परलोक GANESH TEWARI 'NESH' (NASH) द्वारा आध्यात्मिक कथा में हिंदी पीडीएफ

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ऋगुवेद सूक्ति--(35) की व्याख्या "स न: पर्षदति द्विष:"।ऋगुवेद 10-187-5भाव--वह परमात्मा हमें सब कष्टों से पार करे।पदच्छेद--सः । नः । पर्षत् । अति । द्विषः ।शब्दार्थसः – वह (परमात्मा)नः – हमें / हमारापर्षत् – पार कराए, बचाएअति – ऊपर से, पारद्विषः – द्वेष करने वाले, शत्रु, कष्ट देने वालेभावार्थवह परमात्मा हमें द्वेष करने वालों और सभी कष्टों से पार करा दे, हमारी रक्षा करे।व्याख्या--इस मंत्र में प्रार्थना की गई है कि परमात्मा मनुष्य को द्वेष, शत्रुता, बाधा और दुःखों से बचाकर सुरक्षित मार्ग पर ले जाए। यहाँ “द्विषः” का अर्थ केवल बाहरी शत्रु ही नहीं, बल्कि भीतर के दोष—क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष आदि भी हैं। परमात्मा की कृपा से मनुष्य इन सब बाधाओं को पार कर सकता है।1. ऋग्वेद“विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव।यद्भद्रं तन्न आ सुव॥”— ऋग्वेद 5.82.5अर्थहे देव (सविता परमात्मा)! हमारे सब दुरित (दुःख, कष्ट, पाप) दूर कर दीजिए और जो कल्याणकारी है, उसे हमें प्रदान कीजिए।2. यजुर्वेद--अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्।युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनोभूयिष्ठां ते नम उक्तिṁ विधेम॥”— यजुर्वेद 40.16अर्थ-हे अग्ने (परमात्मा)! हमें उत्तम मार्ग से कल्याण की ओर ले चलो, हमारे सभी पाप और कष्ट दूर करो; हम आपको बार-बार नमस्कार करते हैं।3. सामवेदमंत्र“अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्।”— सामवेद (उत्तरार्चिक 374 के निकट पाठ)अर्थ--हे परमात्मा! हमें श्रेष्ठ मार्ग पर चलाओ और सभी बाधाओं व पापों से बचाओ।4. अथर्ववेदमंत्र“भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाःभद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।”— अथर्ववेद 7.32.1अर्थहे देवों! हम अपने कानों से शुभ सुनें और आँखों से शुभ देखें, अर्थात् हमारा जीवन दुःख और विपत्ति से सुरक्षित रहे।सार-- इन सभी वैदिक मंत्रों का भाव यही है कि परमात्मा मनुष्य को कष्ट, पाप, शत्रुता और बाधाओं से बचाकर कल्याण की ओर ले जाए।1 ईशोपनिषद“अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्।युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनोभूयिष्ठां ते नमउक्तिṁ विधेम॥”— ईशोपनिषद 18अर्थहे परमात्मा! हमें श्रेष्ठ मार्ग से कल्याण की ओर ले चलो और हमारे पापों तथा दोषों को दूर करो; हम आपको बार-बार नमस्कार करते हैं।2. श्वेताश्वतर उपनिषद“यो देवानाṁ प्रभवश्चोद्भवश्चविश्वाधिपो रुद्रो महर्षिः।हिरण्यगर्भं पश्यत जायमानंस नो बुद्ध्या शुभया संयुनक्तु॥”— श्वेताश्वतर उपनिषद 3.4अर्थजो परमेश्वर देवताओं का कारण और संपूर्ण जगत का स्वामी है, वह हमें शुभ बुद्धि से जोड़कर कल्याण के मार्ग पर ले जाए।3-कठोपनिषद“तम् एवैकं जानथ आत्मानम्अन्या वाचो विमुञ्चथ।अमृतस्य एष सेतुः॥”— कठोपनिषद 2.3.8अर्थउस एक परमात्मा को ही जानो, अन्य सब व्यर्थ बातों को छोड़ दो; वही अमृत (मोक्ष) तक पहुँचाने वाला सेतु है, अर्थात् वही मनुष्य को दुःखों से पार कराता है।4. मुण्डक उपनिषद“भिद्यते हृदयग्रन्थिःछिद्यन्ते सर्वसंशयाः।क्षीयन्ते चास्य कर्माणितस्मिन् दृष्टे परावरे॥”— मुण्डक उपनिषद 2.2.8अर्थजब मनुष्य परमात्मा का साक्षात्कार करता है तब हृदय की सभी गाँठें (दुःख, बन्धन) टूट जाती हैं, संदेह नष्ट हो जाते हैं और कर्म-बन्धन समाप्त हो जाते हैं।5. छान्दोग्य उपनिषद“तारति शोकम् आत्मवित्।”— छान्दोग्य उपनिषद 7.1.3अर्थ--जो मनुष्य परमात्मा (आत्मा) का ज्ञान प्राप्त कर लेता है, वह शोक और दुःखों से पार हो जाता है।6 बृहदारण्यक उपनिषद“असतो मा सद्गमय।तमसो मा ज्योतिर्गमय।मृत्योर्मा अमृतं गमय॥”— बृहदारण्यक उपनिषद 1.3.28अर्थहे परमात्मा! हमें असत्य से सत्य की ओर, अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर, और मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो।7. तैत्तिरीय उपनिषद“सह नाववतु।सह नौ भुनक्तु।सह वीर्यं करवावहै।तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥”— तैत्तिरीय उपनिषद 2.1  परमात्मा हमारी रक्षा करें, हमारा पालन करें, हमें शक्ति दें और हम परस्पर द्वेष न करें।8- माण्डूक्य उपनिषद“अयमात्मा ब्रह्म।”— माण्डूक्य उपनिषद 2अर्थयह आत्मा ही ब्रह्म (परमात्मा) है; उसी का ज्ञान मनुष्य को भय और दुःख से मुक्त करता है। इन उपनिषदों का सार यही है कि परमात्मा की शरण और ज्ञान से मनुष्य शोक, दुःख, द्वेष और भय से पार हो जाता है।पुराणों में प्रमाण--- 1. भागवत पुराण“समाश्रिता ये पदपल्लवप्लवंमहत्पदं पुण्ययशो मुरारेः।भवाम्बुधिर्वत्सपदं परं पदंपदं पदं यद्विपदां न तेषाम्॥”— श्रीमद्भागवत महापुराण 10.14.58अर्थजो लोग भगवान के चरणों की शरण लेते हैं, उनके लिए यह संसार रूपी समुद्र बछड़े के खुर के बराबर छोटा हो जाता है, और वे सभी विपत्तियों से पार हो जाते हैं।2. विष्णु पुराण“वासुदेवाश्रयो मर्त्योवासुदेवपरायणः।सर्वपापविशुद्धात्मायाति ब्रह्म सनातनम्॥”— विष्णु पुराण 6.5.84अर्थजो मनुष्य भगवान वासुदेव की शरण में रहता है, वह सभी पापों से शुद्ध होकर परम पद को प्राप्त करता है।3. शिव पुराण“स्मरणादेव शम्भोःसर्वदुःखक्षयो भवेत्।”— शिव पुराण (विद्येश्वर संहिता)अर्थभगवान शिव के स्मरण मात्र से ही मनुष्य के सभी दुःखों का नाश हो जाता है।4. गरुड़ पुराण“नारायणपरायणोन कुतश्चन बिभ्यति।”— गरुड़ पुराण (पूर्व खण्ड)अर्थजो मनुष्य नारायण की शरण में रहता है, वह किसी भी भय या संकट से नहीं डरता।5(क) देवी भागवत पुराण“दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोःस्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि।दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्यासर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता॥”5(ख)-- देवी भागवत पुराण 5.19.28अर्थहे दुर्गे! आपका स्मरण करने से सभी प्राणियों का भय दूर हो जाता है। आप दुःख, दरिद्रता और संकट को दूर करने वाली तथा सबका कल्याण करने वाली हैं।6-- स्कन्द पुराण“नारायणपरायणस्यन कुतश्चन बिभ्यति।स्वर्गापवर्गनरकेष्वपितुल्यार्थदर्शिनः॥”— स्कन्द पुराण (वैष्णव खण्ड)अर्थजो मनुष्य नारायण की शरण में रहता है, वह किसी भी भय या संकट से नहीं डरता और सब परिस्थितियों में समभाव रखता है।7. पद्म पुराणश्लोक“हरिर्हि नाम्ना यः स्मृतःसर्वदुःखविनाशनः।”— पद्म पुराण (उत्तर खण्ड)अर्थभगवान हरि का नाम स्मरण करने से सभी दुःखों का नाश हो जाता है।8 लिंग पुराण“शिवनामस्मरणेनैवसर्वपापैः प्रमुच्यते।”— लिंग पुराण 1.70.42अर्थभगवान शिव के नाम का स्मरण करने मात्र से मनुष्य सभी पापों और दुःखों से मुक्त हो जाता है। इन पुराणों के श्लोकों का सार यही है कि ईश्वर का स्मरण और शरण मनुष्य को भय, शत्रु, पाप और दुःखों से पार कर देता है।भगवद्गीता में प्रमाण--- 1. भगवद्गीता“दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥”— भगवद्गीता 7.14अर्थ--यह मेरी दैवी माया अत्यन्त कठिन है; परन्तु जो मेरी शरण में आते हैं वे इस माया और संसार के दुःखों से पार हो जाते हैं।2. भगवद्गीता“तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्।भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्॥”— भगवद्गीता 12.7अर्थहे अर्जुन! जिनका मन मुझमें लगा है, मैं स्वयं उन्हें मृत्यु-रूप संसार-सागर से शीघ्र ही पार कर देता हूँ।3. भगवद्गीता“अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥”— भगवद्गीता 9.22अर्थ--जो लोग एकाग्र भाव से मेरा स्मरण और उपासना करते हैं, उनके योग और क्षेम (रक्षा और आवश्यकताओं) का भार मैं स्वयं उठाता हूँ।4. भगवद्गीता“सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥”— भगवद्गीता 18.66अर्थ--सब धर्मों को छोड़कर मेरी ही शरण में आओ, मैं तुम्हें सभी पापों और दुःखों से मुक्त कर दूँगा, शोक मत करो। इन गीता के श्लोकों का सार यही है कि ईश्वर की शरण लेने वाला मनुष्य संसार के कष्ट, भय और बाधाओं से पार हो जाता है। महाभारत में प्रमाण-- 1. “नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्॥”— महाभारत आदि पर्व 1.1अर्थ--नारायण, श्रेष्ठ पुरुष नर, देवी सरस्वती और व्यास को नमस्कार करके मनुष्य कार्य का आरम्भ करे, इससे विजय और मंगल प्राप्त होता है तथा बाधाएँ दूर होती हैं।2. “यतो धर्मस्ततो जयः।”— महाभारत उद्योग पर्व 43.60 (प्रसिद्ध उक्ति)अर्थजहाँ धर्म होता है वहीं विजय होती है, अर्थात धर्म का पालन करने वाला अंततः संकटों और शत्रुओं पर विजय पाता है।3-“न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति।”— महाभारत वन पर्व 313.117 (गीता 6.40 में भी)अर्थहे प्रिय! जो मनुष्य कल्याणकारी कर्म करता है वह कभी दुर्गति को प्राप्त नहीं होता, अर्थात वह दुःख और संकट से बच जाता है।4. “धर्मो रक्षति रक्षितः।”— महाभारत उद्योग पर्व (विदुर-नीति)अर्थजो मनुष्य धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है, और उसे संकट तथा शत्रुओं से बचाता है। इन महाभारत के वचनों का सार यह है कि ईश्वर की शरण, धर्म और सदाचार से मनुष्य संकटों, शत्रुओं और दुःखों से पार हो जाता है।स्मृति-ग्रन्थों में प्रमाण---1. मनुस्मृति“धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत्॥”— मनुस्मृति 8.15अर्थधर्म का नाश करने वाला स्वयं नष्ट हो जाता है, और जो धर्म की रक्षा करता है धर्म उसकी रक्षा करता है। इसलिए धर्म का नाश नहीं करना चाहिए।2. याज्ञवल्क्य स्मृति-“अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।एतं सामासिकं धर्मं चातुर्वर्ण्येऽब्रवीन्मनुः॥”— याज्ञवल्क्य स्मृति 1.122अर्थअहिंसा, सत्य, चोरी न करना, शुद्धता और इन्द्रियों का संयम — ये धर्म के मुख्य लक्षण हैं, जो मनुष्य को पाप और दुःख से बचाते हैं।3. पराशर स्मृति--सर्वेषामेव लोकानां धर्मो हि परमो मतः।धर्मेण पापमपनेति धर्मेणैव सुखं लभेत्॥”— पराशर स्मृति 1.24अर्थसभी लोकों में धर्म ही सर्वोच्च माना गया है; धर्म से पाप दूर होते हैं और धर्म से ही मनुष्य सुख प्राप्त करता है।4. नारद स्मृति“धर्मश्चार्थश्च कामश्च मोक्षश्च भरतर्षभ।धर्ममूलमिदं सर्वं धर्मे सर्वं प्रतिष्ठितम्॥”— नारद स्मृति 1.4अर्थधर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — ये सब धर्म पर आधारित हैं, और धर्म से ही मनुष्य का कल्याण और सुरक्षा होती है। इन स्मृतियों का सार यही है कि धर्म और ईश्वर की शरण मनुष्य को पाप, शत्रु और कष्टों से बचाकर कल्याण की ओर ले जाता है।“स नः पर्षदति द्विषः” (ऋग्वेद 10.187.5) का भाव है कि परमात्मा मनुष्य को शत्रुओं, पापों और कष्टों से बचाकर पार करे। नीति-ग्रन्थों में  प्रमाण1. चाणक्य नीति“धर्मेण कुलमुत्तमम्।धर्मेण लभते सर्वं धर्मसारमिदं जगत्॥”— चाणक्य नीति 1.15अर्थधर्म से ही मनुष्य विजय प्राप्त करता है, धर्म से ही कुल की उन्नति होती है और धर्म से सब प्रकार का कल्याण मिलता है।2. भर्तृहरि नीति शतक“विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमासदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः।यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौप्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम्॥”— नीति शतक 63अर्थमहान पुरुषों में स्वभाव से ही यह गुण होते हैं— संकट में धैर्य, उन्नति में क्षमा, सभा में वाणी की कुशलता और युद्ध में पराक्रम; इन्हीं गुणों से वे संकटों पर विजय पाते हैं।3. विदुर नीति (महाभारत उद्योग पर्व)“धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः।”— विदुर नीति (उद्योग पर्व)अर्थजो मनुष्य धर्म से रहित है वह पशु के समान है; धर्म का पालन ही मनुष्य को संकटों और पतन से बचाता है।4. हितोपदेश“सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात्न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।प्रियं च नानृतं ब्रूयात्एष धर्मः सनातनः॥”— हितोपदेश 1.48अर्थमनुष्य को सत्य और प्रिय वचन बोलना चाहिए, अप्रिय सत्य या असत्य प्रिय वचन नहीं बोलना चाहिए; यही सनातन धर्म है जो मनुष्य को दुःख और शत्रुता से बचाता है। इन नीति-ग्रन्थों का सार यही है कि धर्म, सत्य, धैर्य और सदाचार मनुष्य को शत्रुओं और कष्टों से बचाकर विजय और कल्याण की ओर ले जाते हैं।नीचे आर्ष तथा नीति-ग्रन्थों से ऐसे प्रमाण दिए जा रहे हैं जिनका भाव है कि धर्म, ईश्वर-स्मरण और सदाचार मनुष्य को संकटों, शत्रुओं और दुःखों से बचाते हैं।1. पंचतंत्रश्लोक“धर्मो रक्षति रक्षितः।”— पंचतंत्र 1.20 (प्रचलित नीति वचन)अर्थजो मनुष्य धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है, और उसे संकट तथा शत्रुओं से बचाता है।2. योग वशिष्ठ“चित्तमेव हि संसारस्तत्प्रयत्नेन शुद्धयेत्।यच्चित्तस्तन्मयो भवति गुह्यमेतत्सनातनम्॥”— योग वशिष्ठ, वैराग्य प्रकरणअर्थमन ही संसार का कारण है; इसलिए मन को शुद्ध करने का प्रयत्न करना चाहिए। मन शुद्ध होने पर मनुष्य दुःख और बन्धनों से मुक्त हो जाता है।3.(क) वाल्मीकि रामायण“धर्मो हि तेषां बलवान् नृपाणांयेषां स धर्मो न जहाति कदाचित्।”— अयोध्या काण्ड (प्रसिद्ध नीति वचन)अर्थजिन राजाओं और मनुष्यों के साथ धर्म रहता है, वही उनका सबसे बड़ा बल होता है और वही उन्हें संकटों से बचाता है।3(ख)वाल्मीकि रामायण“धर्मादर्थः प्रभवति धर्मात् प्रभवते सुखम्।धर्मेण लभते सर्वं धर्मसारमिदं जगत्॥”— अयोध्या काण्ड 3.9 (प्रचलित पाठ)अर्थधर्म से अर्थ और सुख उत्पन्न होते हैं; धर्म से ही मनुष्य सब कुछ प्राप्त करता है। इसलिए संसार का सार धर्म ही है।1(क). गर्ग संहिता“कृष्णाश्रयः सदा लोकेन भयं विद्यते क्वचित्।तस्य सर्वाणि कार्याणिसिद्धिं यान्ति न संशयः॥”— गर्ग संहिता, गोलोक खण्ड 12.36अर्थजो मनुष्य भगवान कृष्ण की शरण में रहता है, उसे संसार में किसी प्रकार का भय नहीं रहता और उसके सभी कार्य सिद्ध हो जाते हैं।1(ख) गर्ग संहिता“नामस्मरणमात्रेणनश्यन्ति सकला भयाः।”— गर्ग संहिता, वृन्दावन खण्ड 5.18अर्थभगवान के नाम के स्मरण मात्र से ही सभी भय और संकट नष्ट हो जाते हैं।अध्यात्म रामायण1(क)“रामं भजे शरण्यं तंभक्तानां भयहारिणम्।”— अध्यात्म रामायण, अयोध्या काण्ड 2.15अर्थमैं उस भगवान राम की शरण लेता हूँ जो भक्तों के भय और दुःख को दूर करने वाले हैं।1(ख)“रामनाम परं ब्रह्मसर्वपापप्रणाशनम्।”— अध्यात्म रामायण, उत्तर काण्ड 6.32अर्थभगवान राम का नाम परम ब्रह्म है, जो सभी पापों और दुखों को दूर करने वाला है।-------+--------+---------+--------; है