द मिस्टीरियस क्वीन - Chapter 2 - भाग 2 kanta द्वारा क्लासिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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द मिस्टीरियस क्वीन - Chapter 2 - भाग 2

द मिस्टीरियस क्वीन (The Mysterious Queen)

अध्याय 2: राठौर परिवार का छुपा हुआ सच

भाग 2

आरुषि कुछ क्षण तक उस पुरानी तस्वीर को देखती रही। तस्वीर में मौजूद पाँच साल की बच्ची की मुस्कान, उसकी आँखें और गले में पहना हुआ लॉकेट... सब कुछ उसकी अपनी बचपन की तस्वीर जैसा लग रहा था।

उसने तस्वीर को बैग में रखा और रिकॉर्ड ऑफिस से बाहर निकल आई।

बाहर मौसम अचानक बदल चुका था। आसमान पर काले बादल छा गए थे।

तभी उसका फोन बजा।

स्क्रीन पर कोई नंबर नहीं था।

उसने कॉल रिसीव की।

"हैलो..."

दूसरी तरफ से भारी आवाज़ आई—

"अगर अपने अतीत का सच जानना है... तो आज शाम सात बजे राठौर मेंशन पहुँचो। लेकिन याद रखना, वहाँ हर मुस्कुराता चेहरा अपना नहीं होता।"

कॉल तुरंत कट गई।

आरुषि ने दोबारा कॉल करने की कोशिश की, लेकिन नंबर मौजूद ही नहीं था।

उसने गहरी साँस ली।

"लगता है... अब जवाब वहीं मिलेंगे।"


---

उधर...

राठौर मेंशन।

शहर के सबसे सुरक्षित इलाकों में बना एक विशाल महल, जहाँ बिना अनुमति कोई प्रवेश नहीं कर सकता था।

आरव अपनी स्टडी में बैठा पुरानी फाइलें देख रहा था।

तभी कबीर अंदर आया।

"सर, सूचना पक्की है। आज शाम आरुषि यहाँ आएगी।"

आरव ने फाइल बंद कर दी।

"उसे कोई नुकसान नहीं पहुँचना चाहिए।"

"लेकिन सर... अगर बड़े साहब को पता चल गया तो?"

आरव की आवाज़ ठंडी हो गई।

"मैंने कहा था... उसकी सुरक्षा मेरी जिम्मेदारी है।"

कबीर बिना कुछ बोले बाहर चला गया।


---

शाम के सात बजे...

आरुषि टैक्सी से राठौर मेंशन के सामने उतरी।

उसने विशाल लोहे का गेट देखा।

गेट पर खड़े सुरक्षा कर्मियों ने उसे रोक लिया।

"आप किससे मिलना चाहती हैं?"

"आरव राठौर से।"

गार्ड कुछ बोलता, उससे पहले इंटरकॉम बजा।

अंदर से आदेश आया—

"उन्हें अंदर आने दीजिए।"

गार्ड तुरंत एक तरफ हट गए।

आरुषि धीरे-धीरे मेंशन के अंदर चली गई।

चारों तरफ आलीशान सजावट थी, लेकिन उस जगह में एक अजीब सी खामोशी थी।

उसे ऐसा लगा जैसे हर दीवार कोई राज छुपाए बैठी हो।

तभी सामने से आरव आता दिखाई दिया।

वह हमेशा की तरह काले सूट में था।

"तुम आ ही गई।"

आरुषि ने सीधे उसकी आँखों में देखा।

"मुझे मेरे सवालों के जवाब चाहिए।"

आरव कुछ कह पाता, उससे पहले सीढ़ियों से एक बुज़ुर्ग महिला नीचे उतरीं।

जैसे ही उनकी नज़र आरुषि पर पड़ी...

उनके हाथ से पूजा की थाली गिर गई।

उनकी आँखों में आँसू भर आए।

वह काँपती आवाज़ में बोलीं—

"...आर्या?"

पूरा हॉल एक पल के लिए शांत हो गया।

आरुषि हैरान रह गई।

"मेरा नाम आरुषि है... आर्या नहीं।"

बुज़ुर्ग महिला उसके पास आईं और उसके चेहरे को ध्यान से देखने लगीं।

"नहीं... यह चेहरा... यह आँखें... बिल्कुल उसी जैसी..."

आरव तुरंत आगे बढ़ा।

"दादी, आप शांत हो जाइए।"

लेकिन दादी की नज़रें अब भी आरुषि पर टिकी थीं।

"अगर यह आर्या नहीं है... तो इसके गले में हमारे परिवार का राजचिह्न वाला लॉकेट कैसे है?"

आरुषि के हाथ अनायास अपने लॉकेट पर चले गए।

उसने पहली बार महसूस किया कि यह लॉकेट सिर्फ एक यादगार नहीं...

बल्कि उसके अतीत की सबसे बड़ी चाबी है।

उसी समय...

ऊपर की बालकनी से कोई छिपकर यह सब देख रहा था।

उसने मोबाइल निकाला और किसी को संदेश भेजा—

"लड़की राठौर मेंशन पहुँच चुकी है। योजना का दूसरा चरण शुरू किया जाए।"

उसके चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान फैल गई...

अध्याय 3 में जारी...

दादी "आर्या" का नाम क्यों लेती हैं?

लॉकेट का असली रहस्य क्या है?

और बालकनी में छिपा वह शख्स कौन है?