*इल्म का नूर - क़ुरान और इल्म की फ़ज़ीलत*
*अस्सलामु अलैकुम,*
आज हम बात करेंगे *इल्म की अहमियत*, *क़ुरान की फ़ज़ीलत* और दिलों को *नूर* से भरने वाली कुछ *दुआओं* के बारे में।
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*अध्याय 1: इल्म की 6 अहम दुआएं*
नहमदुहू व नुसल्ली अला रसूलिहिल करीम
अम्मा बाअद फ़ा अऊज़ुबिल्लाहि मिन अश-शैतानी अर-रजीम
*बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम।*
1. *रब्बिश रहली सदरी व यस्सिरली अमरी वहलुल उक्दतम मिन लिसानी यफ़क़हू क़वली।*
"ए मेरे रब! मेरा सीना खोल दे, मेरा काम आसान कर दे, और मेरी ज़ुबान की गिरह खोल दे ताकि लोग मेरी बात समझें।"
2. *रब्बी ज़िदनी इल्मा।*
"ए मेरे रब! मेरे *इल्म में इज़ाफ़ा* फ़रमा।"
3. *अल्लाहुम्मा फ़क़्किहनी फ़िद-दीन।*
"ए अल्लाह, मुझे *दीन की समझ* अता फ़रमा।"
4. *अल्लाहुम्मा इन्नी असअलुका इल्मन नाफ़िअन व रिज़क़न तय्यिबन व अमलन मुतक़ब्बलन।*
"ए अल्लाह, मैं तुझसे *नफ़ा देने वाला इल्म*, *पाक रिज़्क़* और *क़बूल होने वाले अमल* का सवाल करता हूँ।"
5. *अल्लाहुम्मा अल्लिमना मा यनफ़ाउना व अनफ़अना बिमा अल्लमतना व ज़िदना इल्मा।*
"ए अल्लाह, हमें वो सिखा जो हमें फ़ायदा दे, और जो तूने सिखाया उससे हमें फ़ायदा दे, और हमारे *इल्म में इज़ाफ़ा* फ़रमा।"
*आमीन या रब्बुल आलमीन*
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*अध्याय 2: हम इल्म क्यों हासिल करें?*
हम ये क्यों सीखते हैं? हमारा *मक़सद* क्या है?
क्योंकि इंसान वही काम मेहनत से करता है जिसमें उसे *फ़ायदा* नज़र आता है।
*याद रखिए:* *क़ुरान एक बहुत बड़ी नेमत है।* और ये एक ऐसा *समंदर* है जिसका कोई किनारा नहीं।
इसमें जितना भी ग़ौर-ओ-फ़िक्र करो, पढ़ते रहो, कभी भी ये दावा नहीं कर सकते कि "मैंने इसका हक़ अदा कर दिया।"
दुनिया के उलूम जैसे Science, Maths में PhD करके लगता है मुकम्मल कर लिया।
मगर *क़ुरान का इल्म* ऐसा नहीं। क़ुरान का जो *तालिब-ए-इल्म* है, वो मरते दम तक तालिब-ए-इल्म ही रहता है।
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*अध्याय 3: क़ुरान की अहमियत*
*क़ुरान क्या है? क़ुरान की क्या अहमियत है?*
इस क़ुरान की सबसे बड़ी अहमियत ये है कि *ये अल्लाह का कलाम है।*
*ये मेरे रब का कलाम है।*
ये उसी को महसूस हो सकता है जिसके दिल में *अल्लाह तआला की मोहब्बत* बेपनाह हो।
*उदाहरण:* अगर कोई आपसे French में बात करे और आपको French न आती हो, तो क्या फ़ायदा उठा पाओगे?
आज हमारा रवैया क़ुरान के साथ भी ऐसा ही है।
हम *क़ुरान-ए-पाक* बहुत पढ़ते हैं, रमज़ान में कई दफ़ा ख़त्म करते हैं।
लेकिन हमें समझ नहीं आ रहा होता क्योंकि हमने *समझने की कोशिश* ही नहीं की।
जब हम *समझ कर* पढ़ेंगे तो एक नई दुनिया खुल जाएगी।
क्योंकि ये उस *हस्ती का कलाम* है जिसके आगे ज़मीन-ओ-आसमान बिछे हुए हैं।
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*अध्याय 4: इल्म की फ़ज़ीलत और नूर*
अल्लाह तआला ने क़ुरान-पाक में फ़रमाया:
*"क़ुल हल यस्तविल लज़ीना यअलमूना वल लज़ीना ला यअलमून"*
"ए नबी! क्या बराबर हो सकते हैं वो जो *इल्म वाले* हैं और वो जो *इल्म वाले नहीं* हैं?"
*इल्म* ही इंसान को *शऊर* देता है, *अमल* के लिए दौड़ाता है।
इल्म आ जाए तो उसको *रब की पहचान* होती है।
क़ुरान से अंधा होने वाला ऐसा है जैसे उसके आगे सिर्फ़ *अंधेरा* है।
इसी वजह से *क़यामत* के दिन अल्लाह ऐसे लोगों को अंधा उठाएगा।
*इल्म नूर है* और ये *अंधेरों को दूर* करने वाला है।
जब अल्लाह ने *आदम अलैहिस्सलाम* को पैदा किया तो सबसे पहले उनको *इल्म* दिया था।
इसी इल्म की वजह से वो *फ़रिश्तों* से भी ज़्यादा फ़ज़ीलत वाले हुए।
आप *सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम* को भी अल्लाह ने दुआ सिखाई: *"रब्बी ज़िदनी इल्मा"*
जब नबी को भी इल्म में इज़ाफ़ा मांगने का हुक्म है, तो हम सब पर कितना लाज़िम है।
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*आपको ये Part कैसा लगा? Comment में "सुब्हानअल्लाह" लिखिए।*
*Part 2* में हम जानेंगे *क़ुरान के फ़ायदे*, *क़ब्र का हाल* और *क़यामत में सिफ़ारिश*।