किघकन्या - 2 Shree Kriti द्वारा पौराणिक कथा में हिंदी पीडीएफ

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किघकन्या - 2

जैसे - जैसे रोहिणी के रूप - लावण्य का जादू टूटने लगा वैसे - वैसे हसीन रूमानी रातों का सिलसिला छूटने लगा और वीर सिंह का आततायी रूआब उसकी जगह लेने लगा। लेकिन रोहिणी बड़ी ही समझदार और संतोषी लड़की थी ... वो अपने जीवन में इतना कुछ देख - सुन - सह चुकी थी कि अब जैसा भी उसका जीवन था उसे ही अपना भाग्य मान प्रसन्न रहा करती थी। वीर सिंह का मोह उससे भले ही टूट गया हो पर वह अपना पत्नी धर्म पूरे लगन से निभाती थी। पहली किरण के उगते ही वो जाग जाती, सबसे पहले नहा - धोकर कुछ देर भगवान के चरणों में बिताती फिर पुजा - पाठ करके पूरे दिन घर के कामकाज में लगी रहती .... सभी का खूब ध्यान रखती। ससुराल के लोग उससे बड़ा खुश रहा करते ... गाँव के लोग भी उसकी बड़ाई करते नहीं थकते थे । इन सब के बावजूद वीर सिंह उससे खुश नहीं रहता था। वो स्वभाव से इतना चिड़चिड़ा और गुस्से वाला था कि वो रोहिणी से क्या किसी से भी खुश नहीं रहता था। दिन - प्रतिदिन उसका अत्याचार बढ़ता ही जा रहा था ... वो तो रोहिणी पर हाथ भी उठाने लगा था ... क‌ई बार तो बेचारी वीर सिंह के मार से अधमरी सी हो जाती थी। वीर सिंह की माँ गॅंगा देवी अच्छे से जानती थी कि इन सब में रोहिणी का तनिक भी दोष नहीं पर जिसका दोष था वो उनका अपना एकलौता बेटा था .... भला वो अपने कोख के जाये को कैसे दोष देतीं इसलिए उलट के वो रोहिणी को ही ताना मारती रहतीं थीं कि जरूर उसमें में ही कोई खोट है तब ही उसका बेटा उससे खुश नहीं रहता और ऐसा बर्ताव करता है। इन सब के बावजूद रोहिणी भगवान के आसरे अपने जी को संतोष दे कर रहती ... कोई भी बात मन से नहीं लगाती । सोचती ,  
' चलो कम से कम मेरी गृहस्थी तो चल रही है ना .... मैं उनकी पत्नी हूँ ... उन्होंने मुझे त्यागा तो नहीं है .... घर से बेघर हो ग‌ई तो जाऊँगी कहाँ  (?) चलो कम से कम उन्होंने मुझे घर से निकाला तो नहीं है। वैसे भी अम्मा अक्सर कहती थी कि लड़की डोली में ससुराल आती है और जाती है अर्थी में ' । 
और जब से उसे पता चला कि एक नन्ही सी जान उसके कोख में है और जल्द ही उसके जीवन में आने वाला है, वो खुशी से झूम उठी ... अनेकों बार भगवान के चरणों में माथा टेका। गॅंगा देवी भी इस खुशखबरी से बेहद प्रसन्न थीं, उन्होंने अपने खानदान के आने वाले चिराग के लिए क‌ई मन्नतें मांगी ... अपने अनुभव के पिटारे से निकाल कर बहु को क‌ई बातें समझाईं  ... हिदायतें दीं ।  सबको लग रहा था कि शायद अपनी होने वाली संतान की वजह से वीर सिंह के बर्ताव में बदलाव आयेगा पर यह महज़ कोरी कल्पना निकली। रोहिणी पेट से है यह जानने के बाद वीर सिंह का बर्ताव उसके प्रति और निर्मम हो गया। इस हाल में भी वो उसे पीटा करता बल्कि पहले से कहीं ज्यादा ... बिना किसी गलती के । किसी घरवाले में, यहाँ तक की गॅंगा देवी में भी इतना साहस नहीं था कि वो वीर सिंह को रोक पायें। वो जितना हो सके अपनी बहु का ख्याल रखतीं ... उसे धीरज देतीं और दिनरात भगवान से मन्नतें माॅंगतीं कि उनके खानदान के चिराग को उनका बेटा बुझा न पाये ... वो अपने पोते का मुॅंह देख पायें। इसी सहारे रोहिणी भी जी रही थी लेकिन एक दिन उसे ऐसी बात पता चली कि उसका सब्र और हौसला दोनों टुट कर चूर - चूर हो गए। रोहिणी  गर्भावस्था में भी वीर सिंह के सारे काम अपने हाथों से किया करती,वो अपने पति को खुश करने का जतन करती रहती थी या यूँ कहें अपने भाग्य को जगाने का जतन करती रहती थी। इसी दौरान अचानक उसने एक दिन वीर सिंह को अपने मुंशी शुब्बा लाल से बात करते हुए सुन लिया, वो दोनों हीरगंज की हवेली के बारे में बातें कर रहे थे । वीर सिंह अक्सर हीरगंज जाता रहता था पर रोहिणी को कभी शक नहीं हुआ लेकिन हीरगंज में हवेली होने की बात उसे बुरी तरह चौंका गई। वो अपनी सास के मुॅंह से अक्सर जमीन - जायदाद की बातें सुनती रहती थी पर हीरगंज में उनकी कोई हवेली है ऐसा उसने कभी नहीं सुना। रोहिणी दीवार से लगकर उनकी बातें सुनने लगी और तब जाकर उसने जाना कि जिस भाग्य को वो जगाने को ये सारे जतन करती रहती है , वो तो कब का फूट चुका है .... हीरगंज में वीर सिंह की सिर्फ हवेली ही नहीं है बल्कि एक और पत्नी भी है। वो लड़की बिरादरी की नहीं थी इसलिए वीर सिंह उसे सबसे छुपा कर हीरगंज में रखता था। उसके पति ने उसे धोखा देकर एक और शादी कर रखी है, यह जानकर रोहिणी आत्मा की गहराइयों तक टूट गई। अब उसे समझ में आया कि उसका पति उस पर इतने जुल्म क्यों करता है ... क्यों उसके रूप - लावण्य ... बनाव- श्रृंगार  ... सारे जतन का बस क्षणिक असर होता है वीर सिंह पे। उसने उससे शादी मात्र बिरादरी को दिखाने के लिए की थी, प्यार तो वो शायद अपनी दुसरी पत्नी से करता है ... इसलिए उसे अपनी संतान से भी रती भर मोह नहीं। जब से रोहिणी ने हीरगंज का भेद जाना था, उसको यह भय सताने लगा कि कहीं वीर सिंह उसे और उसके बच्चे को जान से न मार डाले .... दिनरात वो इसी चिंता में घुलती रहती की कैसे वो अपनी और अपने बच्चे की जान बचाये। अंततः उसने तय कर लिया कि वो इस हवेली और वीर सिंह से बहुत दूर भाग जायेगी क्योंकि वो जानती थी कि उसकी सास या कोई घरवाला या गाँव वाले भी उसकी रक्षा वीर सिंह से नहीं कर पायेंगे। वीर सिंह ने क‌ई लठैत और अखड़ैत पाल रखे थे जो दिन में हवेली के इर्दगिर्द फैले रहते थे। दिन में भागना तो असंभव था, इस कारण रोहिणी रात में हवेली से भागने की योजना बनाने लगी। गाँव के आसपास ज्यादातर जंगल का इलाका था, रोहिणी को लगा कि अगर वो रात में जंगल के रास्ते कहीं दूर निकल जाये तो वीर सिंह उसे पकड़ नहीं पायेगा। और उसने ऐसा ही किया, एक रात को वो चुपके से हवेली से भाग गई। वो बहुत दूर चली जाना चाहती थी, जहाँ वो और उसका बच्चा शांति से रह सकें पर वो ज्यादा दूर जा नहीं पाई। वीर सिंह को जल्द ही पता चल गया कि रोहिणी घर से भाग चुकी है और उसका क्रोध और अहंकार दोनों ज्वालामुखी की तरह उबलने लगे। 



क्रमशः ......................