Room no. 407 - 2 Radha rani Jha द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

Room no. 407 - 2

रूम नं. 407
भाग – 2 : बंद दरवाज़े के पीछे
आरोही का पूरा शरीर डर से काँप रहा था।
उसकी आँखें सामने लगे धूल भरे नंबर पर टिक गई थीं—
407
कमरे का दरवाज़ा आधा खुला था।
अंदर इतना अँधेरा था कि कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।
लेकिन वही आवाज़...
वही धीमी, ठंडी फुसफुसाहट...
"तुम आ ही गई..."
आरोही के पैरों ने जैसे ज़मीन पकड़ ली।
वह भागना चाहती थी...
लेकिन उसका शरीर उसका साथ नहीं दे रहा था।
उसने काँपती आवाज़ में पूछा—
"क... कौन है वहाँ?"
कुछ सेकंड तक बिल्कुल सन्नाटा रहा।
फिर कमरे के अंदर से किसी के हल्के-हल्के हँसने की आवाज़ आने लगी।
"ह... ह... ह..."
वह ज़ोर से नहीं हँस रही थी...
बस इतनी धीमी कि सुनने वाले की रीढ़ में सिहरन दौड़ जाए।
आरोही ने पीछे हटना चाहा।
तभी...
कमरे के अंदर से किसी के धीरे-धीरे चलते हुए कदमों की आवाज़ आने लगी।
ठक...
ठक...
ठक...
हर कदम के साथ ऐसा लग रहा था जैसे वह चीज़ दरवाज़े के और करीब आ रही हो।
आरोही ने अचानक पीछे मुड़कर भागना शुरू कर दिया।
वह सीढ़ियाँ उतर रही थी।
दिल इतनी तेज़ धड़क रहा था कि उसे अपने कदमों की आवाज़ भी सुनाई नहीं दे रही थी।
आख़िरकार वह अपने कमरे तक पहुँची।
दरवाज़ा बंद किया...
और ज़ोर-ज़ोर से साँस लेने लगी।
"क्या हुआ?"
नैना घबराकर उठ गई।
आरोही ने पूरी बात बताई।
लेकिन जैसे-जैसे वह बोलती गई...
नैना का चेहरा सफ़ेद पड़ता गया।
"तुम...
तुम सच में चौथी मंज़िल पर गई थी?"
"हाँ..."
"और...
तुमने आवाज़ भी सुनी?"
आरोही ने सिर हिलाया।
नैना की आँखों में आँसू आ गए।
"हमें यहाँ से चले जाना चाहिए..."
"लेकिन क्यों?"
नैना ने जवाब देने की बजाय अपना मोबाइल उठाया।
उसने इंटरनेट खोला और हॉस्टल का नाम सर्च किया।
कुछ ही देर बाद उसने एक पुरानी न्यूज़ दिखाई।
'पंद्रह साल पहले सेंट हेलेना हॉस्टल की छात्रा रहस्यमय तरीके से लापता।'
उस खबर में लिखा था—
तीन लड़कियाँ देर रात चौथी मंज़िल पर गई थीं।
दो लड़कियाँ बेहोश मिलीं।
लेकिन तीसरी...
रिया मल्होत्रा...
आज तक नहीं मिली।
न उसका शव...
न कोई सबूत।
आरोही की धड़कन फिर तेज़ हो गई।
"लेकिन अगर वो गायब हुई थी...
तो फिर..."
नैना धीरे से बोली—
"लोग कहते हैं...
वो आज भी 407 में है।"
अचानक...
कमरे की ट्यूब लाइट अपने आप झपकने लगी।
एक बार...
दो बार...
तीन बार...
और फिर पूरी लाइट चली गई।
पूरा कमरा अँधेरे में डूब गया।
सिर्फ़ बाहर बिजली चमकने की रोशनी खिड़की से अंदर आ रही थी।
उसी रोशनी में...
आरोही की नज़र कमरे के आईने पर पड़ी।
आईने पर धूल जमी हुई थी।
लेकिन...
उस धूल पर किसी ने अभी-अभी अपनी उँगली से कुछ लिखा था।
"मत खोलना..."
दोनों लड़कियाँ डर के मारे चीख पड़ीं।
नैना ने काँपते हुए टॉर्च जलाई।
अब आईने पर कुछ भी नहीं लिखा था।
जैसे वहाँ कभी कुछ था ही नहीं।
"मैंने देखा था..."
आरोही बुदबुदाई।
"मैंने भी..."
नैना की आवाज़ काँप रही थी।
उसी समय...
हॉस्टल की घंटी ज़ोर-ज़ोर से बजने लगी।
रात के ढाई बजे...
जबकि उस समय घंटी कभी नहीं बजती थी।
पूरा हॉस्टल जाग गया।
लड़कियाँ अपने-अपने कमरों से बाहर निकल आईं।
वार्डन मिसेज़ डिसूज़ा भी भागती हुई आईं।
उनके चेहरे पर डर साफ़ दिखाई दे रहा था।
उन्होंने पहली बार गुस्से में नहीं...
बल्कि घबराकर पूछा—
"किसी ने...
चौथी मंज़िल पर जाने की कोशिश की थी क्या?"
आरोही कुछ बोल पाती...
उससे पहले भीड़ के पीछे खड़ी एक बुज़ुर्ग सफ़ाई कर्मचारी धीरे से बोली—
"मैंने कहा था...
वो किसी नए का इंतज़ार कर रही है..."
वार्डन ने तुरंत उसे चुप करा दिया।
"बस!"
लेकिन अब देर हो चुकी थी।
आरोही ने साफ़-साफ़ सुन लिया था।
'वो किसी नए का इंतज़ार कर रही है।'
उस रात किसी की भी दोबारा सोने की हिम्मत नहीं हुई।
लेकिन...
सुबह जब आरोही उठी...
तो उसकी हथेली पर काले रंग से एक नंबर लिखा हुआ था।
407
वह नंबर किसी पेन से नहीं लिखा गया था...
ऐसा लग रहा था...
जैसे किसी ने उसकी त्वचा के अंदर से उभर दिया हो।
और सबसे डरावनी बात...
आरोही को याद ही नहीं था कि रात में उसके कमरे में आया कौन था...