चलो दूर कहीं..! - 25 Arun Gupta द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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चलो दूर कहीं..! - 25

चलो दूर कहीं.. 25

सुबह के लगभग 7 बज रहे थे। दिल्ली के सूनी सड़कों पर इक्का-दुक्का वाहन आ जा रहे थे। बीते रात हुई बारिश से मौसम सुहाना था, इसलिए वैसे लोग जो दिल्ली के दमघोंटू आबोहवा से मार्निंग वॉक से परहेज़ करते थे आज अच्छी खासी तादाद में सड़कों के फूटपाथ पर टहल रहे थे।

जब रोहन ने एक मोड़ से प्रतीक्षा के घर जाने वाली गली में टर्न लिया तो अनायास ही प्रतीक्षा की धड़कनें बढ़ गई.. ये वही गली था जहां उसका बचपन बीता था,उस गली का ऐसा कोई घर न था जिससे वो वाकिफ न थी, लेकिन आज वो गली अनजानी सी प्रतीत हो रही थी, उसके स्मृति में एक धुंधली सी तस्वीरें चल रही थी,लाख कोशिश के बाद भी उसे कुछ भी स्पष्ट समझ नहीं आ रहा था। "आखिर मुझे इन गलियों और चौबारों की याद क्यों नहीं आ रही है?"सोचते ही उसने रोहन से पूछा," रोहन ये तो मेरे घर जाने वाली गली है न..?" 

"हां.. क्यों तुम्हें याद नहीं है..?" 

"न जाने क्यों मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है..?" प्रतीक्षा बोल ही रही थी कि रोहन ने गाड़ी रोकते हुए कहा,"अब ये मत कहना कि तुम अपना घर भी भूल गई हो ..?" 

प्रतीक्षा गाड़ी के अंदर से ही झांककर देखते हुए बोली,"सच में रोहन घर आ गया क्या..? लेकिन यहां इतना सन्नाटा क्यों है?" 

रोहन ने गाड़ी से नीचे उतरते हुए कहा," हां बाबा तुम्हारा घर आ गया..अब नीचे उतरो भी..!" 

रोहन के बातों को सुनकर सभी नीचे उतरे तब तक रोहन ने जाकर दरवाजा खटखटाया, थोड़ी देर में प्रतीक्षा के पिता कमलनाथ ने दरवाजा खोला और दरवाजे पर रोहन को देखकर आश्चर्य से पूछा," रोहन बेटा, इतनी सुबह-सुबह सब कुशल मंगल तो है..?"

" हां.. हां.. अंकल सब कुशल मंगल है ! दरअसल अंकल आपके लिए एक सरप्राइज है..!"

" अब इस उम्र में बस एक ही सरप्राइज की तमन्ना है बेटा कि ऊपर वाला जितना जल्दी हो उठा ले..अब जीने की मन में कोई तमन्ना नहीं है ..! ईश्वर से बस यही प्रार्थना है कि जितना जल्दी हो उठा ले..वैसे भी प्रतीक्षा के जाने के बाद तो हम जिंदा लाश बन गए हैं.. ये सूना घर काटने को दौड़ता है..! तुम जाओ बेटा.. हमें हमारे हाल पर छोड़ दो.. हमें कोई सरप्राइज नहीं चाहिए..!" कहकर कमलनाथ ने दरवाजा बंद करना चाहा ही था कि उसके कानों से एक चिरपरिचित स्वर टकराया,"बापू..!" 

उसके हाथ ठिठके, आंखों में हरक़त हुई और उन बूढ़ी आंखों में एक उम्मीद की किरण जगी.. उसने इधर उधर निहारा उसे कुछ नजर नहीं आया तो वह इसे भ्रम समझ कर जैसे ही दरवाजे के पट को बंद करना चाहा वैसे ही जोर से "बापू" चिल्लाते हुए प्रतीक्षा दौड़कर उसके सामने प्रकट हो गई..! अपने आंखों के सामने मृत प्रतीक्षा को साक्षात देखकर उसे अपने आंखों पर विश्वास न हुआ, उसने अपने हथेलियों से आंखों को रगड़ते हुए देखा लेकिन हर बार उसके आंखों के सामने हंसती मुस्कुराती प्रतीक्षा खड़ी थी।

उन्हें ऐसे घूरते देख कर प्रतीक्षा के सब्र का बांध टूट गया वह दौड़कर अपने बापू से लिपट गई और रोते हुए बोली,"बापू.. मैं वापस आ गई बापू..!" 

कमलनाथ हैरान परेशान था, उसे समझ नहीं आ रहा था कि ये हकीकत है या वह कोई सपना देख रहा है, कुछ देर बाद जब उसे एहसास हुआ कि सही में प्रतीक्षा उसके सीने से लग कर बिलख रही है तब उसने उसके माथे पर हाथ फेरते हुए कहा," चुप हो जा मेरी बेटी..अब यहां आ गई है न ,अब तुम्हें मैं कोई तकलीफ़ नहीं होने दूंगा..चल घर के अंदर चल..!" 

कहकर वे रोहन से मुखातिब होते हुए बोले,"सच में रोहन बेटा तूने मेरे जीवन का सबसे बड़ा सरप्राइज दे दिया.. मुझे जीने की उम्मीद दे दिया.. भगवान तुम्हारा भला करे..!

" मैं तो सिर्फ एक माध्यम बना अंकल लेकिन प्रतीक्षा को यहां तक लाने का श्रेय अनाह को जाता है.. इसके ही कारण प्रतीक्षा यहां आ पाई है..!"

रोहन अभी बोल ही रहा था कि कमलनाथ ने कहा," कहां है अनाह.. जिसने मेरे अंधेरे जीवन में रोशनी फैलाया.. कौन है वो देवदूत..?"

रोहन ने अपना चेहरा छिपा रहे अनाह की ओर इशारा करते हुए कहा," वो देवदूत ये है अंकल..!" 

कमलनाथ तुरंत उसके पास पहुंचा और उसकी विचित्र बनावट को देखकर कहा,"तुम कौन हो भाई.. मुझपर ये उपकार करने के लिए मैं तुम्हारा हमेशा ऋणी रहुंगा....!" 

"ऐसी कोई बात नहीं है अंकल ये तो मेरा फ़र्ज़ था..!" अनाह ने हाथ जोड़ते हुए कहा तो कमलनाथ बोले," आज के समय में लोगों को अपना फ़र्ज़ कहां याद रहता है भाई..!

उन्होंने अनाह के हाथ को पकड़ कर उससे और प्रतीक्षा से एक साथ कहा,"चलो घर के अंदर चलो..!


"मेरे साथ कुछ और लोग भी हैं बापू..!" 

"अरे कोई बात नहीं..जितने भी लोग हैं सभी को बुला ले..!" कमलनाथ ने गर्व से कहा तो प्रतीक्षा उनसे अलग हुई और रोहन को मदद करने के लिए शुक्रिया बोल कर बिदा की फिर अनाह, रवि और सुमी को लेकर घर के अंदर दाखिल होते ही पूछी," मां कहां है बापू..?" 

कमलनाथ ने प्रतीक्षा के इस प्रश्न का जबाब न देकर सभी से कहा,"आओ तुम सब यहां बैठो.. मैं अभी आया..!" कहकर वह घर के अंदर दाखिल हुआ तो प्रतीक्षा उसके साथ अंदर जाते हुए रुआंसे स्वर में बोली,"बताओ न बापू मां कहां है..?" 

इस बार उसने प्रतीक्षा के हाथ को पकड़ कर खींचते हुए एक कमरे के सामने ले जाकर खड़ा कर दिया..! वह एक अंधेरा कमरा था, धुंधली रोशनी में उसे कुछ स्पष्ट दिखाई नहीं दे रहा था, कमरे के अंदर से एक विचित्र प्रकार की बदबू आ रही थी..उस कमरे की स्थिति और बदबू से उसकी सांसें अटकी हुई थी। उसे आभास हो गया था कि इसी कमरे में उसकी मां है। मां की एक अनुपम छवि उसके मन मस्तिष्क में था।

वह बेधड़क कमरे के अंदर चली गई और बंद खिड़की को खोली तो कमरा प्रकाश से जगमगा उठा.. और तभी उसकी नजर खाट पर लेटी हुई अपनी मां पर पड़ी तो वह सिहर उठी..भरा पुरा मांसल शरीर गलकर हड्डियों के ढांचा में तब्दील हो गया था..! धंसी हुई आंखें बंद थी,मुंह में मक्खियां भिनभिना रही थी..! बिछावन और चादर इतने गंदे थे मानो कीचड़ में लपेटे हुए हों..! उनकी ये दुर्दशा देख उसकी आंखों से आंसूओं की धारा बह रही थी..वह कुछ देर तक हतप्रभ उन्हें देखती रही फिर घुटनों के बल उसके माथे के पास बैठ कर मस्तक को सहलाते हुए रूआंसे स्वर में बोली," मां..!" 

"मां..!" सुनते ही उसकी बंद आंखें खुली और भौंचक्के सी कुछ देर उसे निहारती रही फिर न जाने उसके बेजान शरीर में कहां से शक्ति आई,वह एक झटके में उठ बैठी और प्रतीक्षा के हाथों को पकड़ कर थरथराते स्वर में बोली,"तू आ गई प्रतीक्षा बेटी.. मुझे विश्वास था तू जरुर आएगी.. देवी मां ने मेरी प्रार्थना सुन ली..अब मैं चैन से मर सकूंगी..!" 

                                               क्रमशः...