शब्द और सत्य - भाग 15 Shivraj Bhokare द्वारा कविता में हिंदी पीडीएफ

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शब्द और सत्य - भाग 15

43.मैं एक कुत्ता हूँ, इंसान नहीं.

सुनो ओ दो पैरों वाले,
तुम क्यों खुद को श्रेष्ठ बताते हो?
अहंकार की भारी गठरी लेकर,
दिन-रात व्यर्थ मंडराते हो। 

हाँ, मैं एक कुत्ता हूँ, इंसान नहीं,
तुम्हारी तरह मेरा कोई नकली मान नहीं।
तुम्हारे पास भाषा है, पर बस झूठ बोलते हो,
भीतर नफरत पालकर, बाहर अमृत घोलते हो। 

मैंने वफादारी सीखी है, मक्कारी नहीं,
मालिक से गद्दारी की, ऐसी कोई बीमारी नहीं।
तुम मंदिर-मस्जिद में जाकर भी मौन नहीं होते,
और तुम्हारी तृष्णा की आग कभी शांत नहीं होती। 

तुम महलों में रहकर भी भीतर से कंगाल हो,
वासना और ईर्ष्या का बुना हुआ जाल हो।
मैं रोटी के एक टुकड़े में भी तृप्त सो जाता हूँ,
तुम पूरी दुनिया जीतकर भी रोते रह जाते हो। 

छोड़ो यह झूठा गौरव, यह पद और यह नाम,
पहले सच को देखना सीखो, सुबह हो या शाम।
मुझसे वफादारी सीखो, या अपनी चालाकी पर रोओ,
इंसान बनने से पहले, कम से कम होश में तो आओ।

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44.तितली सुंदर बनने की कोशिश नहीं करती..

मेकअप के डिब्बों में तुम अपनी पहचान ढूंढती हो,
शीशे के सामने बैठकर, खुद को ही ठगती हो।
तितली सुंदर बनने की कोशिश नहीं करती कभी,
उसका सहज होना ही उसका सौंदर्य है अभी। 

इस बाज़ार ने तुम्हें सिखाया कि तुम अधूरी हो,
जब तक क्रीम और लिपस्टिक न लगाओ, अधूरी हो।
तुमने जिस्म को सजाया, पर चेतना को भुला दिया,
दूसरों की नज़रों के लिए, खुद का वजूद मिटा दिया। 

तुम कोई सजावट की वस्तु नहीं, जिसे सराहा जाए,
तुम कोई गुड़िया नहीं, जिसे पिंजरे में सजाया जाए।
तुम्हारे भीतर बहती है प्रकृति की असीम शक्ति,
मगर तुम उलझी रही पुरुषों को रिझाने की आसक्ति में। 

छोड़ो यह हीनभावना, यह सजने-संवरने का ढोंग,
सुंदरता का यह पैमाना तो बस एक दिमागी रोग है।
जब तुम मुक्त होगी इस नकली रूप के व्यापार से,
तभी तुम्हारी आत्मा महकेगी असली निखार से।

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45.भेड़ें रास्ता चुनती हैं या भीड़?

चले जा रहे हो उस तरफ, जहाँ सब भाग रहे हैं,
बिना सोचे, बिना समझे, बस कदम बढ़ा रहे हैं।
ज़रा रुको और पूछो इस दौड़ते हुए समाज से,
भेड़ें रास्ता चुनती हैं या सिर्फ़ भीड़ को चुनती हैं? 

सामने खाई हो या कुआँ, कोई नहीं देखता,
आगे वाले की पूँछ पकड़कर, हर कोई है रेंगता।
तुम्हारी अपनी कोई आँख नहीं, अपना कोई होश नहीं,
भीड़ का हिस्सा बन गए हो, इसलिए कोई अफ़सोस नहीं। 

बाज़ार ने कहा यह खरीदो, तो तुम लाइन में लग गए,
समाज ने कहा वैसा बनो, तो तुम खुद को ही ठग गए।
नौकरी, शादी, मकान और फिर मौत का वो कुआँ,
सब कर रहे हैं वही, जो उनके बाप-दादा ने किया। 

क्या तुमने कभी अपने दिल से कोई सवाल किया?
या बस भीड़ के शोर को ही अपनी आत्मा की आवाज़ कह दिया?
भेड़ की नियति है कटना, चाहे मन्दिर हो या कसाईघर,
और तुम्हारी नियति है घुटकर जीना, इस अंधी दौड़ के भीतर। 

तुम सोचते हो तुम सुरक्षित हो, क्योंकि तुम अकेले नहीं हो,
पर सच तो यह है कि तुम ज़िंदा ही नहीं, बस एक ढेरी हो।
भीड़ कभी सत्य तक नहीं पहुँचती, वह सिर्फ़ शोर करती है,
और तुम्हारी चेतना को मन्द करके, तुम्हें गर्त में ढकेलती है। 

छोड़ो यह झुंड का हिस्सा होना, इस गुलामी से आज़ाद हो जाओ,
अकेले खड़े होने की हिम्मत करो, थोड़े होश में तो आओ।
रास्ता वो नहीं जो सबने चुना, रास्ता वो है जो तुमने जाना है,
भेड़ मत बनो ओ इंसान, तुम्हें तो अपनी मुक्ति को पाना है।

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यदि मेरी कविताएँ कठोर लगें, तो शब्दों को दोष मत दीजिए; वे केवल सत्य का दर्पण हैं।