रेत का आशियाना Priyanshu Datta द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

रेत का आशियाना

रणजय सर के ट्यूशन से बाहर निकलते ही कड़कड़ाती बिजली के साथ झमाझम बारिश शुरू हो गई। इसलिए वे सड़क के सामने एक किराने की दुकान के छज्जे के नीचे खड़ी हैं। 'वे' यानी रंजाबती और उसकी पक्की सहेली ऋतुजा, जो उसका साथ देने के लिए उसके साथ है।
​रंजाबती आज छाता लाना भूल गई है। और इन वेदर रिपोर्ट वालों का भी क्या कहें, सब गलत-मलत दिखाते हैं! आज सुबह ही उसने देखा था कि रात में बारिश नहीं होगी; और इधर अब यह क्या तमाशा है! वह बहुत चिढ़ गई है।

​रंजा ने कहा, "तू मेरे लिए इंतज़ार मत कर, तेरे पास तो छाता है, तू निकल। वैसे भी साढ़े आठ बज चुके हैं, अंकल-आंटी यकीनन चिंता कर रहे होंगे।"
​ऋतुजा ने जवाब दिया, "वाह रे! जैसे तेरे लिए तेरे मम्मी-पापा चिंता नहीं कर रहे हैं! और देख तो रही है कैसी कड़कड़ाकर बिजली चमक रही है, अकेले जाने में डर लगता है बाबा! बिजली गिरना थोड़ा कम हो, तो तुझे साथ में ही घर पहुँचा दूँगी।"

​"नहीं, वैसे भी तेरा छाता एक ही इंसान के लिए है। अभी सड़क पर उतरेंगे तो दोनों आधे-आधे भीग जाएँगे।"

​"तुझे फिर कब से बारिश में भीगने से डर लगना शुरू हो गया रे?" ऋतुजा ने थोड़ा मुस्कुराकर कहा, "पहले तो बारिश देखते ही कितना मज़ा करती थी! क्लास ट्वेल्थ में पढ़ते समय भी पागलों की तरह सड़क के आस-पास के उन गरीब बच्चों को लेकर नाचती थी। वैसे तेरे जैसा दयालु मैंने दूसरा नहीं देखा। अक्सर ही देखती हूँ कि पाँच-छह बच्चों को दुकान से तरह-तरह की चीज़ें खरीदकर खिला रही है। कॉलेज लाइफ के इन दो सालों में भी यकीनन तेरी यह 'बदआदत' बदली नहीं होगी?"

​"बदआदत नहीं है !" रंजाबती की आवाज़ थोड़ी धीमी हो गई, "वे भी तो हमारी ही तरह किसी न किसी की औलाद हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि हम मुँह में सोने का चम्मच लेकर पैदा हुए हैं और वे... क्या ही और बोलूँ! इसके अलावा चाइल्ड लेबर का मैं बिल्कुल समर्थन नहीं कर सकती। और वे छोटे-छोटे बच्चे जब मुस्कुराकर 'दीदी, दीदी' कहकर बुलाते हैं ना, तो दिल अजीब सा बेचैन हो उठता है। उनके भीतर भी कितनी क्षमताएँ छुपी हुई हैं रे, मगर उन्हें थोड़ी सी किताबी शिक्षा तक नहीं मिल पा रही है!"

​ऋतुजा भी ध्यान से उसकी बातें सुन रही थी, उसका मन भी जैसे किसी अनजाने दुख से भर गया। रंजा की बात खत्म होने के बाद कुछ देर दोनों के बीच खामोशी रही।

​फिर रंजा ही दोबारा बोल उठी, "एक बात सोची है ऋतुजा? सर ने आज कितनी जल्दी छुट्टी दे दी! इधर सिर्फ एक महीने बाद ही फोर्थ सेमेस्टर है। सिलेबस शायद एग्जाम के ठीक एक-दो दिन पहले खत्म होगा। कितने सारे चैप्टर्स बाकी हैं—कंप्यूटर नेटवर्किंग, डेटाबेस मैनेजमेंट; यही तो सबसे ज़्यादा समय खाते हैं। और इधर यह एक नई आफत बारिश शुरू हो गई है, थमने का नाम ही नहीं ले रही! अभी ही जहाँ-तहाँ की बारिश को आना था!"

​ऋतुजा ने रंजा के कंधे पर हाथ रखकर कहा, "चिल कर दोस्त, टेंशन मत ले! और वैसे भी तू तो एक होनहार स्टूडेंट है, तुझे किस बात की चिंता? लेकिन तू सच में कुछ नहीं जानती? पिछले एक हफ्ते से कॉलेज में रणजय चैटर्जी को लेकर क्या गॉसिप चल रही है! मैंने तो सोचा था कि तू इन सब मामलों में बहुत इंटरेस्टेड है, खासकर उनके मामले में!"

​अचानक ही बहुत तेज़ आवाज़ के साथ पास की एक खाली जगह पर बिजली गिरी, जिससे रंजा चौंक उठी। उसने हड़बड़ाकर पूछा, "नहीं तो, मैं किसी गॉसिप के बारे में नहीं जानती। और मेरे साथ सर का नाम क्यों खींच रहे हो तुम लोग?! मेरा दिल तो काँच की तरह है..."

​ऋतुजा ने मुँह बिगाड़कर जवाब दिया, "तेरा ये नाटक मुझसे नहीं झेला जाता! आहा, उनकी ट्यूशन में उनके साथ फ्लर्ट करने की कितनी कोशिशें की थीं तूने! खुद को उनके सामने और भी बेहतर स्टूडेंट के तौर पर दिखाने के कितने पापड़ बेले थे, ताकि उनका दिल जीता जा सके! लेकिन तेरी सारी कोशिशें नाकाम रहीं। चिड़िया तो फुर्र से उड़ गई! अब किसी और डाल पर जाकर बैठेगी। और तू? हा-हा-हा! आम का आम भी गया, गुठली भी गई—रस तो दूर की बात है, आम की गुठली भी नसीब नहीं होगी!"

​रंजा अब गुस्से में गरज उठी, "आजकल क्या हिन्दी सीरियल्स में चांस पाने की ट्रेनिंग ले रही है क्या रे?!! वैसे, तुझे टॉक्सिक मोहल्ले की चाचियों के कैरेक्टर में हेवी सूट करेगा। जा, ऑडिशन देकर आ।"

​"अरे, इतना भड़क क्यों रही है छोकरी?"—कहते हुए ऋतुजा दबी-दबी हँसी हँसने लगी।

​"तेरी इन घिनौनी बातों का मतलब ठीक क्या निकलता है, जानती है? तू अब यकीनन दस साल की बच्ची नहीं है ऋतुजा! कौन सी बात कहाँ कहनी चाहिए, यह तुझे अब भी समझ नहीं आता या तू समझना नहीं चाहती?"

​"गुस्सा करने पर तू एकदम बिंदास लगती है छोकरी।"

​"असल बात क्या है, अब बताएगी मुझे?? क्या हुआ है तुझे!!"

​ऋतुजा ने अब हँसना बंद किया और नरम लहजे में रंजा का हाथ छूकर कहा, "साफ-साफ बोलूँगी तो तू झेल नहीं पाएगी । तेरे दिल पर गहरा धक्का लगेगा। तुझे तो बचपन से देख रही हूँ, एक ही मोहल्ले की लड़की जो ठहरा। मुँह से तब अचानक बहुत सी बातें निकल गई थीं; मैंने सोचा था कि तू सब कुछ जानती है और शायद मुझसे मज़ाक कर रही है। खैर मेरी ही गलती है, अगर यह बात तू सच में जानती, तो शायद इतने नॉर्मल तरीके से बात नहीं कर पाती। मुझे प्लीज मजबूर मत कर, मैं तुझे नहीं बता पाऊँगी।"

​रंजा ने ऋतुजा से अपना हाथ हटाते हुए कहा, "मैं अब यह लुका-छिपी बर्दाश्त नहीं कर पा रही हूँ रे। जो कहना है आज साफ-साफ कह, वरना हमारी दोस्ती यहीं और इसी पल खत्म हो जाएगी।"

​"अरे, तू समझती है? यह सुनने के बाद तू खुश नहीं रहेगी। बचपना मत कर!"

​"ठीक है, तूने मुझे आज इसलिए नहीं बताया क्योंकि मुझे दुख होगा। लेकिन कुछ दिनों बाद अगर मुझे यह बात किसी और ज़रिया से पता चली, तो क्या मेरा दुख कम हो जाएगा? या उस दिन मुझे और भी ज़्यादा दुख होगा कि तूने मुझसे यह सच छुपाया? तब तुझे धोखेबाज़ मानने के अलावा मेरे पास कोई रास्ता नहीं बचेगा। तू मुझे बता।"

​"दरअसल इसी हफ्ते सर की शादी का पक्का (रिश्ता) होने वाला है। दोनों परिवारों की रज़ामंदी हो जाएगी उस दिन। और उनकी शादी को लेकर ही हर तरफ गॉसिप चल रही है। कानाफूसी सुनी जा रही है कि उनकी लंबे समय से रही गर्लफ्रेंड के साथ ही उनकी शादी हो रही है। और..."

​रंजाबती के कानों में अब कोई बात नहीं जा रही थी। उसके पूरे बदन में जैसे एक विनाशकारी गुस्से का तूफान उठ खड़ा हुआ। दिल की तीव्र तड़प और आग जैसे सारी हदें पार कर चुकी थी। उसने अपना बैग दुकान के एक कोने में फेंक दिया। अपने अंदर के भयंकर बवंडर को किसी तरह काबू करते हुए कहा, "बैग यहीं छोड़ जा रही हूँ, ज़्यादा सामान नहीं है। कल दोपहर तक यह बैग मेरे कमरे में पहुँच जाना चाहिए। मैं चली, बाय।"

​ऋतुजा ने हैरान होकर कहा, "बैग मुझे क्यों देने जाना होगा? और इस बारिश में तू जाएगी कैसे?"

​"मैं कैसे जाऊँगी यह तू मुझ पर छोड़ दे। और तूने जो यह खुशखबरी दी है, बिल्कुल तालियाँ बजाने जैसी न्यूज़ है! इसलिए तुझे यह तोहफा दिया—मेरा मतलब है, मेरा बैग घर पहुँचाकर चुपचाप खिसक लेना। और एक बात, रणजय चैटर्जी अगर मेरा नहीं हुआ, तो मैं उसे किसी और का भी होने नहीं दूँगी! रंजाबती बैनर्जी जो चाहती है, उसे हासिल करके ही दम लेती है; ज़रूरत पड़ने पर आसमान से चाँद भी तोड़कर ला सकती है।"—कहते ही वह इस मूसलाधार बारिश के बीच तेज़ी से निकल पड़ी।

​ऋतुजा रंजाबती के इस विनाशकारी गुस्से को जानती थी, इसलिए उसने उसे और उकसाना ठीक नहीं समझा। लड़की वैसे तो बहुत अच्छी है, लेकिन बहुत डर लगता है जब उस पर यह अंधा गुस्सा और ज़िद सवार होती है; तब वह जैसे अपने आप में नहीं रहती, कोई हिंसक रूप अख्तियार कर लेती है। मगर उसे भी तो समझना होगा कि दुनिया की हर चीज़ को अपनी मुट्ठी में कैद करना मुमकिन नहीं है। जिसे वह प्यार समझ रही है, वह असल में प्यार नहीं—चर्म अधिकार की सनक है!