एक नज़र, एक कहानी - 4 nupur shah द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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एक नज़र, एक कहानी - 4

मैं अभी भी वहीं बैठी थी। मन तो बाहर जाने का था, लेकिन मैंने खुद को रोक लिया था। पता नहीं क्यों, मुझे लगा कि बिना किसी वजह के उसके पीछे जाना सही नहीं होगा। इसलिए मैं चुपचाप अपनी जगह पर बैठी रही।

कुछ ही देर बाद मेरी कज़िन बोली, "चल, बाहर चलते हैं।"

इस बार मैं भी उसके साथ उठ गई।

जैसे ही हम बाहर पहुँचे, देखा कि मेरे मामा, मामी और परिवार के कुछ बड़े लोग बाहर खड़े होकर बातें कर रहे थे। माहौल बिल्कुल हल्का-फुल्का था। सबके चेहरों पर मुस्कान थी।

उसी समय मामा ने हम सब बच्चों को देखकर मुस्कुराते हुए अपनी जेब से चॉकलेट निकाली।

"लो... तुम लोगों के लिए।"

हम सबने खुशी-खुशी चॉकलेट ले ली।

कुछ देर तक हम वहीं खड़े रहे। मैं सबसे बातें तो कर रही थी, लेकिन मेरी नज़रें अनजाने में उसे ढूँढ़ रही थीं।

और तभी...

मैंने देखा कि वह भी हमारी तरफ़ चला आ रहा था।

उसके साथ उसका वही दोस्त भी था।

मेरी धड़कन एक बार फिर तेज़ हो गई।

मैंने तुरंत अपनी नज़रें दूसरी तरफ़ कर लीं, लेकिन दिल मानने को तैयार ही नहीं था।

कुछ पल बाद हम सब वापस टेंट की तरफ़ लौट आए।

मैं अपनी कुर्सी पर बैठ गई।

थोड़ी ही देर बाद वह भी वापस आया।

ऐसा लगा जैसे वह भी उसी तरफ़ लौट आया हो, जहाँ हम बैठे थे।

एक बार फिर हमारी नज़रें मिलीं।

इस बार न मुस्कान बड़ी थी...

न कोई इशारा...

बस एक छोटी-सी नज़र, जिसने जाने कितनी बातें कह दीं।

उस पल मुझे महसूस हुआ कि कुछ रिश्तों को शब्दों की ज़रूरत ही नहीं होती।

खामोशी भी कभी-कभी बहुत कुछ कह जाती है।

समय धीरे-धीरे बीतता रहा।

हम दोनों अपने-अपने परिवार के बीच बैठे थे, लेकिन जाने क्यों ऐसा लग रहा था जैसे उस भीड़ में भी हमारी नज़रें बार-बार एक-दूसरे तक पहुँच ही जाती थीं।

तभी मम्मी नीचे आईं और बोलीं,

"चलो, अब देर हो रही है। हमें घर निकलना चाहिए।"

उनकी बात सुनते ही मेरा दिल एकदम उदास हो गया।

मैंने एक बार उसकी तरफ़ देखा।

शायद उसने भी सुन लिया था कि हम जाने वाले हैं।

दिल चाहता था कि समय बस यहीं रुक जाए।

लेकिन हर खूबसूरत पल की तरह यह पल भी शायद खत्म होने वाला था।

तभी अचानक मेरे नाना जी ने मुस्कुराते हुए कहा,

"अरे, इतनी भी क्या जल्दी है? थोड़ा और रुक जाओ, फिर चले जाना।"

सबने एक-दूसरे की तरफ़ देखा।

आख़िरकार मम्मी, मामा और मामी भी मान गए।

मेरे चेहरे पर अनजाने में फिर से मुस्कान आ गई।

शायद किस्मत हमें कुछ पल और देना चाहती थी।

हम फिर से नीचे आकर बैठ गए।

ज़्यादा देर नहीं हुई थी कि अचानक ढोल और बैंड-बाजे की आवाज़ सुनाई देने लगी।

सबकी नज़रें एक साथ गेट की तरफ़ उठ गईं।

दुल्हन अपने नए घर पहुँच चुकी थी।

पूरा माहौल खुशियों से भर गया।

बच्चे उछलने लगे, बड़े लोग स्वागत की तैयारी करने लगे और कुछ ही पलों में संगीत की धुन पर सब नाचने लगे।

मेरे सारे कज़िन भी दौड़ते हुए वहाँ पहुँच गए।

उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और कहा,

"चल... तू भी आ।"

मैं भी मुस्कुराते हुए उनके साथ चली गई।

नाचते-नाचते अचानक मेरी नज़र उसकी तरफ़ गई।

वह भी वहीं था...

बस कुछ ही कदमों की दूरी पर।

चारों तरफ़ संगीत, हँसी और खुशियों का शोर था।

लेकिन उस शोर के बीच भी मेरी दुनिया जैसे कुछ पल के लिए शांत हो गई।

उस रात हमने एक-दूसरे से एक भी शब्द नहीं कहा...

फिर भी जाने क्यों ऐसा लग रहा था कि वह शाम मेरी ज़िंदगी की सबसे खूबसूरत याद बन चुकी है।

मुझे बिल्कुल भी अंदाज़ा नहीं था...

कि यह हमारी आख़िरी मुलाक़ात होगी, और इसके बाद ज़िंदगी हमें फिर कभी आमने-सामने मिलने का मौका नहीं देगी।

क्रमशः... ❤️