कर्मजली कोख... - 4 kalpita द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
  • Muhabbat Ek Sabaq - 17

    "ठीक है प्रॉमिस नही बताउंगी किसी को भी ,आप बताएं तो बात क्या...

  • अनाथ - अध्याय 5

    सुबह की पहली किरणें अभी जंगल की ऊँची पहाड़ियों पर पड़नी शुरू...

  • आत्मीय सुख

    ऋगुवेद सूक्ति--(२०) की व्याख्या "कृत्वा चेतिष्ठो विश्वार्म्भ...

  • मंदिर में तुम - 10

    कुछ दिनों बाद…सब कुछ शांत हो चुका था…खतरा खत्म…डर खत्म…अब…सि...

  • प्रकृति के चमत्कार

    प्रकृति के चमत्कार(लगभग 2000 शब्दों की प्रेरणादायक हिन्दी कह...

श्रेणी
शेयर करे

कर्मजली कोख... - 4

सास ने अपनी सूखी, कठोर आँखें उठाकर
सीधे साजिया की तरफ देखा।
कमरे की हवा अचानक और भारी हो गई।
“अगर रेशमा को इस घर में रहना है…”
वह धीमी मगर पत्थर जैसी आवाज़ में बोली,
“तो हमारे बेटे का निकाह
तुम्हारी छोटी बेटी साजिया से होगा।”
साजिया का चेहरा एकदम सफेद पड़ गया।
“वंश तो बढ़ाना ही पड़ेगा,”
सास ने बिना रुके कहा,
“घर का चिराग चाहिए हमें।
रेशमा नहीं दे सकती…
तो उसकी बहन देगी।”
रेशमा के अब्बू अवाक खड़े रह गए।
सौतेली माँ ने घबराकर साजिया का हाथ पकड़ लिया।
“और अगर यह मंजूर नहीं…”
सास ने दरवाज़े की तरफ इशारा किया,
“तो अभी इसी वक्त सब इस घर से निकल जाओ।
हमारा बेटा अपनी जिंदगी यूँ बरबाद नहीं करेगा।”
पूरा कमरा जैसे पत्थर का हो गया।
साजिया की आँखें भर आईं।
वह रेशमा से पांच साल छोटी  थी। और कॉलेज में पढ़ रही थी उसने अभी ठीक से जिंदगी देखी भी नहीं थी।
उसने डरते हुए एक बार आसिफ की तरफ देखा।
शायद उम्मीद थी
कि वह कुछ बोलेगा…
इंकार करेगा…
जिसे हमेशा जीजा की नजर से देखा वो अभी 
कहेगा कि यह रिश्ता नहीं, सौदा है।

लेकिन आसिफ चुप बैठा रहा।
उसकी खामोशी ने
साजिया के भीतर आखिरी भरोसा भी तोड़ दिया।
रेशमा ने धीरे से अपनी बहन का हाथ थाम लिया।
उसकी उंगलियाँ बर्फ जैसी ठंडी थीं।
कुछ पल बाद
वह टूटी हुई आवाज़ में बोली —
“नहीं…”
सबकी नज़र उसकी तरफ उठ गई।
“मेरी बर्बाद किस्मत का बोझ
मैं अपनी बहन पर नहीं डालूँगी।”
उसने साजिया को अपने पीछे कर लिया।
“जिस घर में एक औरत की कोख की कीमत
उसकी इंसानियत से ज्यादा हो…
वहाँ दूसरी लड़की को धकेलना
जुल्म होगा।”
पहली बार
रेशमा की आवाज़ में दर्द से ज्यादा
आत्मा का टूटना सुनाई दे रहा था।
रेशमा चाहे उसकी सौतेली बहन थी पर उसे बहुत चाहती थी ।

सात साल पहले जब आसिफ ने पहली बार रेशमा को लखनऊ में देखा था,
तो उसकी खूबसूरती पर दिल हार बैठा था।
बड़ी-बड़ी आँखें, मासूम चेहरा, और बातों में ऐसी नरमी
कि आसिफ ने उसी पल उसे अपनी जिंदगी बनाने का फैसला कर लिया था।
दिल्ली के खानदानी घर से रिश्ता आया था,
इसलिए रेशमा के अब्बू ने भी बिना देर किए
झट मंगनी, पट निकाह कर दिया।
शुरुआत के दो साल
किसी खूबसूरत ख्वाब जैसे बीते।
मोहब्बत, हँसी, घूमना, छोटे-छोटे सपने…
रेशमा को लगता था
उसकी जिंदगी मुकम्मल हो चुकी है।
फिर पहला बेटा पैदा हुआ…
बिना साँसों के।
उस दिन दोनों बुरी तरह टूटे थे,
लेकिन एक-दूसरे का सहारा बन गए।
आसिफ रात-रात भर जागकर
रेशमा को संभालता रहता।
उसे सीने से लगाकर कहता —
“हम फिर कोशिश करेंगे…
अल्लाह हमें खाली नहीं लौटाएगा।”
लेकिन दूसरे…
और फिर तीसरे बच्चे के बाद
घर के तेवर बदलने लगे।
सास की बातों में ताने घुल गए,
नंद की नजरों में तिरस्कार उतर आया।
फिर भी आसिफ
हर बार ढाल बनकर रेशमा के आगे खड़ा रहा।
लेकिन चौथे बच्चे के बाद…
शायद उसके भीतर का पति
पूरी तरह मर गया था।

साजिया, रेशमा की सौतेली छोटी बहन थी।
उसे हमेशा अपनी बहन की शानो-शौकत भरी जिंदगी देखकर रश्क होता था।
दिल्ली का बड़ा घर, अच्छा रहन सहन इतना मोहब्बत करने वाला पति…
सब किसी कहानी जैसा लगता था।
लेकिन उसने सपने में भी नहीं सोचा था
कि उसी घर की दीवारों के भीतर
उसकी बहन इतनी बेरहमी से टूट जाएगी।
जब मौलवी साहब का फैसला आया,
तो साजिया की माँ और अब्बू ने भी चुपचाप हामी भर दी।
एक तरफ आसिफ का खानदानी होना,
दूसरी तरफ रेशमा की जिम्मेदारी से बचने की मजबूरी।
कभी-कभी गरीबी
इंसान से रिश्तों की कीमत भी छीन लेती है।
और रेशमा…
जिसने अभी-अभी अपना बच्चा खोया था,
अब अपना शौहर भी खोने जा रही थी।
वह बस जिंदा लाश बनकर
अपनी जिंदगी पर खुदा का कहर उतरते देख रही थी।
एक हफ्ते के भीतर
साजिया और आसिफ का निकाह पढ़ा गया।
जिस घर की कभी रेशमा मालकिन थी,
उसी घर के बाहर वाले आँगन में बने
एक छोटे से कमरे में
अब उसे जगह दी गई।
लोग कहते हैं
वक्त बड़े से बड़ा घाव भर देता है।
लेकिन यह पूरी सच्चाई नहीं है।
कुछ घाव भरते नहीं…
बस हर दिन थोड़ा और गहरे होते जाते हैं।
धीरे-धीरे रेशमा का मानसिक संतुलन बिगड़ने लगा।
वह एक फर वाले छोटे गुड्डे को
अपना बच्चा समझकर सीने से लगाए घूमती रहती।
कभी उसे कपड़े पहनाती,
कभी उसकी आँखों में देखकर मुस्कुराती,
तो कभी दूध की बोतल उसके मुँह से लगा देती…
जैसे उसके भीतर की माँ
अब भी किसी बच्चे को जिंदा रखने की कोशिश कर रही हो।
आसिफ ने उसकी तरफ से
ऐसा मुँह मोड़ लिया था
मानो वह कभी उसकी जिंदगी में थी ही नहीं।
और साजिया…
कभी-कभी बाहर बैठी
रेशमा को उस गुड्डे के साथ खेलते देखती
और सोचती —
“आपा यहाँ क्यों अटकी हुई हैं…?
सब अपनी जिंदगी में आगे बढ़ गए…
वो क्यों नहीं बढ़ जातीं…?”
......to be continued