एक नज़र, एक कहानी - 2 nupur shah द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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एक नज़र, एक कहानी - 2

भाग 2 – फिर वही मुस्कान

शादी खत्म हो गई थी और हम वहाँ से निकल गए। उसके बाद हम अपनी कुलदेवी के मंदिर गए, जो शादी के हॉल से कुछ ही दूरी पर था। मंदिर पहुँचते ही हमने माता जी के दर्शन किए, प्रसाद लिया और कुछ देर वहीं शांति से बैठे रहे। मंदिर का वातावरण इतना शांत था कि मन को एक अलग ही सुकून मिल रहा था।

लेकिन मेरे दिल में सिर्फ एक ही बात चल रही थी।

मैंने आँखें बंद कीं और पूरे दिल से प्रार्थना की।

"माता जी... अगर वह मेरी किस्मत में है, तो बस एक बार फिर उससे मिला दीजिए। मैं उसे सिर्फ एक बार और देखना चाहती हूँ।"

प्रार्थना करने के बाद जब मैंने आँखें खोलीं, तो मन को एक अजीब-सा सुकून महसूस हुआ। ऐसा लगा जैसे माता जी ने मेरी बात सुन ली हो।

मंदिर से निकलने के बाद मुझे लगा कि अब हम सब घर जा रहे हैं। मैं भी चुपचाप गाड़ी में बैठ गई। तभी मम्मी ने कहा,

"अभी घर नहीं... पहले एक जगह चलना है।"

मैं थोड़ा हैरान हुई, लेकिन मैंने कुछ नहीं पूछा। बस खिड़की से बाहर देखते हुए सोचती रही कि आखिर हम कहाँ जा रहे हैं।

कुछ ही देर बाद हमारी गाड़ी एक घर के सामने जाकर रुकी। तब पता चला कि हम उसी घर आए हैं जहाँ लड़के वाले रहते थे। शादी के बाद दुल्हन पहली बार अपने ससुराल आने वाली थी, इसलिए पूरे घर को बहुत सुंदर तरीके से सजाया गया था।

घर के बाहर बड़ा-सा टेंट लगा हुआ था। रंग-बिरंगी रोशनियाँ चारों ओर चमक रही थीं। हर तरफ खुशी का माहौल था। बच्चे इधर-उधर खेल रहे थे, बड़े लोग आपस में बातें कर रहे थे और सभी दुल्हन के स्वागत की तैयारियों में व्यस्त थे। बाहर कई कुर्सियाँ भी लगी हुई थीं।

मैं भी सबके साथ आगे बढ़ रही थी, लेकिन मेरी नज़रें जैसे किसी को ढूँढ़ रही थीं।

और तभी...

मेरी नज़र एक कुर्सी पर बैठे उस पर जाकर ठहर गई।

एक पल के लिए मुझे अपनी आँखों पर विश्वास ही नहीं हुआ।

दिल की धड़कन अचानक इतनी तेज़ हो गई, जैसे समय वहीं ठहर गया हो।

मेरे मन में बस एक ही बात आई—

"क्या सच में माता जी ने मेरी प्रार्थना इतनी जल्दी सुन ली?"

मैं बस उसे देखती रह गई।

शायद उसने भी मुझे देख लिया था।

हम दोनों की नज़रें एक-दूसरे से मिलीं...

और फिर...

उसके चेहरे पर धीरे-धीरे एक प्यारी-सी मुस्कान आ गई।

उसकी वह मुस्कान देखकर मेरे चेहरे पर भी अपने-आप मुस्कान आ गई। उस पल मुझे जो खुशी महसूस हुई, उसे शब्दों में बयां करना शायद कभी मुमकिन नहीं होगा।

न उसने कुछ कहा...

न मैंने।

फिर भी ऐसा लगा जैसे हमारी खामोशी ही एक-दूसरे से बातें कर रही हो।

उस पल मुझे पहली बार महसूस हुआ कि कुछ रिश्ते बिना किसी पहचान के भी दिल के बहुत करीब आ जाते हैं।

मैं बस उसे देखकर मुस्कुरा रही थी...

लेकिन मुझे बिल्कुल भी अंदाज़ा नहीं था कि उस दिन मेरी ज़िंदगी का सबसे खूबसूरत पल अभी बाकी था।

आखिर ऐसा क्या होने वाला था? क्या इस बार हमारी बात हो पाएगी... या फिर किस्मत हमें एक बार फिर सिर्फ एक मुस्कान देकर अलग कर देगी?

क्रमशः... ❤️