ठुकराईन नयना देवी - 2 Vandna Sharma द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

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ठुकराईन नयना देवी - 2



ठकुराइन नयना देवी- Part 2

पिछले अंक में आपने पढ़ा था कि नयना देवी स्वभाव से जिद्दी और साफ दिल की महिला है। उसे अपनी जिंदगी अपनी शर्तों पर जीना पसंद है। ससुराल में उसकी नंद सरिता से उसकी पहले दिन ही ठन गई थी, लेकिन वक्त के साथ सब बदलता है। अब आगे पढ़े=

नयना देवी के सेवा भाव ने सरिता का मन पिघला दिया। सरिता अब नयना की ढाल बन गई। हर काम में वो नयना के साथ खड़ी रहती। समय तेजी से बीतने लगा। अगले साल नयना देवी ने एक सुंदर सी कन्या को जन्म दिया। सरिता अपनी भतीजी को पाकर फूली नहीं समाई। लेकिन नयना की सास इस बात से खुश नहीं थी। उसने बच्ची का कोई समारोह नहीं किया। 

यह देख सरिता को बहुत दुख हुआ। वो अपनी मां के पास गई और बोली - "मां, लड़की हो या लड़का ये तो वंश का गौरव है। मां के लिए सब संतान एक जैसी होती हैं। लड़की को जन्म देने के लिए भी एक स्त्री को उतना ही कष्ट होता है, मृत्यु से लड़ना पड़ता है। इतना दर्द झेलने के बाद भी अगर भेदभाव होगा तो गलत है। मैं अपनी भतीजी के लिए सारी रस्में करूंगी। राखी बांधूंगी, भाई दूज का टीका करूंगी। ईश्वर की बनाई हर कृति बराबर है, तो व्यवहार भी बराबर होना चाहिए।"

सरिता ने अपनी मां को समझाकर पुत्र के होने वाली सारी रस्में अपनी भतीजी के लिए करवाईं। सरिता के इस ममता भरे व्यवहार को देखकर नयना देवी की आंखों से आंसू बहने लगे। उसने सरिता को गले से लगा लिया। पहली बार दोनों के बीच की दीवार टूट गई।

कुछ समय बाद नयना के पति की नौकरी दूसरे शहर में लग गई। नयना अपने पति और बेटी के साथ शहर चली गई। लेकिन गांव वाली "ठकुराइन नयना देवी" का रौब शहर में भी कायम रहा। नयना ने वहां भी अपनी अलग मित्र मंडली बना ली। पूरे मोहल्ले में क्या हो रहा है, किसके घर झगड़ा है, किसकी बहू नौकरी करती है - सबकी खबर रखती। 

हर हफ्ते वो सरिता को फोन करती और गांव की सारी खबरें सुनाती। फोन पर अक्सर कहती - "सरिता, सुन। अपना व्यवहार ही काम आता है मरने के बाद। वरना अर्थी उठाने के लिए चार कंधे भी न मिलते। अगर हमारा जीवन किसी के काम आ जाए तो इससे बढ़िया और क्या होगा।"

इधर गांव में सरिता की शादी तय हुई। नयना देवी को जब पता चला तो वो मन ही मन घबरा गई। उसकी शादी गांव में हुई तो नयना को अपने श्राप की याद आई उसे दुख हुआ कि ऐसा नहीं बोलना चाहिए था।। शादी के अगले ही दिन सरिता के ससुराल में वही हुआ जिसका नयना ने श्राप दिया था। सरिता के पति ने पूरे खानदान के कपड़े उसके सामने रख दिए और कहा "धो दो"। सरिता बेचारी रोते-रोते सारा काम करने लगी। उसका पति घरवालों को खुश करने के लिए सारे दिन उनकी चापलूसी करता और सरिता से भी कहता कि वो घर के किसी सदस्य को नाराज न करे। 

सरिता चुपचाप सब सहती और सोचती "कभी तो वक्त बदलेगा"। जब नयना को ये बात पता चली तो उसका दिल भर आया। उसे अपनी कही बात पर पछतावा हुआ। उसने तुरंत सरिता को फोन किया और रोते हुए माफी मांगी - "मुझसे गलती हो गई सरिता। गुस्से में मैंने जो कह दिया वो सच हो गया। मुझे माफ कर दे।"

नयना ने सरिता को आशीर्वाद दिया - "तेरी सेवा बेकार नहीं जाएगी। तेरा पति तुझे बहुत प्यार करेगा। तू राज करेगी अपने घर में।"

और सच में ऐसा ही हुआ। सरिता के त्याग और समर्पण को देखकर उसका पति बदल गया। उसने सरिता से माफी मांगी और उसे अपने साथ शहर ले गया। अब वो सरिता को हर खुशी देने की कोशिश करता। 

सरिता खुश होकर सबसे पहले नयना के घर गई। उसने नयना के लिए खाना बनाया और उसे अपने घर खाने पर बुलाया। दोनों नन्द भाभी अब सगी बहनों से बढ़कर थीं।

गांव वाले आज भी कहते हैं - "नयना ठकुराइन कली जुबान है, उससे पंगा मत लिया करो। पर है दिल की अच्छी।जुबान की तेज पर दिल की साफ। और सरिता उसकी परछाई है।" 

इस तरह "ठकुराइन नयना" की कहानी ने सिखाया कि औरत का दर्द सिर्फ औरत ही समझ सकती है। क्रोध से रिश्ते बिगड़ते हैं और ममता से बनते हैं। सेवा और त्याग कभी व्यर्थ नहीं जाते।

डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर नई दिल्ली