काल्पनिक उपन्यास पर मुकदमा - 2 Fictional world द्वारा मनोविज्ञान में हिंदी पीडीएफ

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काल्पनिक उपन्यास पर मुकदमा - 2

The Fourth Reader:
बारिश लगातार तीसरे दिन भी नहीं रुकी थी।
Convenience Store के बाहर लगी नियॉन लाइट पानी की बूंदों में टूटकर चमक रही थी।
रात के साढ़े दस बजे थे।
दुकान लगभग खाली हो चुकी थी।
वह काउंटर पर खड़ी बिल बना रही थी।
"एक कॉफ़ी।"
उसने सिर उठाया।
उसके सामने लगभग पचास वर्ष का एक आदमी खड़ा था।
साधारण कपड़े।
सफेद बाल।
लेकिन उसकी आँखें...
अजीब तरह से शांत थीं।
"जी।"
उसने कॉफ़ी स्कैन की।
"कुल 3.40।"
आदमी ने पैसे दिए, लेकिन जाने की बजाय कुछ सेकंड तक उसे देखता रहा।
"तुम बहुत थकी हुई लग रही हो।"
वह हल्का-सा मुस्कुराई।
"रात में दूसरा काम भी करती हूँ।"
"क्या?"
"कहानियाँ लिखती हूँ।"
आदमी की भौंह हल्की-सी उठी।
"सच?"
"जी... लेकिन कोई पढ़ता नहीं।"
कुछ पल की चुप्पी।
फिर आदमी मुस्कुराया।
"हर अच्छी कहानी को अपना पहला पाठक मिलने में समय लगता है।"
वह कुछ कह पाती, उससे पहले वह कॉफ़ी लेकर चला गया।
दरवाज़े की घंटी बजी।
टन...
और वह बारिश में गायब हो गया।
रात 1:12 बजे।
छोटे से कमरे में वही पुराना लैपटॉप खुला था।
उसने नया अध्याय पूरा किया।
कुछ देर तक स्क्रीन को देखती रही।
फिर हमेशा की तरह Publish दबा दिया।
उसने आँकड़े देखने की हिम्मत नहीं की।
लैपटॉप बंद किया और सो गई।
उसी समय...
शहर के एक आलीशान पेंटहाउस में...
वही अधेड़ उम्र का आदमी खिड़की के पास बैठा था।
उसके सामने कई स्क्रीनें जल रही थीं।
एक स्क्रीन पर वही ऑनलाइन Writing App खुली थी।
उसने नया अध्याय पढ़ा।
अंतिम पंक्ति तक पहुँचते ही उसके होंठों पर हल्की मुस्कान आई।
"दिलचस्प..."
उसने अपना फ़ोन उठाया।
एक नंबर मिलाया।
"मैंने उसे ढूँढ़ लिया है।"
दूसरी तरफ कुछ सेकंड तक सन्नाटा रहा।
फिर एक आवाज़ आई—
"क्या वही है?"
आदमी ने स्क्रीन पर लड़की की प्रोफ़ाइल देखते हुए कहा—
"अभी कहना जल्दबाज़ी होगी..."
"लेकिन उसकी कल्पना... बिल्कुल वैसी ही है।"
कॉल कट गई।
उसने एक बार फिर कहानी का शीर्षक देखा।
धीरे से फुसफुसाया—
"लिखते रहो..."
"तुम्हें अभी अंदाज़ा भी नहीं कि तुम्हारे शब्द कितनी दूर तक जाएँगे।"
अगली सुबह।
लड़की ने आदतन ऐप खोला।
उसने आँकड़ों पर नज़र डाली।
वह कुछ सेकंड तक स्क्रीन को देखती रह गई।
Views : 17
उसकी आँखें फैल गईं।
"सत्रह...?"
यह पहली बार था...
जब उसकी कहानी एक ही रात में दस से ज़्यादा लोगों ने पढ़ी थी।
उसने अनजाने में मुस्कुरा दिया।
उसे क्या पता था...
कि यह सिर्फ शुरुआत थी।
और कहीं...
कोई उसकी हर नई कहानी का इंतज़ार कर रहा था।
365 Days Later -
समय...
किसी का इंतज़ार नहीं करता।
लेकिन सपने...
कभी-कभी वर्षों तक एक ही जगह खड़े रह जाते हैं।
एक साल बाद...
Convenience Store.
"Receipt चाहिए?"
"नहीं।"
"Thank you."
अगला ग्राहक।
"Coffee."
"जी।"
अगला।
"Card या Cash?"
उसकी ज़िंदगी अब घड़ी की सुई जैसी हो चुकी थी।
हर दिन...
एक जैसा।
लेकिन एक चीज़ कभी नहीं बदली।
रात के बारह बजे...
वह अब भी अपने छोटे-से कमरे में बैठती।
लैपटॉप खोलती।
और लिखती।
एक अध्याय...
हर रात।
कभी बुखार में।
कभी बिना खाना खाए।
कभी बिजली चली जाती, तो मोबाइल की टॉर्च जलाकर नोटबुक में लिखती।
फिर सुबह टाइप करती।
उसने कभी एक भी दिन जानबूझकर नहीं छोड़ा।
उसकी प्रोफ़ाइल अब पहले जैसी नहीं थी।
Stories : 7
Chapters : 386
Followers...
29
Comments...
कुल मिलाकर...
शायद दो सौ।
कुछ लोग उसकी तारीफ़ करते।
कुछ गलतियाँ बताते।
लेकिन...
सफलता अब भी उससे बहुत दूर थी।
एक रात उसने हिम्मत करके Trending Page खोला।
ऊपर वही बड़े लेखक थे।
लाखों Followers।
करोड़ों Views।
सैकड़ों Fan Arts।
हज़ारों Reviews।
उसने अपनी प्रोफ़ाइल खोली।
कुछ सेकंड तक स्क्रीन देखती रही।
फिर धीरे से लैपटॉप बंद कर दिया।
उसने पहली बार खुद से पूछा—
"क्या मैं सचमुच अच्छी लेखक हूँ?"
कमरे में कोई जवाब नहीं था।
अगले दिन...
Convenience Store में दो कॉलेज छात्र बातें कर रहे थे।
"भाई, वो नई Novel पढ़ी?"
"हाँ! पूरी रात नहीं सोया।"
"उस लेखक जैसा कोई लिख ही नहीं सकता।"
लड़की चुपचाप उनकी बातें सुन रही थी।
उसे उम्मीद थी...
शायद वे उसकी कहानी की बात कर रहे हों।
लेकिन...
वे किसी और लेखक की बात कर रहे थे।
उसने मुस्कुराने की कोशिश की।
पर इस बार...
मुस्कुराहट पूरी नहीं हो सकी।
उस रात उसने डायरी खोली।
पहले पन्ने पर लिखा था—
"One Day... Millions Will Read My Story."
उसने पेन उठाया।
कुछ देर तक उसे देखती रही।
फिर...
उस वाक्य के नीचे एक नई लाइन लिख दी।
"Maybe... I dreamed too much."
खिड़की के बाहर बारिश हो रही थी।
अंदर...
एक सपना पहली बार टूटने की आवाज़ सुन रहा था.