अध्याय 4 — पहला इंकार
रुहिका ने अपनी पहली कहानी पूरी की तो उसे लगा जैसे उसने अपने दिल का एक हिस्सा कागज़ पर रख दिया हो।
कहानी का नाम था—"बारिश के बाद की धूप"।
उसने कई बार उसे पढ़ा। हर बार कोई शब्द बदलती, कोई वाक्य मिटाती, फिर लिखती। उसे लगता था कि यह कहानी सिर्फ़ कहानी नहीं, उसकी साँसों का हिस्सा है।
आख़िरकार उसने वह कहानी एक प्रसिद्ध पत्रिका में भेज दी।
इसके बाद हर सुबह उसकी शुरुआत एक ही उम्मीद से होती—शायद आज जवाब आएगा।
दिन बीतते गए।
एक सप्ताह…
दो सप्ताह…
फिर एक महीना।
एक दोपहर डाकिया घर के बाहर रुका। उसके हाथ में एक लिफ़ाफ़ा था।
रुहिका का दिल तेज़ी से धड़कने लगा।
उसने काँपते हाथों से लिफ़ाफ़ा खोला।
अंदर उसकी वही कहानी थी।
ऊपर एक छोटा-सा पत्र रखा था—
"आपकी रचना में भावनाएँ हैं, लेकिन अभी उसे और परिपक्व होने की आवश्यकता है। इस बार हम इसे प्रकाशित नहीं कर पा रहे हैं। लिखना जारी रखिए।"
बस इतना ही।
रुहिका कुछ देर तक चुप बैठी रही। उसे लगा जैसे उसके शब्द लौट आए हों, बिना किसी मंज़िल के।
उसने कहानी को अपनी डायरी के बीच रख दिया और खिड़की के पास जाकर बैठ गई।
बाहर बारिश शुरू हो चुकी थी।
उसकी आँखों से भी दो बूँदें चुपचाप गिर पड़ीं।
लेकिन उसी क्षण उसे अपनी हिंदी शिक्षिका की बात याद आई—
"जिस लेखक ने पहला इंकार नहीं देखा, उसने पहला विश्वास भी नहीं कमाया।"
रुहिका ने आँसू पोंछे।
उसने अपनी कहानी फिर से खोली।
इस बार उसने उसे फाड़ा नहीं।
उसने पहली पंक्ति के ऊपर केवल एक वाक्य लिखा—
"मैं लौटकर फिर आऊँगी… पहले से बेहतर बनकर।"
उस रात उसने पहली बार समझा कि एक लेखक की असली परीक्षा उसकी प्रकाशित रचनाएँ नहीं, बल्कि लौटाई गई रचनाएँ होती हैं।
और शायद उसी रात एक नई रुहिका का जन्म हुआ।अध्याय 5 — शब्दों की आग
उस रात चाँद पूरा था, लेकिन रुहिका के कमरे में अँधेरा पसरा हुआ था।
मेज़ पर वही लौटी हुई कहानी रखी थी। कागज़ के कोने मुड़ गए थे, जैसे उन्होंने भी सफ़र की थकान महसूस की हो।
रुहिका ने धीरे से उसे उठाया। कुछ पल तक वह उसे देखती रही। फिर मुस्कुराई।
"तुम हारी नहीं हो," उसने कहानी से कहा, "तुमने बस मुझे अभी और सीखने के लिए वापस बुलाया है।"
उसने एक नया पन्ना निकाला।
इस बार उसने कहानी नहीं लिखी।
उसने अपने बारे में लिखा।
अपने बचपन के बारे में...
माँ के हाथों की खुशबू के बारे में...
उन रातों के बारे में, जब बिजली चली जाती थी और वह लालटेन की रोशनी में किताबें पढ़ती थी...
उन दिनों के बारे में, जब लोग कहते थे—"लड़कियाँ इतना पढ़कर क्या करेंगी?"
लिखते-लिखते उसकी आँखों से आँसू टपक पड़े।
लेकिन उस दिन पहली बार उसे महसूस हुआ कि कुछ आँसू कमज़ोरी नहीं होते। कुछ आँसू शब्द बनकर दूसरों के दिल तक पहुँचते हैं।
सुबह हुई तो उसकी डायरी के कई पन्ने भर चुके थे।
उसने उन्हें पढ़ा।
उसमें कोई बनावट नहीं थी।
कोई दिखावा नहीं था।
सिर्फ़ सच था।
और शायद यही एक लेखक की सबसे बड़ी ताक़त होती है।
उसने डायरी बंद की और आसमान की ओर देखा।
सूरज धीरे-धीरे उग रहा था।
रुहिका ने मन ही मन कहा—
"मैं ऐसी कहानियाँ लिखूँगी जिनमें लोग मुझे नहीं, खुद को ढूँढ़ पाएँ। अगर मेरे शब्द किसी एक टूटे हुए इंसान को फिर से मुस्कुराना सिखा दें, तो वही मेरी सबसे बड़ी जीत होगी।"
उसे नहीं पता था कि उसकी डायरी का एक पन्ना बहुत जल्द किसी ऐसे व्यक्ति के हाथ लगने वाला है, जो उसकी ज़िंदगी की दिशा बदल देगा।