लेख
हिंदी के दो शिखर कवि , दो भिन्न दिशाएँ
विवेक रंजन श्रीवास्तव
आधुनिक हिंदी कविता के विराट परिदृश्य में नागार्जुन और मुक्तिबोध दो ऐसे शिखर हैं, जिन्होंने कविता को सामाजिक सरोकार और वैचारिक गहराई की नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। दोनों अन्याय, शोषण और विषमता के विरुद्ध खड़े होते हैं; दोनों की संवेदना का केंद्र आम मनुष्य है; दोनों प्रगतिशील चेतना से अनुप्राणित हैं। फिर भी उनकी काव्य-दृष्टि और अभिव्यक्ति के मार्ग भिन्न हैं। एक जनता के बीच खड़ा होकर बोलता है, दूसरा मनुष्य के अंतर्मन में उतरकर उसकी चेतना का अन्वेषण करता है।
नागार्जुन हिंदी के अप्रतिम जनकवि हैं। उनकी कविता खेत-खलिहानों, मजदूरों की हथेलियों, किसानों की पीड़ा और जनजीवन की धड़कनों से जन्म लेती है। उनकी भाषा में लोक का सहज सौंदर्य, जनभाषा की आत्मीयता और व्यंग्य की पैनी धार है। वे सत्ता के छल, सामाजिक अन्याय और राजनीतिक पाखंड पर बिना किसी आडंबर के सीधा प्रहार करते हैं। उनकी कविता पाठक से संवाद करती है, उसे आंदोलित करती है और प्रतिरोध का साहस देती है।
इसके विपरीत मुक्तिबोध की कविता भीतर की यात्रा है। वे बाहरी यथार्थ को मनुष्य की चेतना में घटित होते हुए देखते हैं। उनकी रचनाओं में आत्मसंघर्ष, नैतिक प्रश्नाकुलता, बौद्धिक बेचैनी और अस्तित्व की जटिलता गहन प्रतीकों और बिंबों के माध्यम से व्यक्त होती है। मुक्तिबोध पाठक को तैयार निष्कर्ष नहीं देते; वे उसे अपने भीतर छिपे अँधेरे से साक्षात्कार करने के लिए विवश करते हैं।
दोनों कवियों की वैचारिक भूमि समान है। दोनों शोषित मनुष्य के पक्षधर हैं, दोनों सत्ता और यथास्थिति के आलोचक हैं, और दोनों के लिए कविता सामाजिक परिवर्तन की सृजनात्मक शक्ति है। किंतु उनकी अभिव्यक्ति की दिशा अलग है। नागार्जुन का प्रतिरोध खुला, निर्भीक और व्यंग्यधर्मी है; मुक्तिबोध का प्रतिरोध आत्मविश्लेषण, प्रतीकों और जटिल वैचारिक संरचना के माध्यम से व्यक्त होता है। नागार्जुन व्यवस्था को ललकारते हैं, जबकि मुक्तिबोध उस मानसिकता को पहचानते हैं जो व्यवस्था को जन्म देती और पोषित करती है।
यही कारण है कि नागार्जुन की कविता जनता की जुबान पर सहज चढ़ जाती है, जबकि मुक्तिबोध की कविता बार-बार पढ़े जाने पर अपने अर्थ खोलती है। एक की शक्ति उसकी सहजता है, दूसरे की उसकी गहनता। किंतु यह भिन्नता मूल्य का नहीं, काव्य-दृष्टि का अंतर है।
'अकाल और उसके बाद' तथा 'बाकी बच गया अंडा' जैसी रचनाएँ नागार्जुन की जनप्रतिबद्धता का प्रमाण हैं, वहीं 'अँधेरे में' और 'ब्रह्मराक्षस' मुक्तिबोध की वैचारिक ऊँचाई और आत्मसंघर्ष की अमर उपलब्धियाँ हैं।
वस्तुतः नागार्जुन और मुक्तिबोध परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। नागार्जुन समाज का चेहरा सामने रखते हैं, मुक्तिबोध उसकी अंतरात्मा का दर्पण। एक बाहर की क्रांति का कवि है, दूसरा भीतर की क्रांति का। एक जनचेतना को स्वर देता है, दूसरा आत्मचेतना को।
इसीलिए आधुनिक हिंदी कविता का इतिहास इन दोनों के बिना अधूरा है। यदि नागार्जुन जनपक्षधरता के सबसे सशक्त स्वर हैं, तो मुक्तिबोध उसकी वैचारिक गहराई और नैतिक बेचैनी के सर्वोच्च कवि। दोनों मिलकर सिद्ध करते हैं कि कविता केवल सौंदर्य का विधान नहीं, बल्कि मनुष्य और समाज को अधिक मानवीय बनाने की सतत सृजन-प्रक्रिया है। बाबा नागार्जुन ,नागार्जुन हैं और मुक्ति बोध, मुक्तिबोध ही हैं। दोनों भिन्न पर मूल्य और शाश्वत साहित्यिक भाव वही ।
विवेक रंजन श्रीवास्तव