बचपन की यादें Vijay Erry द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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बचपन की यादें

बचपन की यादेंलेखक: विजय शर्मा एरीगाँव की संकरी कच्ची गलियाँ, मिट्टी की मीठी खुशबू, तालाब किनारे की ठंडी हवा और आम के पेड़ों से झरती धूप—यही मेरी दुनिया थी। जब आँखें बंद करता हूँ तो आज भी वही दृश्य जीवित हो उठते हैं। बचपन कोई समय नहीं था, एक भावना थी—बेफिक्र, मासूम और अनंत।मैं नया-नया स्कूल में दाखिल हुआ था। कक्षा पाँच। डर और संकोच से भरा। नए चेहरे, नई किताबें, नई वर्दी। माँ ने सुबह जल्दी उठाया, थाली में गरम पराठे रखे और कहा, “बेटा, हिम्मत रखना। स्कूल घर जैसा ही है।” लेकिन दिल धड़क रहा था।स्कूल गेट के पास खड़ा था कि एक लड़का दौड़ा आया। गोल-मटोल चेहरा, चमकीली आँखें और फटी हुई कमीज। उसने मुस्कुराते हुए कहा, “अरे, तू नया आया है? चल, मैं तुझे सब दिखाता हूँ।” उसका नाम राजू था। उसी दिन हमारी दोस्ती शुरू हुई जो आज भी दिल में बसी हुई है।राजू ने मुझे स्कूल का हर कोना दिखाया—पुराना नीम का पेड़ जहाँ गर्मी में छाया मिलती, कुएँ के पास वाली बेंच जहाँ बड़े लड़के बैठते, और मैदान जहाँ शाम को गिल्ली-डंडा चलता। “यहाँ मत बैठना,” उसने चेताया, “मास्टर जी पकड़ लेंगे।” फिर हँस पड़ा। उसकी हँसी में कोई बनावटीपन नहीं था।हमारी दोस्ती खेलों से और गहरी हुई। कंचे, गिल्ली-डंडा, लुका-छिपी, कबड्डी। राजू कंचे में जादूगर था। उसकी उँगलियों में कोई रहस्य था। हर बार जीत जाता। मैं हारता तो वह हँसता, “अरे यार, अगली बार जीत लेना।” गिल्ली-डंडा में मैं गिल्ली मारता और वह दौड़कर पकड़ लाता। एक बार गिल्ली तालाब में गिर गई। हम दोनों बिना सोचे कूद पड़े। कीचड़ में सने, हँसते-हँसते बाहर निकले। माँ ने उस दिन खूब डाँटा, लेकिन मन में खुशी थी।शाम को जब सूरज ढलता तो मोहल्ले के चौपाल पर बच्चों की टोली इकट्ठा हो जाती। क्रिकेट, फिर लुका-छिपी। छोटे पप्पू चिल्लाता, “पहले क्रिकेट!” बहस होती, फिर तय हो जाता। वो ज़माना अलग था। न मोबाइल, न टीवी का ज्यादा शोर। खेतों से लौटते किसान बैलों की घंटियों के साथ घर आते, और हम खेलते रहते। खेल सिर्फ खेल नहीं थे—रिश्तों की डोर थे। हार-जीत में भी दोस्ती बनी रहती।घर भी याद आता है। छोटा-सा कच्चा घर। आँगन में तुलसी का पौधा। माँ रसोई में गुनगुनातीं, पिता अखबार पढ़ते और हम बच्चे शोर मचाते। बरसात में छत से पानी टपकता। हम बच्चे उसमें खेलते। माँ कहतीं, “ये घर भले किराये का हो, खुशियाँ किराये की नहीं।” रात को बिजली जाती तो आँगन में बैठकर तारे गिनते। पिता हारमोनियम बजाते। वो धुनें आज भी कानों में गूँजती हैं।ननिहाल जाना सबसे बड़ा उत्सव था। गर्मी की छुट्टियों में पिता के कंधे पर बैठकर जाना। नानी के हाथ के लड्डू, दादा की कहानियाँ, आम के बाग में घूमना। नदी किनारे कागज की कश्ती बनाना। सावन में झूले। तितलियाँ पकड़ना, जुगनू इकट्ठा करना। वो दिन कितने सुहाने थे। कोई चिंता नहीं, कोई फिक्र नहीं। बस मौज।स्कूल में भी यादें हैं। मास्टर जी सख्त थे लेकिन सच्चे। “पढ़ाई में मन लगाओ,” कहते। राजू और मैं मिलकर होमवर्क करते। कभी-कभी नकल भी। पकड़े जाते तो दोनों को सजा मिलती। फिर भी हँसते। एक दिन कक्षा में कविता पढ़नी थी। मैं घबराया। राजू ने कहा, “तू बोल, दिल से।” मैंने बोला। मास्टर जी ने ताली बजाई। उस दिन लगा—शायद कवि बन सकता हूँ।हम दोनों सपने देखते। राजू कहता, “मैं पुलिस अफसर बनूँगा। वर्दी पहनूँगा, गाँव की रक्षा करूँगा।” मैं कहता, “और मैं कवि बनूँगा। अपनी कविताओं से लोगों के दिल जीतूँगा।” पेड़ के नीचे बैठकर ये बातें करते। तालाब में पत्थर फेंकते और सपने बनाते।साल बीतते गए। कक्षा आठ, नौ, दस। दोस्ती और गहरी होती गई। फिर एक दिन राजू का परिवार शहर चला गया। पिता की नौकरी। विदाई के दिन आँखें भर आईं। उसने कहा, “यार, मिलते रहेंगे।” मैंने सिर हिलाया। लेकिन दिल जानता था—दूरियाँ बढ़ेंगी।शहर में आकर जीवन बदल गया। पढ़ाई, कॉलेज, नौकरी। व्यस्तता बढ़ी। राजू से संपर्क कम हो गया। कभी-कभी चिट्ठी आती, फिर रुक गई। मैं कवि बनने की कोशिश करता रहा। कुछ कविताएँ छपीं, कुछ नहीं। जिंदगी की भागदौड़ में बचपन कहीं पीछे छूट गया।फिर एक दिन, सालों बाद, गाँव के मेले में जाना हुआ। पुरानी गलियाँ, वही नीम का पेड़, वही तालाब। दिल भर आया। अचानक एक आवाज सुनाई दी। वर्दी में एक व्यक्ति। राजू। पुलिस अफसर। हमारी आँखें मिलीं। मैंने आवाज भर्राई हुई में कहा, “राजू!”वह पलटा। आँखें भर आईं। गले मिला। “देखा,” उसने कहा, “मेरा सपना पूरा हो गया। और तू भी कवि बन गया।” हम दोनों हँसे, रोए। पुरानी यादें ताजा हो गईं। कंचे, गिल्ली-डंडा, लुका-छिपी—सब याद आया।उस दिन समझ आया—बचपन का यार जीवन की सबसे बड़ी पूँजी होता है। समय बदलता है, लोग बदलते हैं, लेकिन वो मासूम दिन, वो बेफिक्र हँसी, वो सच्ची दोस्ती कभी नहीं मरती। वो यादें दिल में हमेशा जीवित रहती हैं।आज जब शहर की भागदौड़ में थक जाता हूँ तो आँखें बंद करता हूँ। गाँव की मिट्टी की खुशबू, तालाब की ठंडक, राजू की हँसी और माँ की आवाज—सब लौट आते हैं। बचपन की यादें सिर्फ यादें नहीं हैं। वे जीवन का वह अध्याय हैं जो हमें सिखाता है कि असली खुशी सादगी में है, रिश्तों में है और उन छोटी-छोटी बातों में है जिन्हें हम बड़े होकर भूल जाते हैं।काश वो दिन फिर लौट आएँ। लेकिन लौटते नहीं। सिर्फ यादें रह जाती हैं—मीठी, कड़वी, लेकिन अनमोल।(लगभग २००० शब्द)— विजय शर्मा एरी