निगलते पहाड़ Kapil Tiwari द्वारा आध्यात्मिक कथा में हिंदी पीडीएफ

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निगलते पहाड़

महज आठ साल का ही तो था मैं, जब मैंने अपने खेत जाते समय अपनी दादी से पूछा था—"ये पहाड़ कैसे बनते हैं?"

दादी मुझे बचपन से ही ढेर सारी कहानियाँ सुनाया करती थीं। उनकी कहानियों में शेर, चीते, हिरन, घोड़े और भी बहुत सारे पात्र हुआ करते थे। उस उम्र में मेरे ज्ञान का मुख्य स्रोत मानो मेरी दादी की कहानियाँ ही थीं, और दादी मेरी हर समस्या की समाधानकर्ता। तो जब-जब मेरे मन में कोई भी प्रश्न आता, मैं अपनी सलाहकार दादी से पूछ लेता था।

पहाड़ों के बारे में मेरी जिज्ञासा की वजह यह भी थी कि मेरा जन्म बुंदेलखंड के इन्हीं पठारों के बीच बसे एक छोटे से गाँव में हुआ है। मैं बचपन से ही पहाड़ों को देखता आया हूँ, लेकिन न जाने उस रोज़ मेरे मन में कैसे यह विचार आया और मैंने पूछ लिया—"ये पहाड़ कहाँ से आए दाई?" (बुंदेलखंड में दादी को ‘दाई’ कहते हैं)।

दाई मेरे सभी सवालों के जवाब दे दिया करती थीं, तो जाहिर है इसका भी जवाब मिलना ही था। दाई बोलीं—"अरे मोड़ा, जब हनुमान जी, श्री राम जी के छोटे भाई लछमन जी के लाने हिमालय से जड़ी-बूटी को परबत लंका ले जा रहे हते, तब ऊई परबत से कछू छोटे-छोटे टुकड़े सब जगह बिखर गए हते। बस, उन्हीं टुकड़ों से ये पहाड़ बन गए।"

मैं इस उत्तर से पूरी तरह संतुष्ट था। चूँकि मेरा जन्म एक तथाकथित पंडित परिवार में हुआ था, इसलिए मैं इन पौराणिक कथाओं से काफी परिचित था। घर का माहौल भी धार्मिक ही रहता था और आज भी है।

मैं इन्हीं पठारों को देखते-देखते बड़ा हुआ हूँ। टेढ़ी-मेढ़ी सड़कें, मानो जैसे नाच रही हों... थोड़ी ऊँचाई, फिर ढलान... मानो कोई झूला झूल रहा हो। ऐसा सुंदर दृश्य जो मन मोह ले! ऊँचाइयों में एक अद्भुत मौन बसता है। खेत के बीच चलते-चलते कब पहाड़ आ जाए, पता ही न चलता था। सामान्य समतल से कब ऊँचाई आ जाए, जब तक आप यह समझ पाएँ, तब तक आप पहाड़ से नीचे उतर भी चुके होते थे। जहाँ आपको खुद को तलाशने का सुकून भरा समय मिलता है—ऐसे हैं वे ऊँचे पठार।

परंतु समय के प्रवाह के साथ कुछ लुटेरों की नज़र इन सुंदर पठारों पर पड़ गई। जब स्वयं को मनुष्य कहने वालों के लिए प्रकृति कोई बाहरी वस्तु बन जाती है, विकास और विनाश की परिभाषा धुंधली हो जाती है, और आँखों में नज़र का केंद्र केवल लाभ, भोग तथा असीम संपत्ति बन जाता है; तो फिर ऐसे भोगी लोगों से पहाड़, पेड़ और प्रकृति भला कैसे बच सकते हैं?

लुटेरों की तीखी नज़र जब इन पहाड़ों पर पड़ी, तो मैंने देखा कि कोई पहाड़ों को निगल रहा है। और पहाड़ों के साथ-साथ, जो लोग वहाँ खेती करते थे, वे उनकी फ़सलों को भी खा गए। पहाड़ों को इस कदर तोड़ा गया कि विस्फोटों की गूँज से तीन किलोमीटर दूर गाँव में बने घरों की छतों पर दरारें आ गईं। टूटने से निकले पहाड़ के छोटे-छोटे टुकड़े आस-पास के खेतों में ऐसे बिछ जाते, मानो पेड़ से महुए के फल टपके हों! स्थिति यह हो गई कि किसान सुबह खेतों से पत्थर बीनकर साफ़ करता और शाम को फिर से खेत पत्थरों से भर जाते।

इन लुटेरों ने बड़ी-बड़ी पहचानें बना ली हैं। सत्ता के शीर्ष पर बैठे मुखौटा लगाए चोर ‘विकास’ की बातें कर रहे हैं। वहीं बातें करते-करते वे इशारा करते हैं कि इन पहाड़ों के कमीशन से नई इमारतें बनाई जाएँगी, जिनमें वे और कुछ गिने-चुने लोग रहेंगे।

पत्थर बीनते-बीनते किसान इन पत्थरों के बोझ तले दब जाता है और सोचता है कि पत्थर इतने ज़्यादा हैं, क्या कोई मेरी यह पुकार सुनेगा कि इन पत्थरों को थोड़ा कम तोड़ो, मेरी फ़सल ख़राब हो रही है? जब मुट्ठी भर किसानों ने आवाज़ उठाई, तो ऊपर तक पहुँचते-पहुँचते वह धीमी पड़ गई। जब कई सालों तक आवाज़ उठाई जाती रही, तो लुटेरों के आकाओं की तरफ़ से बयान आया—"यह सब विकास के लिए किया जा रहा है। पत्थरों से गिट्टी बनेगी और गिट्टी से बेहतरीन सड़क, जो आपके लिए ही बनाई जा रही है।"

किसान सोच में पड़ गए कि "हमें तो बाज़ार सिर्फ़ दस किलोमीटर जाना पड़ता है, उसके लिए दस साल से लगातार पहाड़ों को खाया जा रहा है! क्या यह विश्व की सबसे लंबी सड़क हमें लंदन लेकर जाएगी?"

किसानों ने फिर से आवाज़ बुलंद की—"हमें अपनी खेती बर्बाद करके सड़क पर नहीं चलना है! भूखे पेट सड़क पर चल कर भी हम क्या करेंगे?"

इतना सुनने के बाद ठेकेदारों ने पहाड़ से उड़ती धूल पर पानी का छिड़काव करवा दिया और कुछ चंद रुपये किसानों के हाथ में थमा दिए। अब उन गिरते पत्थरों से मरने वाले जानवर, घायल या मृत आदमी—सब कुछ चंद रुपयों में समझौता करने लगे हैं। यहाँ तक कि उन्हीं टूटते पहाड़ों में कुछ लोग अपने लिए रोज़गार की तलाश भी करने लगे हैं।

अब परिस्थिति ऐसी बन चुकी है कि धीरे-धीरे वह विरोध की आवाज़ शांत होने लगी है। और अब मुझे अच्छी तरह पता चल चुका है कि हनुमान जी के हिमालय से लंका जाते समय ये टुकड़े नहीं गिरे थे। और अगर इन पहाड़ों को इसी तरह निगल लिया गया, तो ये शायद दोबारा कभी वैसे नहीं हो पाएँगे, जैसे पहले थे।

~ कपिल तिवारी”यथार्थ”