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*नॉवेल: "पांच वादों की दुल्हन"*
*Chapter 5: प्यार या बदला? ~ 1200 शब्द*
आज बुधवार था।
आराध्या के हाथ जले हुए थे। पर दिल उससे भी ज्यादा जला हुआ था।
*Scene 1: डॉक्टर और मरीज ~ 400 शब्द*
सुबह 9 बजे। देव का कमरा। दवाइयों की खुशबू।
देव: "हाथ दिखाओ।"
आराध्या ने पट्टी खोली। छाले।
देव ने धीरे-धीरे मरहम लगाया। उसकी उंगलियां ठंडी थीं।
"दर्द हो रहा?" देव ने पूछा।
"जिस्म का दर्द सह लूंगी। दिल का नहीं।" आराध्या ने धीरे से कहा।
देव का हाथ रुक गया: "मतलब?"
आराध्या ने आंख उठाई: "5 साल पहले आप भी उस आग में थे ना? डायरी में लिखा था - 'देव दवाई देगा'।"
देव सन्न। 10 सेकंड चुप। फिर बोला: "हां था।"
"तो आपने क्यों नहीं रोका?"
"क्योंकि मैं डरपोक हूं आराध्या। सबसे छोटा। सबसे कमजोर।" देव ने आंख झुका ली: "मैंने चीखें सुनी थीं। पर पापा की बंदूक देखकर चुप हो गया।"
आराध्या का गुस्सा भड़का: "और आज? आज हीरो बन रहे हो?"
देव ने उसका जला हुआ हाथ पकड़ा: "आज इसलिए हीरो बन रहा हूं क्योंकि तुमने कल एक जान बचाई। आग में कूदकर। मैं 5 साल से खुद से भाग रहा था। तुमने आईना दिखा दिया।"
आराध्या ने हाथ छुड़ाया: "झूठ। तुम सब एक जैसे हो।"
देव: "हो सकता है। पर मैं तुम्हें मरने नहीं दूंगा।"
उसने दराज से एक फाइल निकाली: "ये लो। केस फाइल की असली कॉपी। अर्जुन के पास डुप्लीकेट है।"
आराध्या की सांस रुक गई: "आप... आप मुझे दे रहे हैं?"
"हां। क्योंकि मैं भी इस घर से आजाद होना चाहता हूं।" देव: "पर एक शर्त। विक्रम को अभी मत दिखाना। वो जान ले लेगा।"
आराध्या ने फाइल ली। आंखों में पहली बार किसी के लिए इज्जत आई।
*Scene 2: प्यार का भ्रम ~ 400 शब्द*
दोपहर। बगीचा।
रुद्र गिटार बजा रहा था। उदास धुन।
"दी, बैठो।"
आराध्या बैठी।
रुद्र: "आपको देव भैया अच्छे लगते हैं?"
आराध्या चौंकी: "क्यों?"
"बस ऐसे ही। वो आपको अलग नजर से देखते हैं।"
आराध्या हंसी: "पागल। वो सिर्फ रहम कर रहा है।"
रुद्र: "रहम और प्यार में फर्क होता है दी।" उसकी आवाज भर्रा गई: "और मुझे... मुझे आपसे..."
"क्या?"
"कुछ नहीं।" रुद्र उठकर भाग गया।
आराध्या देखती रह गई। _"इस घर में हर कोई टूटा हुआ है।"_
शाम को विक्रम का फोन आया: "कमरे में आओ। अभी।"
आराध्या गई।
विक्रम नशे में: "सुना है तुम देव के कमरे में थी घंटों?"
"इलाज के लिए।"
"इलाज?" विक्रम ने पास खींचा: "मेरा इलाज कौन करेगा?"
आराध्या ने खुद को छुड़ाया: "हाथ मत लगाना।"
"थप्पड़" विक्रम ने मारा: "जुबान चलाती है? भूल मत कि तुम क्या हो।"
आराध्या का गाल लाल। आंखों में आंसू पर गिरी नहीं।
"मैं इंसान हूं विक्रम। सामान नहीं।"
विक्रम: "ठीक है। कल से तुम्हारी ड्यूटी। सुबह 5 बजे उठना। पूरे महल की सफाई। नौकरानी की तरह।"
कहकर चला गया।
*Scene 3: टूटना और जुड़ना ~ 400 शब्द*
रात 2 बजे। आराध्या फर्श साफ कर रही थी। हाथ जल रहे थे।
तभी देव आया। हाथ में दवाई और खाना।
"तुम यहां?"
"नींद नहीं आ रही थी।" आराध्या: "विक्रम ने सजा दी है।"
देव ने झाड़ू लिया: "मैं कर देता हूं।"
"नहीं। ये मेरी सजा है।"
देव ने खाना रखा: "खा लो।"
आराध्या रो पड़ी: "क्यों कर रहे हो ये सब? मुझे कमजोर मत करो देव।"
देव घुटने पर बैठ गया: "आराध्या, मैं तुमसे प्यार नहीं करता।"
आराध्या चौंकी।
"मैं... मैं गिल्ट से प्यार करता हूं। अपने गुनाह से। और तुम वो गिल्ट धो रही हो।"
आराध्या: "तो झूठी हमदर्दी मत दिखाओ।"
देव: "हमदर्दी नहीं। सच है।" उसने आराध्या का हाथ पकड़ा: "भाग चलो मेरे साथ। अभी। इस घर से। इस गुनाह से।"
आराध्या का दिल डगमगाया। 5 साल से जिस इंसानियत के लिए तरस रही थी, वो सामने थी।
1 मिनट। 2 मिनट।
आराध्या ने हाथ छुड़ाया: "नहीं देव।"
"क्यों?"
"क्योंकि भागना कायरता है। मैं बदला लेकर जाऊंगी। सर उठाकर।" आराध्या उठी: "और तुम्हें चुनना होगा। या तो इस घर के साथ रहो... या मेरे साथ।"
कहकर चली गई।
छत पर। बारिश शुरू।
रुद्र पहले से खड़ा था। भीग रहा था।
"दी, आप रो रही हैं?"
"बारिश है।"
रुद्र: "झूठ।" उसने आराध्या का हाथ पकड़ा: "आप अकेली नहीं हैं। मैं हूं।"
आराध्या ने पहली बार रुद्र को गले लगाया: "थैंक्यू।"
तभी नीचे से विक्रम की आवाज: "ऊपर कौन है?"
दोनों सहम गए।
रुद्र: "आप जाओ। मैं संभाल लूंगा।"
आराध्या भागी। पीछे से आवाज आई: "रुद्र! तुम यहां क्या कर रहे हो इस लड़की के साथ?"
आराध्या ने मुड़कर नहीं देखा। आंखों से आंसू और बारिश एक साथ।
कमरे में आई। फाइल खोली। देव की दी हुई।
पहले पन्ने पर लिखा था: _"मैं गुनहगार हूं। पर अब गवाह बनना चाहता हूं। - देव"_
आराध्या मुस्कुराई। आंसुओं के बीच।
मन में कहा: _"प्यार या बदला? अभी बदला। प्यार की कीमत बहुत महंगी है।"_
*Chapter 5 End*
_देव ने साथ का हाथ बढ़ाया। रुद्र ने दिल का।
पर आराध्या ने चुना - बदले का रास्ता।
कल गुरुवार। करण का दिन। और वो सबसे खतरनाक है।_
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