अनाथ - अध्याय 3 Dev Kumar Rawat द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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अनाथ - अध्याय 3

उस रात...

आसमान पूरी तरह शांत था।

बारिश रुक चुकी थी, लेकिन हवा में अब भी मिट्टी की भीनी-सी खुशबू तैर रही थी। अनाथालय के सभी बच्चे गहरी नींद में सो चुके थे। पूरे परिसर में सिर्फ़ घड़ी की टिक-टिक सुनाई दे रही थी।

लेकिन...

मानव की आँखों में नींद नहीं थी।

वह स्टोर रूम के उसी कोने में बैठा था, जहाँ उसे वह रहस्यमयी डायरी मिली थी। दिनभर की मार, अपमान और दर्द के बावजूद उसके मन में सिर्फ़ एक सवाल घूम रहा था—

"मैं कौन हूँ?"

उसने एक बार फिर डायरी का आख़िरी पन्ना खोला। जैसे ही उसने पन्ना पलटा, उसके बीच से एक पुराना पीला लिफाफा नीचे गिर पड़ा।

मानव ने उसे उठाया।

लिफाफे पर धूल जमी हुई थी, लेकिन उस पर लिखे शब्द अब भी साफ़ दिखाई दे रहे थे—

"सिर्फ़ उसी बच्चे के लिए... जिसके गले में चाँदी का त्रिशूल हो।"

मानव का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा।

उसने अपने गले में हाथ लगाया।

वही पुराना चाँदी का त्रिशूल...

जिसे वह बचपन से पहनता आ रहा था।

आज तक उसने कभी नहीं सोचा था कि इस छोटे-से लॉकेट का उसकी ज़िंदगी से कोई गहरा संबंध हो सकता है।

काँपते हाथों से उसने लिफाफा खोला।

अंदर एक पुरानी तस्वीर थी।

तस्वीर में एक मुस्कुराता हुआ दंपति दिखाई दे रहा था।

उनकी गोद में छह महीने का एक छोटा बच्चा था।

मानव की नज़र सीधे उस बच्चे के गले पर गई।

वहाँ भी वही त्रिशूल वाला लॉकेट था।

उसकी साँसें तेज़ हो गईं।

तस्वीर के पीछे किसी ने जल्दबाज़ी में लिखा था—

"अगर हमारा बेटा ज़िंदा है... तो उसे सच ज़रूर बताना।"

तस्वीर के साथ एक छोटा-सा नक्शा भी था।

उस नक्शे में शहर से लगभग पचास किलोमीटर दूर स्थित एक पुरानी हवेली पर लाल रंग का निशान बना था।

नीचे सिर्फ़ तीन शब्द लिखे थे—

"सच यहीं मिलेगा।"

मानव देर तक उस नक्शे को देखता रहा।

उसके मन में पहली बार उम्मीद जगी।

क्या उसके माता-पिता सचमुच ज़िंदा थे?

या यह उनके अतीत की आख़िरी निशानी थी?

उसने डायरी के अगले पन्ने पलटे।

वहाँ कुछ नाम लिखे थे...

कुछ तारीखें...

और एक वाक्य, जिसने उसके रोंगटे खड़े कर दिए—

"जिस दिन सच सामने आएगा, उसी दिन कई नकाब उतरेंगे।"

उसी समय...

स्टोर रूम के बाहर किसी के कदमों की आवाज़ सुनाई दी।

मानव ने तुरंत तस्वीर, नक्शा और लिफाफा अपनी शर्ट के अंदर छिपा लिया।

दरवाज़ा धीरे-धीरे खुला।

अंदर उसका सबसे करीबी दोस्त छोटू आया।

उसका चेहरा डरा हुआ था।

"मानव..."

"मैंने अभी भैरव सिंह को कुछ लोगों से बात करते सुना है।"

मानव तुरंत खड़ा हो गया।

"क्या कहा उसने?"

छोटू की आवाज़ काँप रही थी।

"वो कह रहा था कि अब तू बड़ा हो गया है..."

"अगर तू ज़्यादा दिन यहाँ रहा तो सब कुछ बर्बाद हो जाएगा।"

"और..."

"उन्होंने कहा कि तुझे हमेशा के लिए रास्ते से हटाना होगा।"

कुछ पल के लिए पूरा कमरा बिल्कुल शांत हो गया।

मानव ने गहरी साँस ली।

अब उसे समझ आ चुका था कि उसकी ज़िंदगी कोई साधारण कहानी नहीं है।

किसी को उससे डर था...

और वह डर उसके जन्म से जुड़ा हुआ था।

उसने धीरे से अपनी मुट्ठी बंद की।

"अगर लोग मुझे सच जानने से रोकना चाहते हैं..."

"तो इसका मतलब सच बहुत बड़ा है।"

छोटू ने घबराकर पूछा—

"अब तू क्या करेगा?"

मानव की आँखों में पहली बार डर की जगह दृढ़ निश्चय दिखाई दिया।

"मैं यहाँ एक पल भी नहीं रुकूँगा।"

"मैं उस हवेली तक जाऊँगा..."

"अपने माता-पिता के बारे में सब जानूँगा..."

"और यह भी पता लगाऊँगा कि आखिर मेरा दुश्मन कौन है।"

उसने डायरी अपनी पोटली में रखी।

तस्वीर को सीने से लगाया।

और खिड़की से बाहर आसमान की ओर देखा।

बादलों के बीच से चाँद निकल चुका था।

मानो वह भी उसके नए सफ़र का गवाह बनना चाहता हो।

मानव नहीं जानता था कि जिस रास्ते पर वह कदम रखने जा रहा है...

वहाँ हर मोड़ पर खतरा उसका इंतज़ार कर रहा है।

लेकिन अब लौटना संभव नहीं था।

क्योंकि उसकी तलाश सिर्फ़ अपने परिवार की नहीं...

बल्कि अपनी असली पहचान की थी।

और यही तलाश उसकी ज़िंदगी को हमेशा के लिए बदलने वाली थी।