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*नॉवेल: "पांच वादों की दुल्हन"*
*Chapter 4: खून का राज ~ 1000 शब्द*
आज मंगलवार।
आराध्या के हाथ में फोन था। उसमें 5 साल पुरानी डायरी की फोटो।
पर अकेली फोटो से कुछ नहीं होगा। असली केस फाइल चाहिए। जो अर्जुन के कमरे में है।
*Scene 1: DSP का कमरा ~ 350 शब्द*
रात 12 बजे। पूरा महल सो रहा था।
आराध्या चुपके से निकली। पैरों में घुंघरू नहीं, सिर्फ सांस की आवाज।
अर्जुन का कमरा। ताला लगा।
नौकरानी से सुना था - "DSP साहब चाबी हमेशा जेब में रखते हैं।"
तभी पीछे से आवाज: "इतनी रात को कहां?"
आराध्या पलटी। अर्जुन। वर्दी में। हाथ में बंदूक।
"नींद नहीं आ रही थी। हवा खाने आई थी।" आराध्या ने हिम्मत से कहा।
अर्जुन पास आया। उसकी जेब में चाबी का गुच्छा झनझनाया।
"हवा? इस घर में हवा भी इजाजत से चलती है। जाओ सो जाओ।"
आराध्या जाने लगी। तभी लाइट गई। *अंधेरा।*
"Generator खराब है।" अर्जुन बुदबुदाया।
अंधेरे का फायदा। आराध्या ने झटके से अर्जुन की जेब से चाबी निकाली।
दिल इतनी तेज धड़क रहा था कि लगता था अर्जुन सुन लेगा।
लाइट आई।
अर्जुन: "जाओ।"
आराध्या कमरे में आई। चाबी से ताला खोला।
अंदर फाइलों का ढेर। "शर्मा केस - 2019" वाली फाइल ढूंढी।
मिली। उस पर लिखा: *"सबूत नष्ट। आरोपी अज्ञात। बंद।"*
नीचे अर्जुन के साइन।
आराध्या ने फोटो खींची। हाथ कांप रहे थे।
तभी दरवाजा खुला।
अर्जुन। टॉर्च हाथ में।
"क्या कर रही हो?" आवाज बर्फ जैसी ठंडी।
आराध्या का खून जम गया।
*Scene 2: सच और झूठ ~ 350 शब्द*
"मैं... मैं दवा ढूंढ रही थी।" आराध्या ने सबसे बड़ा झूठ बोला।
अर्जुन ने टॉर्च उसके हाथ पर मारी। फोन। और फाइल।
अर्जुन ने फाइल छीनी। फोन देखा। फोटो डिलीट।
"डिलीट कर दिया। अब क्या करोगी?" अर्जुन हंसा: "पुलिस वाले से चालाकी?"
आराध्या: "मुझे सच जानना था।"
"कौन सा सच?" अर्जुन पास आया: "कि तुम्हारा बाप कर्जखोर था? कि हमने रहम करके तुम्हें अपना लिया?"
"रहम?" आराध्या चीखी: "मेरी मां-बहन को जलाकर रहम?"
अर्जुन का चेहरा सख्त: "सबूत है?"
आराध्या: "डायरी है। विक्रम के कमरे में।"
अर्जुन 2 सेकंड चुप। फिर हंसा: "वो नकली है। देव ने लिखी है। नाटक करने के लिए।"
आराध्या: "तुम सब एक जैसे हो।"
अर्जुन: "हो सकता है। पर तुम हमारी हो। कानूनन।"
उसने आराध्या की कलाई पकड़ी: "आइंदा ऐसी गलती की तो जेल में डालूंगा। अपनी बीवी को ही।"
तभी बाहर शोर। "आग! आग!"
*Scene 3: आग और फैसला ~ 300 शब्द*
पूरे महल में अफरा-तफरी। किचन में आग।
सब भागे। आराध्या भी।
आग में फंसी थी एक नौकरानी। बेहोश।
विक्रम चिल्लाया: "कोई बचाओ!"
कोई नहीं गया।
आराध्या ने बिना सोचे आग में छलांग लगाई। नौकरानी को कंधे पर उठाया और बाहर।
हाथ जल गए। कपड़े जले।
विक्रम: "पागल हो? मर जाती।"
आराध्या: "इंसान थी।"
सब चुप।
देव भागकर आया। मरहम लगाया: "जल गई हो।"
रुद्र रोते हुए: "दीदी..."
ठाकुर: "आज तुमने ठाकुरगढ़ की इज्जत बचाई।"
रात को आराध्या अपने कमरे में। हाथ में पट्टी।
दरवाजा खटका। देव।
"दर्द?"
"नहीं।"
देव: "तुम अलग हो। इसीलिए खतरनाक भी हो।"
उसने एक पर्ची दी: "ये लो। तुम्हारी फोटो की कॉपी। मैंने बचा ली थी।"
आराध्या की आंखें भर आईं: "क्यों मदद कर रहे हो?"
देव: "क्योंकि 5 साल पहले मैं भी उस आग में था। पर मैंने किसी को नहीं बचाया। आज तुमने बचा लिया।"
कहकर चला गया।
रात 3 बजे। आराध्या की नींद खुली।
खिड़की पर रुद्र।
"दी, भाग चलो। मुझे सब पता है। विक्रम को शक हो गया है। वो कल तुम्हें मार देगा।"
आराध्या: "भागकर कहां जाऊं रुद्र? मेरा घर तो तुम लोगों ने ही जलाया था।"
रुद्र: "तो बदला लो। पर जिंदा रहकर।"
आराध्या ने लॉकेट पकड़ा: "अब पीछे नहीं हटूंगी।"
*Chapter 4 End*
_सबूत है। पर सबको पता चल गया।
विक्रम का शक। अर्जुन की धमकी। देव की मदद। रुद्र की चेतावनी।
कल बुधवार... देव का दिन। क्या वो साथ देगा या धोखा?_