अंधेरी रात थी ... सब ओर नीरवता छाई थी ... रात के अशुभ पक्षी चीत्कार कर रहे थे ... गीदड़ - कुत्ते अपने - अपने कर्कश स्वर में अशुभ का आभास कराते हुए चीख़ रहे थे। ऐसे डरावने माहौल में हवेली के पीछे बना एक छोटा सा दरवाजा धीरे से खुला, एक साये ने पैर दबा के हवेली में प्रवेश किया । यह घुॅंघरू थी - हवेली की मुख्य महराजिन की बेटी । किस्मत ने इसके साथ अजीब खेल खेला था, बाल विवाह के बाद गौना से पहले ही बेवा होने का कलंक उसके माथे पर लग गया था। बेवा ... हाँ ! किसी ऐसे की बेवा जिसका चेहरा तक उसे याद नहीं। हवेली में वह अपनी माँ के साथ उसका हाथ बंटाने आती थी, रोहिणी जब ब्याह के यहाँ आई तो घुॅंघरू धीरे - धीरे उसकी खास बनती चली गई। वह उम्र में भी लगभग रोहिणी के बराबर ही थी, रोहिणी उससे किसी सहेली की तरह ही व्यवहार रखती थी। वो बाल विधवा जिस रूदन ... क्रंदन को अपने अंदर दबा के बैठी थी, उसे रोहिणी ने बड़ी सरलता से पहचान लिया था। ना सिर्फ पहचाना उस पर मरहम भी लगाया, यह काम तो उसकी माँ ने भी नहीं किया था। बस यही रिश्ता था दोनों का ... दर्द का ... मरहम का ... एक ऐसा रिश्ता जो इस रूढ़िवादी - दोगले समाज के सोच से परे था। वो घुॅंघरू ही थी जो रोहिणी की आंतरिक द्वन्द्व को जान गई थी इसलिए उसकी हवेली के पिछले दरवाजे से निकल भागने में मदद की थी, उसे जंगल के मुहाने तक लेकर गई थी और आज ... आज एक बार फिर वो रोहिणी की मदद करने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ थी। वो दम साधे वीर सिंह के कमरे में घुसी और सबसे पहले लोटे में रखे पानी को चाॅंदी के कटोरे पर उलट दिया। फिर उसने तीव्र घृणा से वीर सिंह की ओर देखा, वो पहले के तुलना में शांत जरूर था पर धीरे - धीरे बड़ी दर्द भरी कराह निकल रही थी उसके मुंह से ... उसके सारे बदन पर बड़े - बड़े घाव थे, जिनसे खुन और पीव बह रहा था ... ऐसी भयंकर बदबू कोठरी में फैली थी कि घुॅंघरू को उबकाई आने लगी मगर उसने सब्र रखा और बड़ी ही चतुराई से उसने बजरंग बली की मौली, माता की चुनरी को वीर सिंह के बदन से विलग कर दिया और यह पवित्र चीजें अपने आॅंचल में बॉंध लीं लेकिन तभी वीर सिंह की अॉंख खुल गई, घुॅंघरू भय के मारे दो कदम पीछे हट गई। वीर सिंह की आॅंखें उसे देख कर चौड़ी हुईं, ऐसा लगा वो जोर से चिल्लाने वाला हो पर उसकी आवाज जैसे उसके अन्दर ही किसी ने घोंट दी ... वीर सिंह ऐसे छटपटाने लगा जैसा कोई उसका गला घोंट रहा हो। यह देख के घुॅंघरू की आंखें चमक उठीं ... वो ठठाकर हॅंस पड़ी और बेसाख्ता ही उसके मुंह से निकला,
" आप आ गईं छोटी ठकुराइन ! हम जानते थे कि आप जरूर आवेंगी, आपन दासी को अकेल थोड़े ही छोड़ देंगी। ऐही से तो इ खतरा उठाये रहे हम। "
यह बोलते - बोलते उसके आंखो में आंसू छलक आये, वो जाने को मुड़ी फिर रूककर कोठरी में शून्य को ताकते हुए बोली,
" आप के बिना हवेली में कुछो अच्छा नाही लगत है छोटी ठकुराइन, आपे से ही तो इ घर चमकत रहे..... ! "
उसकी आवाज रूंध गई, आॅंसुओं को पोछती हुई वो जिधर से आई थी उधर से ही निकल भागी। इस दौरान हुई खटपट से बड़ी ठकुराइन चौंक कर अपने बिछौने पर उठ बैठीं फिर उन्हें अजीब सी घों - घों की आवाज सुनाई दी। वो घबरा के गिरती - पड़ती अपने बेटे के कक्ष की ओर भागीं। वहाँ पहुँच कर वो दरवाजे पर ही ठिठक के खड़ी हो गईं, अंदर का नजारा ही कुछ ऐसा था .... वीर सिंह का देह हवा में झूल रहा था ... उसकी आँखें अपनी माँ से टकराईं तो आॅंखों से आॅंसू बह निकले .... बोलने के प्रयास में गले से सिर्फ घों - घों की आवाज़ निकली। बड़ी ठकुराइन थर्रा कर वहीं दरवाजे पर गिर गईं, अचानक से उनके चेहरे पर छपाक से छींटे पड़े, उन्होंने हाथ लगाया तो देखा वो खुन के छींटे थे । सामने देखा तो वह सुन्न पड़ गईं ... सामने बिछौने पे वीर सिंह चिताने पड़ा था, उसकी खोपड़ी कई हिस्सों में फट गई थी .... आॅंखें निकल कर बाहर लटक रहीं थीं ... जुबान कट के एक तरफ पड़ा था .........................
सवेरे होने से पहले ही गाँव वालों का जमावड़ा लग गया हवेली में, वीर सिंह का ऐसा वीभत्स अंत देख कर गाँव वाले तो भय से जड़वत हो गए थे।
इधर वीर सिंह की अर्थी उठी उधर अब तक एकदम सुन्न पड़ीं बड़ी ठकुराइन उठीं और हवेली के बीचोबीच अपने उपर ढेरों मिट्टी तेल छीड़क के आत्मदाह कर लिया ... कोई कुछ करता उससे पहले ही वह जलकर राख हो गईं । इन अति भयंकर घटनाओं ने गाँव वालों को बेहद भयभीत कर दिया। दाह संस्कार के तुरंत बाद सब लोग इकट्ठा होकर पुजारी जी के पास गए और उनसे गुहार लगाई की उनकी रक्षा हेतु वह कुछ उपाय करें। तभी वहाँ वीर सिंह का मुंशी शुब्बा लाल बदहाल सा भागता हुआ पहुँचा और पुजारी जी के चरणों में गिर गया, रोते हुए बोला,
" पुजारी जी ! वो... वो... ठाकुर की हीरगंज वाली हवेली में म..मं..मंगला और उसकी माँ की ल..ल..ला..लाशें देख कर भागे आ रहें हैं, दोनों का गला काट दिया है... ख.. खुन ही खुन था वहाँ......... ! "
कुछ लोगों ने उसे उठा के बिठाया तब पुजारी जी ने पूछा,
" हीरगंज में ठाकुर की हवेली ? मंगला ? मंगला की माँ ?कौन हैं ये सब ?? शुब्बा लाल सत्य बताओ। "
शुब्बा लाल को अपने जान के लाले पड़ते दिखाई दे रहे थे, उसने मंगला और हीरगंज की हवेली का सारा भेद उगल दिया,
" हीरगंज वाले कह रहे थे कि बड़ी बदचलन थी वो मंगला, ठाकुर साहब के नाक के नीचे,उन्हीं की हवेली में केशव प्रसाद नाम का कोई दूसरा मर्द पाल रखा था। उसी ने पैसों और गहनों के लोभ में दोनों माँ - बेटी का गला काट दिया और सारा धन समेट कर भाग निकला। हीरगंज के कई लोगों ने उसे बड़ी सी गठरी लेकर भागते हुए देखा था प.. प.. पर.. पर पुजारी जी उस केशव की क्षत- विक्षत ल..ल..ला ..लाश यहाँ जंगल के पास मिली है। "
शुब्बा लाल वहीं बैठा सिर पिटने लगा, बड़बड़ाने लगा कि छोटी ठकुराइन उसके भी प्राण नहीं बख्शेगी। गाँव वालों में जैसे हड़कंप मच गया, वो लोग आक्रोशित होकर कहने लगे कि ठाकुर के कारण पूरे गाँव पर संकट आ गया है। उन्हें किसी प्रकार शांत कराते हुए सरपंच जी बहुत चिंतित स्वर में बोले,
" पहले ठाकुर साहब फिर बड़ी ठकुराइन ... अब ये घटना, हर ओर विनाश के लक्षण दिखाई दे रहें हैं पुजारी जी । उधर हरदेव और फूलचंद का भी ठाकुर साहब जैसा ही हाल है ! सुना है उन्हें भी छोटी ठकुराइन दिखाई पड़ गईं थीं, उनका भी प्राण नाश निश्चित ही लग रहा है । क्या हमारे पूरे गाँव पर प्रेतबाधा हो गई है पुजारी जी? "
पुजारी जी ने दीर्घ निःश्वास ली और बोले,
" क्या भूल गए सरपंच जी, हरदेव और फूलचंद ही तो थे जो ठाकुर के साथ में थे छोटी ठकुराइन के हत्या के वक़्त ... प्रतिशोध ... प्रतिशोध की अग्नि में जल रही है वो प्रेतात्मा । ना ... अब यह मेरे वश की बात नहीं , हम लोगों को तांत्रिक बाबा बटेश्वर के शरण में जाना चाहिए। "
गाँव के सरपंच बोले,
" लेकिन पुजारी जी, वो यहाँ आने को राजी होंगे ? "
" पूरा जत्था को ले जाने की जरूरत नहीं सरपंच जी ! बस मैं, आप और गाँव के कुछ बुजुर्ग चलेंगे । उनसे गाँव की रक्षा हेतु प्रार्थना करेंगे, आगे शिवशम्भू की इच्छा । "
तो आखिरकार सब के मत से यही तय हुआ और फिर वह लोग तांत्रिक बाबा बटेश्वर के पास गए ... बाबा बटेश्वर ने न सिर्फ उनकी प्रार्थना सुनी बल्कि गाँव वालों का आमंत्रण भी स्वीकार किया।
क्रमशः........................