मा भैर्मा GANESH TEWARI 'NESH' (NASH) द्वारा आध्यात्मिक कथा में हिंदी पीडीएफ

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मा भैर्मा

यजुर्वेद सूक्ति (4) की व्याख्या मा भेर्मा संविक्था अऊर्ज धतस्व"यजुर्वेद --6/35 भावार्थ --मत डर। मत घबरा। धैर्य धारण कर। इसका पूरा मंत्र यजुर्वेद 6.35 का मंत्र इस प्रकार है—मा भेर्मा संविक्था ऊर्जं धत्स्व॥(यजुर्वेद 6.35, वाजसनेयी संहिता)शब्दार्थ:मा = मत / नहींभेः = डरमा = मतसंविक्थाः = घबरा, व्याकुल होऊर्जम् = बल, शक्ति, उत्साहधत्स्व = धारण करो, ग्रहण करोभावार्थ:"मत डर, मत घबरा; बल, शक्ति और धैर्य को धारण करो।"या अधिक विस्तृत रूप में:"भयभीत मत हो, व्याकुल मत हो। अपने भीतर शक्ति, साहस, धैर्य और उत्साह को धारण करके दृढ़तापूर्वक आगे बढ़ो।"यह मंत्र मनुष्य को संकट की घड़ी में भय और निराशा छोड़कर आत्मबल, धैर्य और उत्साह के साथ कर्म करने की प्रेरणा देता है।वेदों में प्रमाण--यदि यजुर्वेद 6.35 के भाव—"मत डर, मत घबरा, धैर्य और बल धारण करो"—के समर्थन में वैदिक प्रमाण चाहिए, तो निम्न मंत्र इसी भावना को व्यक्त करते हैं:1-ऋग्वेद 10.191.2संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।भावार्थ: मिलकर चलो, मिलकर विचार करो और एकचित्त होकर कार्य करो। एकता भय को दूर कर साहस प्रदान करती है।अथर्ववेद 19.15.6अभयं मित्रादभयममित्रादभयं ज्ञातादभयं पुरो यः।भावार्थ: हमें मित्र से, शत्रु से, परिचित से और अपरिचित से—सभी ओर से निर्भयता प्राप्त हो।2--ऋग्वेद 1.89.8भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः...भावार्थ: हे देवो! हम शुभ सुनें, शुभ देखें और दृढ़ शरीर एवं उत्साह के साथ जीवन बिताएँ।3--यजुर्वेद 22.22तेजोऽसि तेजो मयि धेहि। वीर्यमसि वीर्यं मयि धेहि। बलमसि बलं मयि धेहि।भावार्थ: हे परमात्मा! मुझे तेज, वीर्य और बल प्रदान करें।4--अथर्ववेद 19.15.1अभयं द्यावापृथिवी इहास्ताम्।भावार्थ: आकाश और पृथ्वी से हमें निर्भयता प्राप्त हो।इन वैदिक मंत्रों का समग्र संदेश है कि भय का त्याग करो, धैर्य और आत्मबल धारण करो, तथा ईश्वर पर विश्वास रखते हुए साहसपूर्वक जीवन जियो।सतहित"मत डर, मत घबरा, धैर्य धारण कर।उषनिषदों में प्रमाण--—यजुर्वेद 6.35 के इस भाव के समर्थन में अनेक उपनिषदों में निर्भयता, आत्मबल और धैर्य का उपदेश मिलता है। प्रमुख प्रमाण:1--कठोपनिषद् 1.3.14उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।भावार्थ: उठो, जागो और श्रेष्ठ आचार्यों को प्राप्त करके ज्ञान प्राप्त करो। जीवन में भय या निराशा से नहीं, साहस और पुरुषार्थ से आगे बढ़ो।2--तैत्तिरीयोपनिषद् 1.11.1सत्यं वद। धर्मं चर।भावार्थ: सत्य बोलो, धर्म का आचरण करो। धर्ममय जीवन ही मनुष्य को आत्मबल और निर्भयता देता है।3--बृहदारण्यकोपनिषद् 1.4.2द्वितीयाद्वै भयं भवति।भावार्थ: द्वैत (दूसरेपन) से ही भय उत्पन्न होता है। आत्मज्ञान से भय समाप्त हो जाता है।4--मुण्डकोपनिषद् 3.2.9ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति।भावार्थ: जो ब्रह्म को जान लेता है, वह ब्रह्मस्वरूप हो जाता है; उसके लिए भय का कोई कारण नहीं रहता।5--ईशोपनिषद् 6–7यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति... तत्र को मोहः कः शोकः एकत्वमनुपश्यतः॥भावार्थ: जो सभी प्राणियों में अपने ही आत्मस्वरूप को देखता है, उसके लिए न मोह रहता है, न शोक और न भय।इन उपनिषदों का सार यही है कि आत्मज्ञान, सत्य, धर्म और ईश्वरबोध से मनुष्य निर्भय, धैर्यवान और स्थिरचित्त बनता है, जो यजुर्वेद 6.35 के भाव का ही विस्तार है।पुराणों में प्रमाण--यदि यजुर्वेद 6.35 — "मा भेर्मा संविक्था ऊर्जं धत्स्व" (मत डर, मत घबरा, शक्ति और धैर्य धारण कर) के भाव के समर्थन में पुराणों से प्रमाण चाहिए, तो निम्न उदाहरण उपयुक्त हैं:1--श्रीमद्भागवत महापुराण (10.14.58)समाश्रिता ये पदपल्लवप्लवं महत्पदं पुण्ययशो मुरारेः।भवाम्बुधिर्वत्सपदं परं पदं पदं पदं यद्विपदां न तेषाम्॥भावार्थ: जो भगवान की शरण ग्रहण करते हैं, उनके लिए संसाररूपी भयावह समुद्र भी बछड़े के खुर के समान छोटा हो जाता है; वे भय से मुक्त हो जाते हैं।2--विष्णु पुराण (1.19.25)नारायणपराः सर्वे न कुतश्चन बिभ्यति।भावार्थ: जो नारायण के आश्रित हैं, वे किसी भी परिस्थिति से भयभीत नहीं होते।3--मार्कण्डेय पुराण (दुर्गा सप्तशती 11.35)सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते।भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते॥भावार्थ: हे समस्त शक्तियों से सम्पन्न देवी! हमें सभी प्रकार के भय से रक्षा कीजिए।4--शिव पुराणशिवभक्तस्य न भयं विद्यते। (भावानुसार)भावार्थ: जो शिव के भक्त हैं, वे भय से मुक्त रहते हैं।इन पुराणों का मुख्य संदेश है कि ईश्वर में विश्वास, भक्ति, धैर्य और आत्मबल से भय दूर होता है, जो यजुर्वेद 6.35 के भाव—"मत डर, मत घबरा, धैर्य और शक्ति धारण कर"—के अनुरूप है।भगवद्गीता में प्रमाण  यजुर्वेद 6.35 — "मा भेर्मा संविक्था ऊर्जं धत्स्व" (मत डर, मत घबरा, धैर्य और शक्ति धारण कर) के भाव के समर्थन में श्रीमद्भगवद्गीता के अनेक श्लोक हैं:1. भगवद्गीता 2.3क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप॥भावार्थ:हे अर्जुन! कायरता को प्राप्त मत हो। यह तुम्हारे योग्य नहीं है। हृदय की दुर्बलता त्यागकर साहस के साथ खड़े हो जाओ।2. भगवद्गीता 2.38सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि॥भावार्थ:सुख-दुःख, लाभ-हानि और जय-पराजय में समभाव रखकर अपने कर्तव्य का पालन करो।3. भगवद्गीता 4.42तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः।छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत॥भावार्थ:अज्ञान से उत्पन्न संशय को ज्ञानरूपी तलवार से काटकर योग में स्थित हो और साहसपूर्वक उठ खड़े हो।4. भगवद्गीता 16.1अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः..भावार्थ:निर्भयता (अभय) दैवी सम्पत्ति का प्रथम लक्षण है।5. भगवद्गीता 18.66सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥भावार्थ:सब प्रकार के भय और चिंता छोड़कर मेरी शरण में आओ; मैं तुम्हें मुक्त कर दूँगा—शोक मत करो।निष्कर्षइन श्लोकों का संदेश यजुर्वेद 6.35 के भाव से पूर्णतः मेल खाता है—मत डर। मत घबरा।धैर्य और आत्मबल धारण करो।कर्तव्य का पालन करते हुए ईश्वर पर विश्वास रखो.महाभारत में ष्रमाण--यजुर्वेद 6.35 — "मा भेर्मा संविक्था ऊर्जं धत्स्व" (मत डर, मत घबरा, शक्ति और धैर्य धारण कर) के भाव के समर्थन में महाभारत के कुछ प्रमुख प्रमाण हैं:1. महाभारत, उद्योगपर्व (33.67)न भयं विद्यते वीरस्य कदाचिदिति निश्चयः।भावार्थ: वीर पुरुष के लिए भय का स्थान नहीं होता; वह साहसपूर्वक अपने कर्तव्य का पालन करता है।2. महाभारत, वनपर्व (313.117)धैर्यं सर्वत्र साधनम्।भावार्थ: प्रत्येक कार्य की सफलता का मुख्य साधन धैर्य है।3. महाभारत, शान्तिपर्व (12.153.8)धैर्येण हि मनुष्याणां कार्यसिद्धिर्न संशयः।भावार्थ: निःसंदेह मनुष्य के कार्य धैर्य से ही सिद्ध होते हैं।4. महाभारत, भीष्मपर्व (भगवद्गीता 2.3)क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप॥भावार्थ: हे अर्जुन! कायर मत बनो। हृदय की दुर्बलता त्यागकर साहसपूर्वक खड़े हो जाओ।निष्कर्ष--महाभारत का संदेश भी यजुर्वेद 6.35 के समान है—भय मत करो। घबराओ मत।धैर्य और आत्मबल धारण करो।साहसपूर्वक अपने धर्म और कर्तव्य का पालन करो।टिप्पणी: ऊपर दिए गए भगवद्गीता का श्लोक महाभारत के भीष्मपर्व का ही अंग है।स्मृतियों में प्रमाण--यजुर्वेद 6.35 — "मा भेर्मा संविक्था ऊर्जं धत्स्व" (मत डर, मत घबरा, धैर्य और शक्ति धारण कर) के भाव के समर्थन में स्मृतियों से कुछ प्रमाण:1. मनुस्मृति 7.213नात्मानमवमन्येत पूर्वाभिरसमृद्धिभिः।अमृत्योः श्रियमन्विच्छेन्नैनां मन्येत दुर्लभाम्॥भावार्थ:मनुष्य को पूर्व की असफलताओं से निराश या भयभीत नहीं होना चाहिए। मृत्यु तक पुरुषार्थ करते हुए सफलता का प्रयास करना चाहिए।2. मनुस्मृति 4.137न भीतः कस्यचिद्भवेत् न च कञ्चन बिभेषयेत्।भावार्थ:न स्वयं किसी से भयभीत हो और न किसी को भयभीत करे।3. याज्ञवल्क्य स्मृति 1.122धृतिः क्षमा दमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥भावार्थ:धृति (धैर्य), क्षमा, आत्मसंयम, शौच, इन्द्रियनिग्रह, बुद्धि, विद्या, सत्य और अक्रोध—ये धर्म के लक्षण हैं। यहाँ धृति (धैर्य) को धर्म का प्रमुख गुण बताया गया है।4. पराशर स्मृति 2.1धैर्यं सर्वार्थसाधनम्।भावार्थ:धैर्य सभी उद्देश्यों की सिद्धि का साधन है।निष्कर्ष--स्मृतियों का संदेश भी यही है—भय मत करो।दूसरों को भय मत दो।धैर्य, आत्मबल और पुरुषार्थ धारण करो।नीति ग्रन्थों में प्रमाण--यजुर्वेद 6.35 — "मा भेर्मा संविक्था ऊर्जं धत्स्व" (मत डर, मत घबरा, धैर्य धारण कर) के भाव के समर्थन में नीति-ग्रन्थों के प्रमाण:1. हितोपदेशउद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥भावार्थ:कार्य केवल पुरुषार्थ और साहस से सिद्ध होते हैं, केवल कल्पना या भय से नहीं। सोए हुए सिंह के मुख में मृग स्वयं नहीं आते।2. पञ्चतन्त्रत्याज्यं न धैर्यं विधुरेऽपि काले।भावार्थ:विपत्ति के समय भी धैर्य का त्याग नहीं करना चाहिए।3. चाणक्य नीतितावद्भयेषु भेतव्यं यावद्भयमनागतम्।आगतं तु भयं दृष्ट्वा प्रहर्तव्यमशङ्कया॥भावार्थ:भय आने से पहले सावधान रहो; पर जब भय सामने आ जाए, तब बिना घबराए साहसपूर्वक उसका सामना करो।4. भर्तृहरि नीतिशतकप्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः।प्रारभ्य विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः।विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाः।प्रारब्धमुत्तमजनाः न परित्यजन्ति॥भावार्थ:नीच लोग विघ्न के भय से कार्य आरम्भ ही नहीं करते; साधारण लोग विघ्न आने पर छोड़ देते हैं; किन्तु श्रेष्ठ पुरुष बार-बार बाधाएँ आने पर भी धैर्यपूर्वक कार्य नहीं छोड़ते।निष्कर्षइन नीति-ग्रन्थों का संदेश यजुर्वेद 6.35 के भाव से पूर्णतः मेल खाता है—भय से विचलित मत हो। विपत्ति में धैर्य बनाए रखो। साहस और पुरुषार्थ से कठिनाइयों का सामना करो.वाल्मीकि और अध्यात्म रामायण में प्रमाण-- यजुर्वेद 6.35 — "मा भेर्मा संविक्था ऊर्जं धत्स्व" (मत डर, मत घबरा, धैर्य और शक्ति धारण कर) के भाव के समर्थन में वाल्मीकि रामायण और अध्यात्म रामायण से प्रमाण:1. वाल्मीकि रामायण(क) युद्धकाण्डन हि धैर्यसमं बलम्।भावार्थ:धैर्य के समान कोई बल नहीं है।(ख) युद्धकाण्डजब भगवान श्रीराम युद्ध में वानरों का उत्साह बढ़ाते हैं, तब उनका उपदेश का सार है कि भय मत करो, धैर्य रखो और पराक्रम करो।भावार्थ:संकट में धैर्य और साहस ही विजय का मार्ग है।2. अध्यात्म रामायणयुद्धकाण्डमा भैष्ट भद्रं वः सर्वे मयि तिष्ठति राघवे।भावार्थ:भय मत करो। जब तक श्रीराम साथ हैं, तब तक सबका कल्याण है।अरण्यकाण्डअध्यात्म रामायण में श्रीराम बार-बार यह शिक्षा देते हैं कि आत्मज्ञान और ईश्वर-शरणागति से भय समाप्त हो जाता है।भावार्थ:जो भगवान की शरण में रहता है, वह किसी भी परिस्थिति में भयभीत नहीं होता।निष्कर्षवाल्मीकि रामायण और अध्यात्म रामायण दोनों का संदेश यजुर्वेद 6.35 के अनुरूप है—भय मत करो। घबराओ मत।धैर्य और पराक्रम धारण करो।ईश्वर में विश्वास रखकर कर्तव्य का पालन करो।योग वाशिष्ठ में प्रमाण--यजुर्वेद 6.35 — "मा भेर्मा संविक्था ऊर्जं धत्स्व" (मत डर, मत घबरा, धैर्य और शक्ति धारण कर) का भाव योगवासिष्ठ में भी मिलता है। योगवासिष्ठ में यह शिक्षा मुख्य रूप से श्रीराम के विषाद को दूर करके उन्हें धैर्य, आत्मज्ञान और पुरुषार्थ की ओर प्रेरित करने के रूप में आती है।1. योगवासिष्ठ — वैराग्य प्रकरण (श्रीराम का विषाद और धैर्य का उपदेश)नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः।भावार्थ:निर्बल मनुष्य आत्मतत्त्व को प्राप्त नहीं कर सकता; आत्मज्ञान और उच्च जीवन के लिए आंतरिक बल आवश्यक है।2. योगवासिष्ठ का मुख्य उपदेशयथा भावयति चित्तं तथा भवति मानवः।भावार्थ:मनुष्य जैसा अपने चित्त में विचार करता है, वैसा ही उसका जीवन और अनुभव बनता है।संदेश:भय और निराशा को छोड़कर मन में धैर्य, विवेक और आत्मबल धारण करना चाहिए।3. योगवासिष्ठ — पुरुषार्थ का सिद्धान्तपौरुषेण प्रयत्नेन सर्वं सम्पद्यते नृणाम्।भावार्थ:मनुष्य के पुरुषार्थ और प्रयत्न से ही कार्य सिद्ध होते हैं।संदेश:घबराकर बैठना नहीं, बल्कि साहस और प्रयत्न से परिस्थितियों का सामना करना चाहिए।निष्कर्षयोगवासिष्ठ का संदेश यजुर्वेद 6.35 के भाव से समान है—भय और शोक से ऊपर उठो।मन को दृढ़ बनाओ। आत्मबल और विवेक धारण करो।पुरुषार्थ द्वारा जीवन की कठिनाइयों का सामना करो।इस्लाम धर्म में प्रमाण-यजुर्वेद 6.35 — "मा भेर्मा संविक्था ऊर्जं धत्स्व" (मत डर, मत घबरा, धैर्य और शक्ति धारण कर) — के समान भाव क़ुरआन में अनेक स्थानों पर मिलता है।1. सूरह अल-बक़रह (2:38)قُلْنَا اهْبِطُوا مِنْهَا جَمِيعًا ۖ فَإِمَّا يَأْتِيَنَّكُم مِّنِّي هُدًى فَمَن تَبِعَ هُدَايَ فَلَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَभावार्थ: "जो मेरी हिदायत का अनुसरण करेंगे, उन पर न कोई भय होगा और न वे शोक करेंगे।"2. सूरह आले इमरान (3:139)وَلَا تَهِنُوا وَلَا تَحْزَنُوا وَأَنتُمُ الْأَعْلَوْنَ إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَभावार्थ: "कमज़ोर मत पड़ो, न ही निराश हो; यदि तुम ईमान वाले हो तो तुम ही विजयी रहोगे।"3. सूरह अत-तौबह (9:40)لَا تَحْزَنْ إِنَّ اللَّهَ مَعَنَاभावार्थ: "ग़म न करो, निश्चय ही अल्लाह हमारे साथ है।"4. सूरह फ़ुस्सिलत (41:30)إِنَّ الَّذِينَ قَالُوا رَبُّنَا اللَّهُ ثُمَّ اسْتَقَامُوا تَتَنَزَّلُ عَلَيْهِمُ الْمَلَائِكَةُ أَلَّا تَخَافُوا وَلَا تَحْزَنُواभावार्थ: "जिन लोगों ने कहा कि हमारा पालनहार अल्लाह है और फिर उस पर दृढ़ रहे, उन पर फ़रिश्ते उतरते हैं (और कहते हैं): डरो मत और न शोक करो।"5. सूरह अल-अहक़ाफ़ (46:13)إِنَّ الَّذِينَ قَالُوا رَبُّنَا اللَّهُ ثُمَّ اسْتَقَامُوا فَلَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَभावार्थ: "जिन लोगों ने कहा कि हमारा पालनहार अल्लाह है और फिर उस पर दृढ़ रहे, उनके लिए न कोई भय है और न वे शोक करेंगे।"निष्कर्षक़ुरआन का संदेश भी यजुर्वेद 6.35 के भाव से मेल खाता है—डरो मत। घबराओ मत। दृढ़ रहो।ईश्वर पर भरोसा रखो, तब भय और निराशा दूर होगी.।सूफी सन्तो में प्रमाण--यजुर्वेद --6.35 — "मा भेर्मा संविक्था ऊर्जं धत्स्व" (मत डर, मत घबरा, धैर्य धारण कर) के समान भाव अनेक सूफ़ी संतों की वाणी में मिलता है। नीचे कुछ प्रसिद्ध प्रमाण मूल अरबी/फ़ारसी लिपि सहित दिए जा रहे हैं।1. जलालुद्दीन रूमी (फ़ारसी)چون توکل می‌کنی، ترس نماند؛هر که با حق است، او را غم نماند.भावार्थ:जब तुम ईश्वर पर भरोसा करते हो, तो भय नहीं रहता; जो सत्य (ईश्वर) के साथ है, उसके लिए चिंता नहीं रहती।2. फ़रीदुद्दीन अत्तार (फ़ारसी)دل قوی دار، که با مردانِ حقترس را هرگز نباشد راه.भावार्थ:हृदय को दृढ़ रखो; जो ईश्वर के मार्ग पर चलते हैं, उनके पास भय का प्रवेश नहीं होता।3. शेख अब्दुल क़ादिर जीलानी (अरबी)لَا تَخَفْ غَيْرَ اللَّهِ، وَتَوَكَّلْ عَلَيْهِ.भावार्थ:अल्लाह के सिवा किसी से मत डरो और उसी पर भरोसा रखो।4. इब्न अता अल्लाह अल-इस्कंदरी (अरबी)مَنْ لَازَمَ بَابَ اللَّهِ أَمِنَ مِنَ الْخَوْفِ.भावार्थ:जो ईश्वर के द्वार से जुड़ा रहता है, वह भय से सुरक्षित हो जाता है।निष्कर्षसूफ़ी संतों का संदेश भी यजुर्वेद 6.35 के भाव से मेल खाता है—भय मत करो। घबराओ मत।ईश्वर पर भरोसा रखो। धैर्य और आंतरिक शक्ति बनाए रखो।सिक्ख धर्म में प्रमाण --यजुर्वेद 6.35 — "मा भेर्मा संविक्था ऊर्जं धत्स्व" (मत डर, मत घबरा, धैर्य धारण कर) के समान भाव श्री गुरु ग्रंथ साहिब में अनेक स्थानों पर मिलता है।1. श्री गुरु ग्रंथ साहिब (अंग 293)ਭੈ ਕਾਹੂ ਕਉ ਦੇਤ ਨਹਿ, ਨਹਿ ਭੈ ਮਾਨਤ ਆਨ ॥भावार्थ:न किसी को भय देता है और न किसी से भय मानता है।2. श्री गुरु ग्रंथ साहिब (अंग 1035)ਜਿਸ ਕੇ ਸਿਰ ਊਪਰਿ ਤੂੰ ਸੁਆਮੀ ਸੋ ਦੁਖੁ ਕੈਸਾ ਪਾਵੈ ॥भावार्थ:जिसके सिर पर प्रभु का हाथ है, उसे किसी प्रकार का भय या दुःख नहीं सताता।3. श्री गुरु ग्रंथ साहिब (अंग 11)ਨਿਰਭਉ ਨਿਰਵੈਰੁ ॥भावार्थ:परमात्मा निर्भय है और वैर-रहित है। जो उसकी शरण में आता है, वह भी निर्भयता का मार्ग पाता है।4. श्री गुरु ग्रंथ साहिब (अंग 587)ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਜਪਤ ਹੋਆ ਨਿਰਭਉ ॥भावार्थ:परमात्मा के नाम का स्मरण करने से मनुष्य निर्भय हो जाता है।निष्कर्षसिख धर्म का संदेश भी यजुर्वेद 6.35 के भाव से पूर्णतः मेल खाता है—ਡਰੋ ਨਾ (मत डरो)।ਘਬਰਾਓ ਨਾ (मत घबराओ)।वाहेगुरु पर विश्वास रखो।धैर्य, साहस और निर्भयता के साथ जीवन जियो।ईसाई धर्म में प्रमाण---यजुर्वेद 6.35 — "मा भेर्मा संविक्था ऊर्जं धत्स्व" (मत डर, मत घबरा, धैर्य धारण कर) के समान भाव बाइबिल में अनेक स्थानों पर मिलता है। नीचे मूल अंग्रेज़ी (English) में प्रमुख प्रमाण दिए जा रहे हैं:1. Isaiah 41:10"Fear thou not; for I am with thee: be not dismayed; for I am thy God: I will strengthen thee; yea, I will help thee." (KJV)भावार्थ:मत डरो, मत घबराओ; क्योंकि मैं तुम्हारे साथ हूँ। मैं तुम्हें शक्ति दूँगा और तुम्हारी सहायता करूँगा।2. Joshua 1:9"Be strong and of a good courage; be not afraid, neither be thou dismayed: for the Lord thy God is with thee whithersoever thou goest." (KJV)भावार्थ:दृढ़ और साहसी बनो। मत डरो और निराश मत हो, क्योंकि तुम्हारा प्रभु परमेश्वर जहाँ भी तुम जाओगे, तुम्हारे साथ रहेगा।3. Deuteronomy 31:6"Be strong and of a good courage, fear not, nor be afraid of them: for the Lord thy God, he it is that doth go with thee; he will not fail thee, nor forsake thee." (KJV)भावार्थ:बलवान और साहसी बनो। मत डरो, क्योंकि प्रभु तुम्हारे साथ चलता है; वह तुम्हें न छोड़ेगा और न त्यागेगा।4. Psalm 27:1"The Lord is my light and my salvation; whom shall I fear? The Lord is the strength of my life; of whom shall I be afraid?" (KJV)भावार्थ:प्रभु मेरा प्रकाश और मेरा उद्धार है; फिर मैं किससे डरूँ? प्रभु मेरे जीवन का बल है; मैं किससे भय करूँ?5. John 14:27"Peace I leave with you, my peace I give unto you... Let not your heart be troubled, neither let it be afraid." (KJV)भावार्थ:मैं तुम्हें अपनी शान्ति देता हूँ। तुम्हारा मन व्याकुल न हो और न ही भयभीत हो।निष्कर्षबाइबिल का संदेश भी यजुर्वेद 6.35 के भाव से मेल खाता है—Fear not. (मत डरो।)Be not dismayed. (मत घबराओ।)Be strong and courageous. (बलवान और साहसी बनो।)1Trust in God. (परमेश्वर पर विश्वास रखो)।जैन धर्म में प्रमाण --यजुर्वेद 6.35 — "मा भेर्मा संविक्था ऊर्जं धत्स्व" ~(मत डर, मत घबरा, धैर्य धारण कर) के समान भाव जैन आगम और जैन साहित्य में भी मिलता है। नीचे कुछ प्राकृत (देवनागरी) प्रमाण दिए जा रहे हैं।1. उत्तराध्ययन सूत्रधीरो ण परेसाणं, ण अप्पाणं विहेसए।भावार्थ:धीर पुरुष न दूसरों को कष्ट देता है और न स्वयं भय या व्याकुलता में पड़ता है।2. दशवैकालिक सूत्रधम्मो मंगलमुक्किट्ठं, अहिंसा संजमो तवो।भावार्थ:धर्म ही सर्वोत्तम मंगल है। अहिंसा, संयम और तप से मनुष्य निर्भय और धैर्यवान बनता है।3. आचारांग सूत्रणत्थि धीरस्स दुल्लहं।भावार्थ:धैर्यवान पुरुष के लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं है।4. तत्त्वार्थसूत्र (संस्कृत)सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः॥ (1.1)भावार्थ:सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र ही मोक्ष का मार्ग हैं। इनसे भय और मोह का नाश होता है तथा मनुष्य धैर्य और आत्मबल प्राप्त करता है।निष्कर्षजैन धर्म का संदेश भी यजुर्वेद 6.35 के भाव से सामंजस्य रखता है—भय मत करो।मन को स्थिर रखो।धैर्य, संयम और आत्मबल धारण करो।धर्म के मार्ग पर दृढ़ रहो।महत्वपूर्ण टिप्पणी: जैन आगमों के प्राकृत पाठ विभिन्न परंपराओं (श्वेताम्बर/दिगम्बर) में पाठभेद सहित मिलते हैबौद्ध धर्म में प्रमाण--यजुर्वेद 6.35 — "मा भेर्मा संविक्था ऊर्जं धत्स्व" (मत डर, मत घबरा, धैर्य धारण कर) के समान भाव पाली त्रिपिटक में भी मिलता है। नीचे मूल पाली (देवनागरी) के साथ प्रमाण दिए जा रहे हैं।1. धम्मपद (धम्मपद 160)अत्ता हि अत्तनो नाथो, को हि नाथो परो सिया।अत्तना हि सुदन्तेन, नाथं लभति दुल्लभं॥भावार्थ:मनुष्य स्वयं अपना आश्रय है। जो अपने मन को संयमित करता है, वह दुर्लभ आश्रय प्राप्त करता है। इससे आत्मबल और निर्भयता उत्पन्न होती है।2. धम्मपद (धम्मपद 81)सेलो यथा एकघनो, वातेन न समीरति।एवं निन्दापसंसासु, न समिञ्जन्ति पण्डिता॥भावार्थ:जैसे ठोस पर्वत वायु से नहीं हिलता, वैसे ही ज्ञानी पुरुष निन्दा और प्रशंसा से विचलित नहीं होता।3. धम्मपद (धम्मपद 25)उट्ठानेनप्पमादेन, संयमेन दमेन च।दीपं कयिराथ मेधावी, यं ओघो नाभिकीरे॥भावार्थ:उद्योग, अप्रमाद, संयम और आत्मनिग्रह से बुद्धिमान ऐसा आधार बनाता है जिसे कोई संकट डिगा नहीं सकता।4. संयुक्त निकायवीरियेन दुःखमच्चेति।भावार्थ:पुरुषार्थ (वीर्य, उत्साह) से मनुष्य दुःख पर विजय प्राप्त करता है।निष्कर्षपाली बौद्ध ग्रंथों का संदेश भी यजुर्वेद 6.35 के भाव से मेल खाता है—भय से विचलित मत हो।मन को स्थिर रखो।उद्योग, धैर्य और संयम धारण करो।आत्मबल से कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करो।यहूदी धर्म में प्रमाण--यजुर्वेद 6.35 — "मा भेर्मा संविक्था ऊर्जं धत्स्व" (मत डर, मत घबरा, धैर्य धारण कर) के समान भाव यहूदी धर्म (तनाख / Hebrew Bible) में अनेक स्थानों पर मिलता है। नीचे मूल हिब्रू के साथ प्रमुख प्रमाण दिए जा रहे हैं।1. Deuteronomy 31:6חִזְקוּ וְאִמְצוּ אַל־תִּירְאוּ וְאַל־תַּעַרְצוּ מִפְּנֵיהֶם כִּי יְהוָה אֱלֹהֶיךָ הוּא הַהֹלֵךְ עִמָּךְ לֹא יַרְפְּךָ וְלֹא יַעַזְבֶךָ׃भावार्थ:दृढ़ और साहसी बनो। मत डरो और मत घबराओ, क्योंकि तुम्हारा परमेश्वर तुम्हारे साथ चलता है; वह तुम्हें न छोड़ेगा और न त्यागेगा।2. Joshua 1:9הֲלוֹא צִוִּיתִיךָ חֲזַק וֶאֱמָץ אַל־תַּעֲרֹץ וְאַל־תֵּחָת כִּי עִמְּךָ יְהוָה אֱלֹהֶיךָ בְּכֹל אֲשֶׁר תֵּלֵךְ׃भावार्थ:क्या मैंने तुझे आज्ञा नहीं दी? दृढ़ और साहसी बन। मत डर और निराश मत हो, क्योंकि जहाँ भी तू जाएगा, वहाँ तेरा परमेश्वर तेरे साथ रहेगा।3. Isaiah 41:10אַל־תִּירָא כִּי עִמְּךָ־אָנִי אַל־תִּשְׁתָּע כִּי־אֲנִי אֱלֹהֶיךָ אִמַּצְתִּיךָ אַף־עֲזַרְתִּיךָ אַף־תְּמַכְתִּיךָ בִּימִין צִדְקִי׃भावार्थ:मत डर, क्योंकि मैं तेरे साथ हूँ; घबरा मत, क्योंकि मैं तेरा परमेश्वर हूँ। मैं तुझे दृढ़ करूँगा, तेरी सहायता करूँगा और अपने धर्ममय दाहिने हाथ से तुझे संभालूँगा।4. Psalms 27:1יְהוָה אוֹרִי וְיִשְׁעִי מִמִּי אִירָא יְהוָה מָעוֹז־חַיַּי מִמִּי אֶפְחָד׃भावार्थ:यहोवा मेरा प्रकाश और उद्धार है; मैं किससे डरूँ? यहोवा मेरे जीवन का बल है; मैं किससे भय करूँ?निष्कर्षयहूदी धर्म के पवित्र ग्रंथों का संदेश भी यजुर्वेद 6.35 के भाव से मेल खाता है—मत डरो। मत घबराओ। दृढ़ और साहसी बनो।परमेश्वर पर विश्वास रखो।पारसी धर्म में प्रमाण--यजुर्वेद 6.35 — "मा भेर्मा संविक्था ऊर्जं धत्स्व" (मत डर, मत घबरा, धैर्य धारण कर) के समान भाव पारसी (जरथुष्ट्र) धर्म के अवेस्ता में भी मिलता है। ध्यान रहे कि अवेस्ता में "मत डरो" जैसी वही शब्दावली बहुत कम मिलती है; वहाँ मुख्य बल साहस, दृढ़ता, अच्छे मन (Vohu Manah) और अहुरा मज़्दा पर विश्वास पर है। नीचे प्रामाणिक अवेस्ताई उद्धरण दिए जा रहे हैं।1. यश्ना 30.2𐬯𐬭𐬀𐬊𐬙𐬀 𐬀𐬨𐬆𐬱𐬀 𐬯𐬭𐬊𐬌𐬌𐬀𐬌𐬀 𐬎𐬯𐬌𐬀𐬙𐬁(Yasna 30.2 – आरम्भिक अंश)भावार्थ:"सत्य को सुनो, उत्तम बुद्धि से विचार करो, और दृढ़ निश्चय के साथ अपना मार्ग चुनो।" यह भय या भ्रम में न पड़कर विवेक और धैर्य से निर्णय लेने की शिक्षा देता है।2. यश्ना 43.1𐬀𐬙 𐬙𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬀𐬵𐬎𐬭𐬀 ...(Yasna 43.1 – आरम्भ)भावार्थ:"हे अहुरा मज़्दा! अपनी शक्ति और शुभ मन के द्वारा मेरी रक्षा और मार्गदर्शन करो।" इसका भाव है कि ईश्वर के आश्रय से भय दूर होता है।3. यश्ना 43.14𐬀𐬴𐬎𐬭𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 ... 𐬎𐬯𐬙𐬀𐬥𐬀(Yasna 43.14 – अंश)भावार्थ:"हे अहुरा मज़्दा! मुझे सत्य के मार्ग पर दृढ़ता और शक्ति प्रदान करें।"4. यश्ना 34.2𐬀𐬴𐬎𐬭𐬁 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 ... 𐬀𐬴𐬌𐬨𐬀(Yasna 34.2 – अंश)भावार्थ:"अहुरा मज़्दा धर्ममार्ग पर चलने वालों को शक्ति और कल्याण प्रदान करते हैं।"निष्कर्षअवेस्ता का संदेश भी यजुर्वेद 6.35 के भाव के अनुरूप है—भय के स्थान पर शुभ बुद्धि अपनाओ। धैर्य और दृढ़ता से सत्य का मार्ग चुनो। अहुरा मज़्दा पर विश्वास रखो। दैवी शक्ति से साहस औआत्मबल प्राप्त करो।महत्वपूर्ण टिप्पणी: अवेस्ता में "मत डरो" के शब्दशः वाक्य बहुत दुर्लभ हैं। इसलिए ऊपर दिए गए संदर्भ समान भाव (धैर्य, दृढ़ता, ईश्वर पर भरोसा) को व्यक्त करते हैं, न कि यजुर्वेद 6.35 का शब्दशः अनुवाद। ताओ धर्म में प्रमाण--यजुर्वेद 6.35 — "मा भेर्मा संविक्था ऊर्जं धत्स्व" (मत डर, मत घबरा, धैर्य धारण कर) के समान भाव ताओ (Dao) धर्म के प्रमुख ग्रंथ ताओ ते चिंग (道德經) में मिलता है। यद्यपि "मत डरो" जैसा शब्दशः वाक्य नहीं है, परन्तु निर्भयता, धैर्य, आंतरिक शक्ति और स्थिरता का उपदेश स्पष्ट रूप से मिलता है।1. Tao Te Ching, अध्याय 33知人者智,自知者明;勝人者有力,自勝者強。भावार्थ:जो दूसरों को जानता है वह बुद्धिमान है; जो स्वयं को जानता है वह प्रबुद्ध है। जो दूसरों पर विजय पाता है वह बलवान है, पर जो स्वयं पर विजय पाता है वही वास्तव में शक्तिशाली है। यह आत्मबल और धैर्य का संदेश देता है।2. ताओ ते चिंग, अध्याय 64合抱之木,生於毫末;九層之臺,起於累土;千里之行,始於足下。भावार्थ:विशाल वृक्ष छोटे अंकुर से उगता है, नौ-मंज़िला मीनार मिट्टी के ढेर से बनती है, और हज़ार मील की यात्रा एक कदम से शुरू होती है।कठिनाई से घबराने के बजाय धैर्यपूर्वक आगे बढ़ने की शिक्षा।3. ताओ ते चिंग, अध्याय 67我有三寶,持而保之:一曰慈,二曰儉,三曰不敢為天下先。慈故能勇。भावार्थ:मेरे तीन रत्न हैं—करुणा, सादगी और विनम्रता। करुणा से ही सच्चा साहस उत्पन्न होता है। साहस और निर्भयता का स्रोत आंतरिक सद्गुण हैं।4. ताओ ते चिंग, अध्याय 76人之生也柔弱,其死也堅強。भावार्थ:जीवित अवस्था में मनुष्य कोमल और लचीला होता है; कठोरता मृत्यु का लक्षण है।संकट में घबराने के बजाय धैर्य, लचीलापन और संतुलन बनाए रखने का उपदेश।निष्कर्षताओ धर्म का संदेश भी यजुर्वेद 6.35 के भाव से सामंजस्य रखता है—भय से विचलित मत हो आत्मबल विकसित करो। धैर्य और संतुलन बनाए रखो।शांतचित्त होकर निरंतर आगे बढ़ो।कन्फ्यूसियंस धर्म में प्रमाण --यजुर्वेद 6.35 — "मा भेर्मा संविक्था ऊर्जं धत्स्व" (मत डर, मत घबरा, धैर्य और शक्ति धारण कर) के समान भाव कन्फ्यूशियस (Confucius) परंपरा के ग्रंथों में भी मिलता है। कन्फ्यूशियस दर्शन में मुख्य रूप से साहस (勇 yǒng), धैर्य (毅 yì), आत्म-संयम और नैतिक दृढ़ता पर बल दिया गया है।1. Analects (Lunyu) 9.29चीनी मूल:知者不惑,仁者不憂,勇者不懼。उच्चारण (Pinyin):Zhī zhě bù huò, rén zhě bù yōu, yǒng zhě bù jù.भावार्थ:ज्ञानी भ्रमित नहीं होता, करुणाशील व्यक्ति चिंतित नहीं होता, और साहसी व्यक्ति भयभीत नहीं होता।2. Analects 14.24चीनी मूल:君子道者三,我無能焉:仁者不憂,知者不惑,勇者不懼。भावार्थ:श्रेष्ठ पुरुष के तीन गुण हैं—वह चिंता से मुक्त रहता है, भ्रम से मुक्त रहता है और भय से मुक्त रहता है।3. Analects 8.7चीनी मूल:士不可以不弘毅,任重而道遠。उच्चारण:Shì bù kě yǐ bù hóng yì, rèn zhòng ér dào yuǎn.भावार्थ:श्रेष्ठ मनुष्य को व्यापक मन और दृढ़ संकल्प वाला होना चाहिए, क्योंकि उसका उत्तरदायित्व बड़ा और मार्ग लंबा है।4. Analects 12.1चीनी मूल:克己復禮為仁。भावार्थ:अपने ऊपर नियंत्रण रखकर नैतिक मार्ग पर चलना ही सच्ची मानवता है।निष्कर्षकन्फ्यूशियस परंपरा का संदेश यजुर्वेद 6.35 के भाव से मिलता है—भय से मुक्त रहो। मन को स्थिर और संयमित रखो। दृढ़ संकल्प धारण करो। नैतिक साहस के साथ जीवन जियो।यहाँ समानता भाव (निर्भयता और धैर्य) की है; दोनों परंपराएँ अपने-अपने दार्शनिक संदर्भ में इसे प्रस्तुत करती हैं।शिन्तो धर्म में प्रमाण --यजुर्वेद 6.35 — "मा भेर्मा संविक्था ऊर्जं धत्स्व" (मत डर, मत घबरा, धैर्य और शक्ति धारण कर) के समान भाव शिन्तो (神道, Shintō) परंपरा में भी मिलता है। शिन्तो में मुख्य बल कामी (神) पर विश्वास, शुद्ध हृदय, साहस और विपत्ति में स्थिर रहने पर है।शिन्तो के प्रमुख ग्रंथ कोजिकी (古事記) और निहोन शोकी (日本書紀) में निर्भयता और दैवी सहायता का भाव मिलता है।1. 古事記 (Kojiki) — 天岩戸 (अमातेरासु और अमे-नो-इवातो कथा)जापानी मूल:恐(かしこ)みて、神々(かみがみ)相議(あいはか)りて、天安河原(あめのやすかわら)に集(つど)ひ給(たま)ひき。भावार्थ:देवताओं ने भय में डूबने के बजाय विचार किया, एकत्र हुए और उपाय खोजा।संदेश:संकट के समय घबराना नहीं, बुद्धि और सामूहिक प्रयास से समाधान करना चाहिए।2. 古事記 (Kojiki) — अमातेरासु (天照大神) की शिक्षा का भावजापानी मूल:吾(われ)は高天原(たかまがはら)を治(し)らす神(かみ)なり。भावार्थ:"मैं उच्च स्वर्गीय लोक की अधिष्ठात्री शक्ति हूँ।"संदेश:दैवी शक्ति में विश्वास मनुष्य को आत्मबल प्रदान करता है।3. शिन्तो परंपरा का प्रसिद्ध प्रार्थना भाव (祝詞 Norito)जापानी मूल:恐(かしこ)み恐(かしこ)みも白(もう)す。भावार्थ:"अत्यंत श्रद्धा और विनम्रता के साथ हम प्रार्थना करते हैं।"संदेश:कामी के प्रति श्रद्धा से मन में स्थिरता और विश्वास उत्पन्न होता है।निष्कर्षशिन्तो धर्म का संदेश भी यजुर्वेद 6.35 के भाव से जुड़ता है—भय से विचलित मत हो।कठिन समय में धैर्य रखो।दैवी शक्ति (神 kami) पर विश्वास रखो। शुद्ध मन और साहस के साथ आगे बढ़ो।नोट: शिन्तो ग्रंथों में "मत डरो" का वैदिक वाक्य जैसा सीधा आदेश कम मिलता है; वहाँ यह भाव कामी की कृपा, शुद्धता और संकट में साहस के रूप में व्यक्त होता है।यूनानी दर्शन में प्रमाण--यजुर्वेद 6.35 — "मा भेर्मा संविक्था ऊर्जं धत्स्व" (मत डर, मत घबरा, धैर्य और शक्ति धारण कर) के समान भाव यूनानी (Greek) दर्शन में भी मिलता है। यूनानी दर्शन में इसे मुख्यतः साहस (ἀνδρεία — Andreia), आत्मसंयम (σωφροσύνη — Sophrosyne) और धैर्य (καρτερία — Karteria) के रूप में समझाया गया है।1. प्लेटो — Republic (Πολιτεία) 4.429यूनानी मूल:ἡ δὲ ἀνδρεία δὴ τοῦτο ἦν, ὥς γε ἐγὼ ὑπελάμβανον, σωτηρία τις τῆς περὶ τὰ δεινὰ δόξης...भावार्थ:साहस वह शक्ति है जिसके द्वारा मनुष्य भयावह परिस्थितियों में भी सही समझ और दृढ़ विचार को बनाए रखता है।2. अरस्तू — Nicomachean Ethics (Ἠθικὰ Νικομάχεια) 3.6यूनानी मूल:ὁ δὲ ἀνδρεῖος περὶ τὰ φοβερά ἐστιν καὶ θάρρος ἔχει.भावार्थ:वीर पुरुष भय उत्पन्न करने वाली परिस्थितियों में भी स्थिर रहता है और साहस रखता है।3. एपिक्टेटस — Enchiridion 5यूनानी मूल:οὐ τὰ πράγματα τοὺς ἀνθρώπους ταράσσει, ἀλλὰ τὰ περὶ τῶν πραγμάτων δόγματα.भावार्थ:मनुष्य को वस्तुएँ परेशान नहीं करतीं, बल्कि उनके बारे में उसके विचार परेशान करते हैं।➡️ संदेश: घबराहट का कारण बाहरी परिस्थिति नहीं, बल्कि मन की प्रतिक्रिया है।4. सेनेका (यूनानी-रोमन स्टोइक परंपरा)लैटिन मूल:Non est ad astra mollis e terris via.भावार्थ:ऊँची उपलब्धियों तक पहुँचने का मार्ग सरल नहीं होता; धैर्य और साहस आवश्यक हैं।निष्कर्षयूनानी दर्शन का संदेश भी यजुर्वेद 6.35 के भाव से मिलता है—भय के सामने स्थिर रहो।मन को नियंत्रित करो।साहस और धैर्य धारण करो।विवेक के साथ कठिन परिस्थितियों का सामना करो।यूनानी दर्शन में यह भाव "ἀνδρεία (साहस)" और "καρτερία (धैर्य)" के रूप में व्यक्त होता है।------×--------×-------×--------