चेतन और अवचेतन मन Kapil Tiwari द्वारा आध्यात्मिक कथा में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

चेतन और अवचेतन मन

सिगमंड फ्रायड के अनुसार मनुष्य का मन एक नहीं होता, बल्कि यह अलग-अलग स्तरों पर काम करता है। उन्होंने मन को तीन हिस्सों में समझाया—इदं, अहम् और पराअहम्। इन तीनों के बीच का संबंध ही हमारे सोचने, बोलने और व्यवहार करने के तरीक़े को तय करता है। इदं (Id )मनुष्य के जन्म के साथ ही सक्रिय हो जाता है। इसमें वे सारी इच्छाएँ होती हैं जो तात्कालिक सुख चाहती हैं। भूख लगे और तुरंत खाना चाहे, गुस्सा आए और उसी क्षण निकल पड़े, किसी चीज़ को देखकर लालसा जाग जाए—ये सब इदं की गतिविधियाँ हैं। इदं न सही-गलत जानता है, न समाज, न मर्यादा। यह केवल चाहना जानता है। हालाँकि इदं जन्मजात होता है, लेकिन परिवार, समाज और वातावरण इसकी दिशा तय करने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। हमारी कई दैनिक आदतें और प्रतिक्रियाएँ इसी स्तर से निकलती हैं।

अहम् (ego) खुद के और बाहरी दुनिया के बीच संतुलन बनाने का काम करता है। जब हम सोचते हैं कि किसी इच्छा को पूरा करना अभी ठीक है या नहीं, जब हम परिस्थिति को देखकर निर्णय लेते हैं, तब अहम् सक्रिय होता है। यह पूरी तरह इच्छाओं को नहीं दबाता, बल्कि उन्हें यथार्थ के अनुसार ढालता है। इसमें बुद्धि होती है, लेकिन वह अधिकतर बाहरी ज्ञान पर आधारित होती है। अहम् हमें समाज में जीने योग्य बनाता है, पर यह इच्छाओं का शोधन नहीं करता, केवल उन्हें नियंत्रित करता है।

पराअहम् (super ego) धीरे-धीरे विकसित होता है और यही वह स्तर है जहाँ नैतिकता, आत्मबोध और विवेक का जन्म होता है। यहाँ व्यक्ति केवल यह नहीं सोचता कि उसे क्या चाहिए, बल्कि यह भी समझने लगता है कि क्या उचित है। इस स्तर पर इच्छाओं पर केवल नियंत्रण नहीं होता, बल्कि उनका शोधन होता है। पराअहम् के विकास में अच्छे ग्रंथों, चिंतन, अनुभव और आंतरिक समझ की भूमिका होती है। यही वह मन है जो मनुष्य को संतुलन, संयम और अंततः शांति की ओर ले जाता है।

मन को समझने के लिए "चेतन" और "अवचेतन" की बात भी ज़रूरी है। चेतन मन वह है जिसमें हम इस समय जी रहे होते हैं—सोचना, बोलना, पढ़ना, सुनना, निर्णय लेना। लेकिन इससे कहीं अधिक शक्तिशाली अवचेतन मन होता है। इसमें हमारी पुरानी स्मृतियाँ, अनुभव और दबाई गई इच्छाएँ जमा रहती हैं। जो बात हम बार-बार करते हैं या सोचते हैं, वह धीरे-धीरे अवचेतन में उतर जाती है, विशेषकर नींद के समय। एक बार जो चीज़ अवचेतन में बैठ जाती है, उसे बदलना आसान नहीं होता।

वृत्तियां (टेंडेंसी)—जैसे क्रोध, भय, लोभ, कामवासना, अहंकार—इसी अवचेतन मन में रहती हैं। इन्हें न तो पूरी तरह हटाया जा सकता है और न ही जबरदस्ती दबाया जा सकता है। जब व्यक्ति इन्हें समझे बिना दबाने की कोशिश करता है, तब अवसाद, हिंसा और आत्मविनाश जैसी स्थितियाँ पैदा होती हैं। इसी कारण ऋषियों ने प्रतिक्रिया को गुलामी कहा है। अगर कोई हमें गुस्सा दिला दे और हम तुरंत गुस्सा हो जाएँ, तो मान लीजिए हमने अपना निर्णय सामने वाले को सौंप दिया। हम वही करने लगे जो सामने वाला चाहता था।

हम अक्सर यह मान लेते हैं कि हमारे विचार हमारे अपने हैं, लेकिन ध्यान से देखें तो पता चलता है कि कई विचार बाहरी परिस्थितियों से पैदा होते हैं। किसी चीज़ की आवाज़ सुनकर मन में इच्छा उठना, बाज़ार जाकर ऐसी चीज़ खरीद लेना जिसकी योजना नहीं थी—ये सब इसी प्रक्रिया के उदाहरण हैं। इसका मतलब यह नहीं कि मन बुरा है, बल्कि यह कि उसे समझे बिना हम उसके हाथों में खिलौना बन जाते हैं।

वृत्तियाँ मन की सुरक्षा-दीवार की तरह होती हैं। वे मन को बचाने के नाम पर हमें उलझाए रखती हैं ताकि हम स्वयं को गहराई से न समझ सकें। लेकिन जो व्यक्ति इन वृत्तियों को पहचान लेता है, उन्हें समझ लेता है और धीरे-धीरे उनका शोधन करता है, वही वास्तविक शांति का अनुभव करता है। वृत्तियाँ तब भी रहती हैं, लेकिन वह व्यक्ति उनमें फँसता नहीं है। अंततः मन को हटाया नहीं जा सकता, वृत्तियों को मिटाया नहीं जा सकता—उन्हें केवल समझा और संतुलित किया जा सकता है, यही समझना ही अवचेतन मन को समझना कहलाता हैं। यही समझ मनुष्य को अशांति से शांति और गुलामी से स्वतंत्रता की ओर ले जाती है।

अतः हमें चेतन और अवचेतन या फ्रायड जिसे id, EGO, supar EGO , कहते है उन सब स्तरों को समझना होगा तभी हम अपने मस्तिष्क की बनावट को कुछ समझ सकते हैं।

~ कपिल तिवारी “यथार्थ”