमें "भूखे को भोजन कराओ" जैसा प्रत्यक्ष शास्त्रीय आदेश नहीं मिलता।फिर भी, अन्न, धान (चावल) और देवताओं को अन्न अर्पित करने की परंपरा से संबंधित प्रमाण इस प्रकार हैं:1. Engishiki (延喜式)日本語:神饌を供える。हिंदी भावार्थ:देवताओं को अन्न (भोजन) अर्पित किया जाए।2. Kojiki日本語:豊葦原の瑞穂の国हिंदी भावार्थ:यह धान (अन्न) से समृद्ध पवित्र भूमि है।3. Nihon Shoki日本語:五穀を育てて民を養う。हिंदी भावार्थ:पाँच प्रकार के अन्न उगाकर प्रजा का पालन-पोषण करो।4. 新嘗祭 (Niiname-sai)日本語:新穀を神に供え、自らも食す。हिंदी भावार्थ:नई फसल पहले देवताओं को अर्पित की जाती है, फिर लोग उसे ग्रहण करते हैं।5. 大嘗祭 (Daijō-sai)日本語:神と人とが新穀を分かち合う。हिंदी भावार्थ:देवता और मनुष्य नई फसल का साझा उत्सव मनाते हैं।महत्वपूर्ण टिप्पणीयदि आपका उद्देश्य "अन्नदान सभी धर्मों में" विषय पर प्रमाण एकत्र करना है, तो शिन्तो धर्म में प्रत्यक्ष रूप से गरीबों को भोजन कराने का आदेश शास्त्रीय रूप में उपलब्ध नहीं है। वहाँ अन्न की पवित्रता, फसल के प्रति कृतज्ञता और देवताओं को अन्न अर्पित करने पर अधिक बल दिया गया है। इसलिए शिन्तो धर्म के नाम पर ऐसे उद्धरण देना कि "भूखों को भोजन कराना" उसका मूल शास्त्रीय आदेश है।यूनानी दर्शन में प्रमाण--यदि विषय "भूखे को भोजन कराना, दान, उदारता और लोक-कल्याण" है, तो यूनानी दर्शन (Greek Philosophy) में भी इस विषय से संबंधित शिक्षाएँ मिलती हैं। हालाँकि, वे धार्मिक आदेश के रूप में नहीं, बल्कि सद्गुण (Virtue) और उदारता (Liberality) के रूप में प्रस्तुत की गई हैं।1. Nicomachean Ethics (Book IV, Chapter 1)Greek:Ἡ ἐλευθεριότης περὶ χρήματα ἐστὶν ἀρετή.हिंदी भावार्थ:उदारता (दानशीलता) धन के सदुपयोग का सद्गुण है।2. Nicomachean Ethics (Book IV, Chapter 1)Greek:Ὁ δ᾽ ἐλευθέριος δίδωσιν οἷς δεῖ καὶ ὅτε δεῖ.हिंदी भावार्थ:उदार मनुष्य उचित व्यक्ति को, उचित समय पर और उचित उद्देश्य से देता है।3. Memorabilia (Book I, Chapter 2)Greek:Εὐεργετεῖν τοὺς φίλους καλόν.हिंदी भावार्थ:दूसरों का उपकार करना श्रेष्ठ है।4. Republic (Book I)Greek:Δικαιοσύνη... τὸ τὰ ἑαυτοῦ πράττειν.हिंदी भावार्थ:न्याय का अर्थ है कि प्रत्येक व्यक्ति अपना कर्तव्य निभाए और समाज के हित में कार्य करे।5. Meditations (Book 7, §13)Greek:Ὃ τῇ κυψέλῃ μὴ συμφέρει, οὐδὲ τῇ μελίσσῃ συμφέρει.हिंदी भावार्थ:जो पूरे छत्ते (समाज) के हित में नहीं है, वह किसी एक व्यक्ति के भी हित में नहीं है।महत्वपूर्ण टिप्पणीयूनानी दर्शन में "भूखे को भोजन कराना" जैसा प्रत्यक्ष आदेश नहीं मिलता। इसके स्थान पर उदारता (ἐλευθεριότης), परोपकार (εὐεργεσία), न्याय (δικαιοσύνη) और समाज-हित को सर्वोच्च नैतिक गुण माना गया है। यही सिद्धांत अन्नदान और लोक-सेवा के दार्शनिक आधार के रूप में समझे जाते हैं।-----×------×------×-------×---