वर्षा का गीत Vijay Erry द्वारा प्रेरक कथा में हिंदी पीडीएफ

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वर्षा का गीत

वर्षा का गीत 
लेखक: विजय शर्मा ऐरी, अजनाला, अमृतसर
आसमान पर काले बादलों ने धीरे-धीरे अपना साम्राज्य फैला लिया था. हवा में भीगी मिट्टी की सुगंध घुल चुकी थी. खेतों में खड़े पेड़ मानो बरसात का स्वागत करने के लिए झूम रहे थे. दूर कहीं कोयल की मधुर आवाज़ सुनाई दे रही थी. पहली बारिश की बूंदें जैसे धरती पर कोई मधुर गीत लिख रही थीं.
गाँव के किनारे बने छोटे-से घर की खिड़की पर बैठी बारह वर्षीय नंदिनी बारिश को बड़े ध्यान से देख रही थी. उसके हाथ में एक पुरानी कॉपी थी, जिसमें वह अक्सर अपने मन की बातें लिखा करती थी. उसे लगता था कि हर बारिश अपने साथ कोई नया गीत लेकर आती है. वह धीरे से बोली, "बारिश कभी केवल पानी नहीं बरसाती, यह यादें, उम्मीदें और सपने भी बरसाती है."
इतने में उसकी दादी मुस्कुराती हुई उसके पास आईं. उन्होंने पूछा, "क्या सोच रही हो बेटी?"
नंदिनी ने उत्तर दिया, "दादी, क्या बारिश सचमुच गाती है?"
दादी हँस पड़ीं. "हाँ, लेकिन उसका गीत वही सुन सकता है जिसके मन में शोर कम और प्रेम अधिक हो."
यह बात नंदिनी के मन में गहराई तक उतर गई.
अगले दिन विद्यालय में हिंदी के अध्यापक ने घोषणा की कि जिले स्तर की कहानी प्रतियोगिता होने वाली है. विषय था—"प्रकृति का संदेश."
सभी बच्चे उत्साहित थे. नंदिनी ने मन ही मन निश्चय किया कि वह बारिश पर कहानी लिखेगी. लेकिन वह केवल बारिश का वर्णन नहीं करना चाहती थी. वह उस गीत को शब्द देना चाहती थी जो उसे हर वर्ष पहली बारिश में सुनाई देता था.
घर लौटते समय तेज वर्षा शुरू हो गई. रास्ते में उसने देखा कि कुछ बच्चे बारिश में कागज़ की नावें चला रहे थे. एक किसान दोनों हाथ जोड़कर आकाश की ओर देख रहा था. उसकी आँखों में खुशी के आँसू थे क्योंकि कई दिनों से सूखी पड़ी फसल को जीवन मिल गया था.
थोड़ी दूर एक बूढ़ी महिला अपने छोटे-से पौधे को भीगने से बचाने के लिए उसके चारों ओर मिट्टी जमा कर रही थी. वहीं सड़क के किनारे बैठे मजदूर अपनी आधी भीगी रोटी खाते हुए भी मुस्कुरा रहे थे.
नंदिनी सोचने लगी, "एक ही बारिश कितने अलग-अलग गीत गाती है. किसी के लिए खुशी, किसी के लिए संघर्ष, किसी के लिए उम्मीद."
उस रात बिजली चली गई. पूरा घर लालटेन की रोशनी में डूब गया. बाहर लगातार वर्षा हो रही थी.
दादी ने कहा, "जब मैं छोटी थी तब बारिश होते ही पूरा गाँव बाहर निकल आता था. बच्चे मिट्टी में खेलते थे. बड़े लोग पेड़ लगाते थे. कोई मोबाइल नहीं था, लेकिन रिश्ते बहुत मजबूत थे."
नंदिनी ने पूछा, "अब ऐसा क्यों नहीं होता?"
दादी ने लंबी साँस ली. "क्योंकि अब लोग बारिश देखने के बजाय उसकी वीडियो बनाने में व्यस्त हो जाते हैं."
यह सुनकर सब हँस पड़े, लेकिन नंदिनी समझ गई कि दादी की बात में सच्चाई छिपी है.
अगले कुछ दिनों तक वह हर सुबह गाँव में घूमने लगी. उसने देखा कि एक सूखा तालाब धीरे-धीरे पानी से भर रहा था. कई महीनों बाद चिड़ियाँ फिर से वहाँ लौट आई थीं. मोर खेतों में नाच रहे थे. बच्चों की हँसी और मेंढकों की टर्र-टर्र मिलकर जैसे प्रकृति का संगीत बना रही थी.
लेकिन उसने यह भी देखा कि कुछ लोग नालियों में प्लास्टिक फेंक रहे थे. उसी कारण पानी सड़कों पर भर गया था. कई घरों में गंदा पानी घुस गया.
नंदिनी को लगा कि बारिश दोषी नहीं है. गलती इंसानों की लापरवाही की है.
उसने अपनी कहानी में लिखा—
"बारिश का गीत हमेशा मधुर होता है. बेसुरा हम उसे अपनी आदतों से बना देते हैं."
प्रतियोगिता का दिन आ गया.
जब नंदिनी मंच पर पहुँची तो उसने कहानी पढ़नी शुरू की. उसने बताया कि बारिश केवल खेतों को नहीं, बल्कि मन को भी सींचती है. बारिश हमें सिखाती है कि जैसे बादल अपना सब कुछ धरती को दे देते हैं, वैसे ही मनुष्य को भी अपने जीवन में बाँटना सीखना चाहिए.
उसने कहा, "यदि पेड़ नहीं होंगे तो बारिश का गीत भी अधूरा हो जाएगा. यदि नदियाँ गंदी होंगी तो वर्षा की धुन भी मुरझा जाएगी."
पूरा सभागार शांत होकर उसकी बातें सुनता रहा.
अंत में उसने कहा—
"बरसात कोई मौसम नहीं, प्रकृति का मधुर गीत है. जिसे सुनने के लिए कान नहीं, संवेदनशील हृदय चाहिए."
उसकी कहानी समाप्त होते ही पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा.
कुछ दिनों बाद परिणाम घोषित हुए.
नंदिनी को प्रथम पुरस्कार मिला.
जिलाधिकारी ने मुस्कुराते हुए पूछा, "तुम्हें यह विचार कहाँ से मिला?"
नंदिनी ने उत्तर दिया, "सर, मैंने कहानी नहीं लिखी. मैंने तो केवल बारिश का गीत सुनकर उसे शब्दों में उतार दिया."
यह उत्तर सुनकर सभी लोग भावुक हो गए.
पुरस्कार में मिली राशि से नंदिनी ने अपने विद्यालय में पचास पौधे लगाने का निर्णय लिया. उसने अपने सभी मित्रों से कहा, "यदि हम चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ियाँ भी बारिश का यह गीत सुनें, तो हमें प्रकृति की रक्षा करनी होगी."
कुछ महीनों बाद वही पौधे हरे-भरे हो चुके थे.
अगले वर्ष जब पहली बारिश हुई तो उन पौधों की पत्तियाँ बूंदों से चमक रही थीं. हवा उनके बीच से गुजर रही थी और ऐसा लग रहा था मानो पूरा विद्यालय एक मधुर गीत गा रहा हो.
नंदिनी ने आँखें बंद कीं. उसे फिर वही आवाज़ सुनाई दी जिसे वह बचपन से सुनती आई थी.
अब वह समझ चुकी थी कि बारिश का गीत बादलों से नहीं, पेड़ों से नहीं, नदियों से भी नहीं जन्म लेता.
वह जन्म लेता है उस मन में जो प्रकृति से प्रेम करता है.
उस दिन उसने अपनी डायरी के अंतिम पन्ने पर लिखा—
"जब भी बरसात होगी, मैं केवल भीगूँगी नहीं. मैं उसका गीत भी सुनूँगी. क्योंकि जो मनुष्य प्रकृति के गीत सुनना सीख जाता है, वह जीवन के हर दुःख में भी आशा की धुन खोज लेता है."
उसके शब्द धीरे-धीरे पूरे गाँव की सोच बन गए. हर वर्ष वर्षा ऋतु के पहले गाँव में वृक्षारोपण होने लगा. बच्चे कागज़ की नावों के साथ पौधे भी लगाने लगे. किसान वर्षा का स्वागत करते हुए जल-संरक्षण की शपथ लेने लगे.
बरसात अब केवल एक मौसम नहीं रही थी.
वह पूरे गाँव का सबसे सुंदर गीत बन चुकी थी.