अमर समर्पण: एक अनकही दास्तान Anamika द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

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अमर समर्पण: एक अनकही दास्तान

लेखिका "अनामिका"

गाँव की गलियों में जब पैरों में पायल बांधे छह साल की नन्हीं मीरा दौड़ती, तो हवा में उसकी बेफिक्र हँसी गूँज उठती। माँ अक्सर रसोई के झरोखे से मुस्कुराते हुए उसे पुकारती, "मीरा! संभल के दौड़ो बेटा।"

​मीरा पूरे गाँव में अकेले ही कभी तितलियों के पीछे भागती, तो कभी धूल में मिट्टी के खिलौने बनाती। पर ताज्जुब की बात यह थी कि गाँव का कोई भी बच्चा उसके साथ नहीं खेलता था। जैसे ही मीरा किसी बच्चे की तरफ कदम बढ़ाती, वह चीखते हुए दूर भाग जाता।

​पापा के पुराने थैले में किताबों की कुछ कॉपियाँ सहेजकर मीरा हर सुबह बहुत चाव से गाँव के प्राइमरी स्कूल की तरफ जाती। लेकिन जैसे ही वह क्लास के दरवाजे पर पहुँचती, बच्चे और मास्टर जी सब के सब बदहवास होकर कमरे से बाहर भाग निकलते। मीरा उदास होकर खाली बेंच पर बैठ जाती और किताबों के पन्नों पर अपनी छोटी-सी उँगलियाँ फेरने लगती... उसे समझ नहीं आता था कि सब उससे इतना डरते क्यों हैं?

​समय यूँ ही बीतता गया और नन्हीं मीरा कब किशोरावस्था की दहलीज़ पार कर गई, किसी को पता ही नहीं चला। पर गाँव का माहौल नहीं बदला; उसकी हँसी अब भी अकेले हवाओं में गूँजती थी और उसके कदम जहाँ पड़ते, वहाँ सन्नाटा पसर जाता। वह अपनी किताबों, माँ के दुलार और अपने ही साये के साथ अकेलेपन में ही बड़ी होती रही, इस बात से अनजान कि पूरा गाँव उसके करीब आने से क्यों काँपता है।

अकेलेपन की इस लंबी राह में मीरा ऐसी ही दिन बिता रही थी, पर एक शाम गाँव की शांत आबो-हवा अचानक बदल गई। सरपंच का बेटा, नीलेश, सालों बाद शहर से अपनी पढ़ाई पूरी करके गाँव वापस लौट रहा था।

​जैसे ही उसकी नज़र रास्ते किनारे खड़ी मीरा पर पड़ी, उसके कदम खुद-ब-खुद थम गए। हर बार लोगों को डरकर भागते देखने की आदी मीरा हैरान रह गई, क्योंकि इस बार सामने खड़ा अजनबी भागने के बजाय उसे देखकर बड़ी आत्मीयता से मुस्कुरा रहा था।

​मीरा का दिल घबराहट और एक अनजानी सी खुशी से धड़क उठा; जिस अकेलेपन से वह ताउम्र जूझी थी, पहली बार किसी की नज़रों में उसके लिए खौफ नहीं, बल्कि एक अजीब सा खिंचाव था, और नीलेश को भी पहली ही नज़र में वह मासूम सी लड़की भा गई थी।

कुछ दिनों बाद जब नीलेश अपने दोस्तों के साथ मंदिर जा रहा था, तब उसकी नज़र नदी किनारे बैठी मीरा पर पड़ी। वह दोस्तों को पीछे छोड़कर धीरे से मीरा के पास पहुँचा और पूछ बैठा, "क्या तुम इसी गाँव की हो? तुम्हारा नाम क्या है?"

​मीरा ने थोड़ी हिचकिचाहट के साथ जवाब दिया, "हाँ, मैं इसी गाँव की हूँ... मेरा नाम मीरा है।" जब मीरा ने उसका नाम पूछा, तो उसे पता चला कि वह सरपंच का बेटा नीलेश है। माँ के अलावा अपनी ज़िंदगी में पहली बार किसी और से खुलकर बात करके मीरा का दिल खुशी से झूम उठा, और नीलेश भी उसके मासूम चेहरे पर मोहित हो गया।

​इसके बाद दोनों अक्सर दुनिया की नज़रों से छुप-छुपकर नदी किनारे मिलने और बातें करने लगे। सब कुछ किसी हसीन सपने जैसा चल रहा था, लेकिन एक दिन नीलेश के एक करीबी दोस्त को उनके इस गुप्त मिलन के बारे में पता चल गया। यह जानते ही कि नीलेश किस लड़की से मिलता है, उसके दोस्त के चेहरे का रंग उड़ गया और वह बुरी तरह घबराकर काँपने लगा।

​निलेश का दोस्त घबराया हुआ उसे खींचते हुए मंदिर में ले गया। जब निलेश ने उसकी डर का कारण पूछा, तो वह कांपते हुए बोला, "तू यह क्या कर रहा है? तुझे मीरा के बारे में कुछ नहीं पता! गाँव का कोई भी इंसान उसके पास नहीं भटकता क्योंकि वह एक डायन की बेटी है।"

​उसने निलेश को चेताते हुए आगे कहा, "16 साल पहले उसके पिता ने नशे की हालत में उसकी माँ को मार दिया था। लेकिन उसकी माँ की आत्मा आज भी अपनी बेटी के साथ ही है। वह लड़की और उसकी माँ का भूत एक साथ रहते हैं, इसलिए उससे दूर ही रह!"

दोस्त की बातें सुनकर नीलेश के मन में अजीब सी हलचल पैदा हो गई, इसलिए उसने सीधे मीरा से ही बात करने का फैसला किया। वह बिना देर किए मीरा के घर की तरफ बढ़ा, जहाँ मीरा अपने घर के बाहर अकेली खड़ी थी। नीलेश ने बिना छिपाए उसे गाँव वालों की कही सारी बातें बता दीं।

​यह सब सुनते ही मीरा का चेहरा ज़र्द पड़ गया और वह डर के मारे काँपने लगी; उसने अपनी ज़िंदगी में कभी ऐसी खौफनाक बात नहीं सुनी थी। वह अभी इस हैरान करने वाली बात को समझ भी नहीं पाई थी कि तभी पीछे से उसकी माँ की आवाज़ आई और वह मीरा के करीब आकर खड़ी हो गई। माँ का वो साया देखकर नीलेश की रूह काँप गई और वह बदहवास होकर पीछे हटने लगा।

​नीलेश जैसे ही खौफ से पीछे हटने लगा, हवा में एक बर्फीली सरसराहट के साथ मीरा की माँ का साया अचानक विकराल और डरावना हो गया। उसकी लाल उबलती आँखों से नफ़रत बरस रही थी और चेहरे की खाल भयानक तरीके से खींचने लगी थी।

​उसने एक ही झटके में नीलेश का गला दबोचकर उसे ज़मीन से ऊपर उठा दिया। हवा में गर्जती हुई भारी और डरावनी आवाज़ में वह गुर्राई, "मुझे लगा था तू मेरी बच्ची के अकेलेपन का सहारा बनेगा... इसलिए मैंने तेरी गर्दन अब तक नहीं तोड़ी थी! पर तू भी इस पापी गाँव का ही खून निकला! अब तू यहाँ से ज़िंदा नहीं जाएगा!" नीलेश हवा में लटका हुआ साँस लेने के लिए छटपटाने लगा, जबकि मीरा चीखती-चिल्लाती हुई रोते-बिलखते अपनी माँ के आगे हाथ जोड़ने लगी।

अपनी आँखों के सामने माँ का वह भयानक रूप देखकर मीरा को अहसास हो गया कि गाँव वाले सही थे और वह सचमुच एक डायन की बेटी है। उसे समझ आ गया कि उसकी वजह से ही उसकी माँ की आत्मा इस दुनिया में भटक रही है। नीलेश के प्रति अपने गहरे प्यार, माँ की मुक्ति और नीलेश की जान बचाने के लिए, उसने एक पल की भी देरी नहीं की। वह बदहवास होकर भागती हुई छत पर चढ़ी और ज़मीन पर छलांग लगा दी।

​यह खौफनाक मंज़र देखते ही माँ और नीलेश दोनों के होश उड़ गए। माँ के हाथों से पकड़ ढीली होते ही नीलेश बदहवास होकर नीचे भागा और खून से लथपथ मीरा को अपनी बाहों में उठा लिया।

​दम तोड़ती मीरा ने नीलेश की आँखों में देखते हुए धीरे से कहा, "मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूँ नीलेश... पर जब तक मैं ज़िंदा हूँ, मेरी माँ तुम्हें नुकसान पहुँचाती रहेगी और उन्हें मुक्ति भी नहीं मिलेगी। हम कभी एक नहीं हो सकते थे। इसलिए मैं जा रही हूँ, ताकि तुम शांति से जी सको और मेरी माँ को मोक्ष मिल सके..." इतना कहते ही मीरा ने नीलेश की बाहों में सदा के लिए अपनी आँखें मूँद लीं।

मीरा के आखिरी शब्द हवा में विलीन हो गए और उसकी साँसें थम गईं। नीलेश उसे अपनी छाती से लगाए फूट-फूटकर रो रहा था, जबकि उसकी माँ का डरावना साया धीरे-धीरे धुएँ में बदलकर आसमान में ओझल हो गया—अपनी बेटी के बलिदान के साथ उसकी आत्मा को आखिरकार मुक्ति मिल चुकी थी। उस रात के बाद गाँव में सन्नाटा तो हमेशा के लिए छा गया, पर नीलेश की आँखों में मीरा का वह निस्वार्थ प्रेम और नदी किनारे उसकी मासूम मुस्कान ताउम्र के लिए अमर हो गई।

​— समाप्त —