सुबह की पहली किरणें अभी जंगल की ऊँची पहाड़ियों पर पड़नी शुरू ही हुई थीं। अर्जुन राठौर की काली एसयूवी विशाल लोहे के गेट के सामने आकर रुकी। गेट पर बड़े सुनहरे अक्षरों में लिखा था—
"अग्निवीर आश्रम"
गेट के दोनों ओर खड़े सुरक्षा कर्मियों ने अर्जुन को देखते ही सलामी दी। भारी-भरकम गेट धीरे-धीरे खुला और कार अंदर प्रवेश कर गई।
मानव ने खिड़की से बाहर देखा।
यह कोई साधारण आश्रम नहीं था।
चारों ओर घने पेड़, साफ़-सुथरे रास्ते, अनुशासित वातावरण और दूर तक फैले प्रशिक्षण मैदान दिखाई दे रहे थे। कुछ युवा दौड़ लगा रहे थे, कुछ निशानेबाज़ी का अभ्यास कर रहे थे, जबकि कुछ कंप्यूटर लैब की ओर जा रहे थे।
मानव ने आश्चर्य से पूछा—
"क्या यह सचमुच आश्रम है?"
अर्जुन हल्के से मुस्कुराए।
"यह उन लोगों का घर है, जिन्हें ज़िंदगी ने बहुत जल्दी बड़ा होने पर मजबूर कर दिया।"
कार मुख्य भवन के सामने रुकी।
अर्जुन मानव को अपने साथ अंदर ले गए। दीवारों पर देश के महान वैज्ञानिकों, समाज सुधारकों और वीर सैनिकों की तस्वीरें लगी थीं।
अर्जुन बोले—
"यहाँ बच्चों को सिर्फ़ पढ़ाया नहीं जाता। यहाँ उन्हें अपने डर पर जीतना, सही निर्णय लेना और दूसरों की रक्षा करना सिखाया जाता है।"
उसी समय लगभग सत्रह वर्ष का एक युवक वहाँ आया।
"गुरुजी, आपने बुलाया था?"
अर्जुन ने कहा—
"आरव, यह मानव है। आज से यह भी हमारे परिवार का हिस्सा है।"
आरव मुस्कुराया और हाथ बढ़ाया।
"स्वागत है दोस्त।"
मानव ने पहली बार किसी अनजान व्यक्ति की आँखों में अपनापन देखा।
कुछ देर बाद आश्रम के सभी विद्यार्थी प्रार्थना स्थल पर एकत्र हुए।
अर्जुन मंच पर खड़े हुए और बोले—
"आज से हमारे बीच एक नया साथी आया है। याद रखो, यहाँ किसी की पहचान उसके अतीत से नहीं, उसके कर्मों से होती है।"
सभी ने तालियाँ बजाईं।
मानव के मन का बोझ कुछ हल्का हो गया।
उसे पहली बार लगा कि शायद यह जगह उसकी नई शुरुआत बन सकती है।
दोपहर में आरव ने पूरे आश्रम का परिचय कराया।
वहाँ पुस्तकालय था, जहाँ हज़ारों किताबें रखी थीं।
एक आधुनिक प्रयोगशाला थी।
मार्शल आर्ट का विशाल हॉल था।
और सबसे अलग...
एक बंद इमारत, जिसके बाहर लिखा था—
"अनुमति के बिना प्रवेश वर्जित।"
मानव ने पूछा—
"उस इमारत में क्या है?"
आरव कुछ पल चुप रहा।
फिर बोला—
"उसके बारे में सिर्फ़ गुरुजी जानते हैं। हममें से किसी को अंदर जाने की अनुमति नहीं है।"
शाम को अर्जुन ने मानव को अपने कार्यालय में बुलाया।
कमरे में प्रवेश करते ही मानव की नज़र एक बड़ी अलमारी पर पड़ी, जिसमें दर्जनों गोपनीय फ़ाइलें रखी थीं।
अर्जुन ने गंभीर स्वर में कहा—
"मानव, अब तुम्हें यहाँ नई ज़िंदगी मिलेगी। लेकिन एक बात हमेशा याद रखना..."
"तुम्हारे दुश्मन यह नहीं जानते कि तुम यहाँ हो।"
"और हम चाहते हैं कि उन्हें अभी यह पता भी न चले।"
मानव ने सिर हिलाया।
"मैं समझ गया।"
अर्जुन ने मेज़ की दराज़ से एक नई डायरी निकाली।
"आज से हर दिन तुम इसमें अपने अनुभव लिखोगे।"
"क्यों?"
मानव ने पूछा।
अर्जुन मुस्कुराए।
"क्योंकि जो इंसान अपने हर कदम का हिसाब रखता है, वह कभी रास्ता नहीं भूलता।"
रात गहरा चुकी थी।
पूरा आश्रम शांत था।
लेकिन अर्जुन अभी भी अपने कार्यालय में बैठे थे।
उन्होंने अलमारी खोली और सबसे नीचे रखी एक मोटी फ़ाइल बाहर निकाली।
फ़ाइल के ऊपर लाल अक्षरों में लिखा था—
"प्रोजेक्ट मानव – अत्यंत गोपनीय"
उन्होंने पहला पन्ना खोला।
उसमें मानव की बचपन की तस्वीर लगी थी।
नीचे एक पंक्ति लिखी थी—
"यदि यह बालक जीवित रहा, तो वर्षों पुराना षड्यंत्र उजागर हो सकता है।"
अर्जुन ने गहरी साँस ली।
उसी समय उनके मोबाइल पर एक अनजान नंबर से संदेश आया—
"हम जानते हैं कि लड़का अग्निवीर आश्रम पहुँच चुका है। अब उसे बचाकर दिखाइए..."
अर्जुन की आँखों में चिंता की लकीरें उभर आईं।
उन्हें समझ आ गया था...
दुश्मन उम्मीद से कहीं ज़्यादा करीब पहुँच चुका है।
क्रमशः...