" तुम फूल हो भूल गये हो क्या
महको हवाओं को महसूस करो
किसी प्रेमी के हाथों में टूट जाओ
या नफरत के पैरों से कुचल जाओ
या भगवान केलिए माला बन जाओ
आखिरी एक दिन बिखर ही जाना है"
मैं रातों का मुसाफ़िर हूं
कह सकते हो निशाचर
मैं यहीं खूद से मिलता हूं
ठंडी हवाऐ, जागता शहर
जागती सड़कें, बंध खिड़कीयाँ
कभी अतीत में कभी भविष्य में चला जाता हूं।
इस तरह में खूद से मिलता रहता हूं।
" पैसा नाम की कुत्ती चीज़ ने सभी की नींद हराम कर सखी है
और कुछ लोग ज्ञान बांटते रहते है की यह बहुत बुरी चीज़ हैं। "
" हर रात अफसोस के साथ सोता हुं
कल से उसे छोड़ दूंगा।
सवेरा होतें ही सबकुछ भूलकर
रात होते वहीं अफसोसतक चला जाता हूं। "
" वहाँ गीने चूने अपने फल चुनें जायेंगे
तुम्हें कच्चा समझकर निकाल देगें
यह तय करने वाले सड़े हुए होगें।"
यह बात फलों के लिये नहीं थी ।
पुरुष
पुरुष का अपना परिवार होता है
परिवार चलाने यहाँ वहाँ फिरता है
जेब तो पहली तारीख भर लेता है
बांटते बांटते फिर खाली हो जाता है
फोन पर घर का हालचाल पूछ लेता है
अपना बेहाल अक्सर छूपा लेता है
घर की शिकायतें सुलझाता रहता है
खूद की शिकायतें दफ़न कर देता है
सस्ता खाना खाकर महिना गुजार लेता है
गरम ठंडा पसंद नापसंद सब भूल जाता है
" यहाँ हर कोई नंगा है मामा
कोई तन से , कोई मन से
कोई धन से , कोई यौवन से
कोई जुबा से , कोई वस्त्रों से
कोई जन्म से या कोई मृत्यु से
" ऐ- परदेसी तुं हो सके तो मत आना
तेरे आने की खुशी से ज्यादा
आकर चले जाना बडा़ दर्द दे जाता है।"
' चहरे पढ़ने की मुझमें बहुत बुरी आदत हैं।
बातें कम समझता हुं पर मन और मौन ज्यादा।
अभी भी मेरा बचपन माँ की गोद में खेलता था ।
पिताजी का प्यार उंगली पकड़कर चलता था ॥
घर की दीवारों से कभी दूर न जाने की इच्छा थी ।
पढ़ाई नामक मजबूरी होस्टल की कैद तक जाती थी ॥
सोचा था पढ़ाई खत्म करके आराम से घर में रहूँगी ।
पर नौकरी का पहिया मुझे यहाँ वहाँ घूमाता रहा ॥
बचपना घर में हर कौने में अभी भी जीवित था ।
घर की हर चीज़ मेरे जीवन की यादों के संग जुड़ी थी ॥
रीति रिवाजों की काली नज़रे हर जगह बांहे फैलायी थी ।
घर से बहुत दूर अजनबी गलियों में शांति खोज करनी थी ॥
विवाह का संस्कार जाल बिछाकर शिकार पर ही था ।
जो माता-पिता भाई-बहन और घर से दूर ले जाने वाला था ॥
मंजूर है मुझे ये समाज के रिश्ते नाते और रीति रीवाज ! ।
पर मैं माँ बाप के लिये बच्ची ही हुं समाज के लिये बडी़ ॥
ना शिकायत है ना कोई गम , है सिर्फ़ एक अफसोस! ।
काश! मैं परिवार का लड़का होता , तो जीवनभर घर में रह पाता॥
" किसी भी व्यक्ति को पहचानने में थोडा वक़्त लगा दो ,
कभी किसी तरह कहीं मूल स्वरूप में उसे आने दो ,
क्योंकि हर व्यक्ति के पीछे छिपा मूल स्वरूप होता ही है ,
जो जगत के लिये छिपाया गया हो ।"
" हम ऊन लोगों में से है ,
जो छुट्टी के पहले दिन से ही
दूसरी छुट्टी के प्लानिंग में व्यस्त हो जातें है ।"
मैं , खुद का इतिहास लिखने निकला हुं ।
कुछ अध्याय के बाद बहुत हमें छोड़ जायेंगे ,
और बहुतों को हम भूलने लगे हैं ।
नोट उडाने का दौर चल रहा है महफ़िलो में ।
तुम फूल हाथों में लेकर खडे हो, खड़े रह जाओगे ,
हे अर्जुन ! तुम्हारा युध्द तुम्हें ही लड़ना होगा ।
तुम्हारी बातें , तकलीफ़े कोई नहीं सुनने वाला।
सारी अच्छाईयाँ छोड़कर तुम्हारी एक बुराई
ढूंढकर लोग तुम्हें बुरा साबित करने लगेंगे ।
प्रेम की कविताएँ लिखी गईं बहुत
प्रेम की कहानियाँ लिखी गई बहुत
प्रेम सभी को अच्छा लगता है
पर प्रेम के दुश्मन आज भी है बहुत
प्रेम को किसीने लीखा बडा कोमल
पर प्रेम कांटो से घिरा रहता है बहुत
प्रेम अपेक्षाशून्य हो तो अमर है
प्रेम अपेक्षाओं से बंधा हुआ है बहुत
गांवों में कहाँ होता है फिल्मों वाला प्रेम
'माहि ' किताब में गांव की प्रेम कहानियाँ छपती है बहुत
पुरुष जिम्मेदारियों का बोझ लेकर फिरता है,
उसे सुख दुख और भावनाओं से भरें सवाल
न करना ही उचित हैं।
चलो पार्थ अब तुम्हें रणभूमि में उतरना हैं।
पहले तुझे अपनों को मारना था।
अब केवल अपनों को भुलना है।
शास्त्र कहतें हैं कि ; त्याग ही जीवन है ।
हमने ये शुरुआत कुछ लोगों से कर दी है॥
यह जमाना तुम्हें नंगा देखना चाहता हैं।
पुरुष को धन से और स्त्री को अंग से ॥
मच्छर जब गुनगुनाता है तब नहीं काटता,
वह जब चुप हो जाता तब खून पीता है।
आपके आसपास कईं लोग है मच्छर जैसे।
बोलते हैं वो कभी आपको हानि नहीं पहुँचाते ,
संभलना है तुम्हें चुपचाप खून पीने वाले मच्छरों से ।
पहले बडा़ कमज़ोर था मैं
कुछ अपने ही लोगों का बडा़
मुझे पत्थर जैसा मजबूत बनाने में
कुछ लोग चाटने में बहुत माहिर होतें हैं।
इसलिए एक ही जगह पर सालों तक टीके रहते हैं॥
हमें पहले से ही चाटना बिलकुल पसंद नहीं ।
इसलिए आजतक एक जगह पर टीके नहीं ॥
एक वक़्त होगा जब तुम्हें सब टोकेगें।
कुछ वक़्त बाद तुम्हें स्वतंत्र छोडा जायेगा,
तब लोग नहीं वक़्त तुम्हें ठोकेगा ।
मुझे एक तरफ़ अच्छे और सस्ते कपड़े खरीदने का मौका मिले।
और दूसरी तरफ़ अच्छे और सस्ती किताबें खरीदने का मौका मिले।
इन दोनो विकल्प में से एक ही विकल्प का चयन कर सकते है ऐसी शरत भी रखी जाये ।
तो मेरा विकल्प दूसरा ही होगा ।
तुम्हारी नांव तुम्हारे पास ही रखो
तूफ़ान अब चला गया है
जरुरत तब थी जब हम
बीच समंदर में फंसे थे
और अब हम तैरना भी
सीख गयें हैं।
उन्हें आदत थी भूलाने की
हमें बिमारी थी भूलने की
धीरे धीरे भूलाना चाहती थी
हम क्या करे? हमें तो बिमारी थी
दोनों का हिसाब हुआ बराबर
छोटा शिकारी दो गुना पैश खाने हिम्मत तब करता है ,
जब उनसे बडा़ शिकारी को पैसा खाने की आदत हो ।
पुरुष को खुद की परेशानियाँ इतनी परेशान नहीं करती
जितनी परिवार की परेशानियाँ परेशान करती हैं।
पैसों में दिलचस्पी रखने वाले व्यक्ति को
संबंधों में ज्यादा दिलचस्पी नहीं होती ,
जब विपरीत परिस्थितियाँ चल रही हो ।
तब शांत रहो ,चुप रहो ।
किसी को अपनी बातें मत कहो ।
समय को समय का काम करने दो।
सब शांत , कुशल मंगल हो जायेगा।
क्योंकि ऐसी परिस्थितियों का
उपाय और औषध केवल समय के पास हैं।
जो अच्छे अच्छे घावों को भरना जानता है ।
पुरुष बिना आंखों के भी रो सकता हैं ,
जबकि स्त्री को रोने के लिये आंखें चाहिए।
किताबें सडकों पर धूल धूप खाती
शराब महलों में पैर फैलाये झूला खाती
दूध घर घर जाकर बोले अपनी वाणी
मंदिर- मस्जिद में हर दिन भीड लगी
ग्रंथालय ज्ञान लेकर सब के सब खाली
धनवाला इस जगत का सबसे बडा ज्ञानी
ज्ञानवाला रंक होकर मांगे रोज मेहरबानी
लोगों को झूठ का जहर पिलाना आसान है
अमृत को मुंह लगाने से भी डरते है |
" अब सुधर जाओ"
जंगल जंगल डाल डाल फूल फल काटलो।
जल, स्थल , नदि, समंदर में जहर डालदो ॥
धरातल खोदकर खनिज सारा निकाललो।
प्रकृति, संस्कृती का नामो निशान मिटादो॥
धर्म,जाति,के भेद पे अपना पराया करलो।
मानवता छोडकर दानवता को बढावा दो॥
कृषि के जगह पक्की दिवारें खडी करदो।
अन्न पकाने वाले को आत्महत्या करने दो॥
दोर यूंही चलता रहा तो अंतिम दिन गिनलो।
'माहि' अभी वक़्त है तुम अब सुधर जाओ ॥
-पवार महेन्द्र
-०२/०५/२०२१
'
' तेरह तूटना बाकी है'
हे ! मुसाफ़िर क्युं तुं अस्वस्थ है
अभी तो शुरुआत ही बाकी है
प्रभाव डालने स्वभाव भूला तुं
अभी तो बहुत झमेला बाकी है
दाव खेलकर हारा तो क्या हुआ
अभी तो शतरंज खेलना बाकी है
थोडा सा चखकर डकार लेता है
अभी घाट घाट का पानी बाकी है
मूड ठीक नहीं कबतब कहेगा तुं
अभी तो मगज का दही होना बाकी है
हर बात में शर्म क्युं आती है तुझे
अभी तो इज्ज़त का फालूदा बाकी है
पवन के झोंके से भयभीत हुआ तुं
अभी तो जीवन में तूफ़ान आना बाकी है
यह तो कोई भी मुश्किल नही है
'माहि' एक जुड़ा तेरह तूटना बाकी है
" कभी कभी "
कभी गद्दी पे कभी मिट्टी पे सोया।
कभी रोते हंसा कभी हंसते रोया।
कभी वफ़ादारी ने धोखा दिया।
कभी शराफ़त ने खूब धोया।
कभी गरीबी में दोस्तों को खोया।
कभी फरेबी घांवो ने बीज बोया।
कभी झुंझुनू समझकर नचाया।
कभी बचा जुठा खाना खाया ।
कभी पूरी रात तरस ने जगाया।
कभी पूरा दिन भूख ने दौड़ाया।
कभी मजबूरीने बर्तन धुलवाया।
कभी मजदूरी ने वर्तन भूलाया।
कभी यहाँ वहाँ भटकता पराया।
कभी किसीने अपना नहीं बुलाया।
- पवार महेन्द्र
- ३० जनवरी २०२१
" माहि रखा क्या है "
बार बार पूछता रहा जिंदगी से कि तेरी रझा क्या है
इस शाम की मंद रोशनी में तुम नहीं तो मज़ा क्या है
तुम हो तो शाम रोशन , रात रोशन गुले ए गुलशन है
हर बात में तुम हो जिस बात में तुम नहीं वो बात क्या हेै
तैरे बगैर ये सारा संसार एक बहता खारा समंदर है
इस बहती भिड़ में तुम नहीं तो ये भरा संसार क्या है
जो हवा आपको छूकर गुजरती है वो भी हंसती है
जिस बहती हवा में तेरी खुशबू नहीं वो हवा क्या है
मेरी जिंदगी जी लूंगा तुम्हारे साथ बिते पलो के सहारे
वैसे यादो के साथ मर मर जीने में ' माहि ' रखा क्या है