अनाथ - अध्याय 1 Dev Kumar Rawat द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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अनाथ - अध्याय 1


"जिस दिन इंसान नहीं, किस्मत रोई थी..."

रात के ठीक बारह बजे...

आसमान जैसे अपना सारा दर्द धरती पर उँडेल रहा था। बिजली की हर कड़क के साथ पूरा शहर काँप उठता, और उसी बारिश में शहर के बाहर स्थित एक पुराने शिव मंदिर की सीढ़ियों पर एक नन्हा-सा बच्चा लगातार रो रहा था।

उसकी आवाज़ बहुत छोटी थी...

लेकिन शायद भगवान तक पहुँच रही थी।

मंदिर के सामने से दर्जनों लोग गुज़रे।

किसी ने एक नज़र देखा...

फिर अपनी छतरी सिर पर ठीक की और आगे बढ़ गया।

"किसी पाप की औलाद होगी..."

एक औरत ने घृणा से कहा।

"पुलिस के चक्कर में कौन पड़े..."

एक आदमी बुदबुदाया।

बच्चा रोता रहा...

बारिश उसे भिगोती रही...

और इंसानियत अपने दरवाज़े बंद करती रही।

उसी समय मंदिर का बूढ़ा पुजारी बाहर निकला।

उसने बच्चे को गोद में उठाया।

काँपते हाथों से उसके चेहरे पर जमी बारिश पोंछी।

उसकी आँखें भर आईं।

"बेटा..."

"जिस दुनिया ने तुझे जन्म लेते ही ठुकरा दिया है, एक दिन उसी दुनिया को तेरे सामने सिर झुकाना पड़ेगा।"

पुजारी ने उसका नाम रखा—

मानव
उसे क्या पता था...

कि यही मासूम बच्चा एक दिन दुनिया के सबसे खौफनाक साम्राज्य का मालिक बनेगा।


पंद्रह साल बाद...
"अरे ओ अनाथ...!"

पूरे अनाथालय में किसी की गूँजती हुई आवाज़ फैल गई।

एक दुबला-पतला लड़का फर्श साफ़ कर रहा था।

वही था...

मानव।

चेहरे पर मासूमियत...

आँखों में गहराई...

और माथे पर ऐसी चमक, जो किसी साधारण बच्चे में नहीं होती।

वह पढ़ाई में सबसे तेज था।

किसी भी किताब का एक पन्ना पढ़ लेता तो शब्द-शब्द याद हो जाता।

शतरंज में बड़े-बड़ों को हरा देता।

गणित के कठिन सवाल कुछ सेकंड में हल कर देता।

लेकिन...

किस्मत को शायद उसकी बुद्धि मंज़ूर नहीं थी।

अनाथालय का संचालक भैरव सिंह उसे बिल्कुल पसंद नहीं करता था।

क्योंकि जहाँ प्रतिभा होती है...

वहाँ जलन भी पैदा होती है।

"फिर से पहला नंबर आया?"

भैरव सिंह ने रिपोर्ट कार्ड उसके मुँह पर दे मारा।

"तुझे लगता है पढ़-लिखकर कलेक्टर बनेगा?"

"तेरी औकात क्या है, पता है?"

मानव चुप रहा।

"बोल...!"

भैरव ने डंडा उठाया।

धड़ाक...

पहला वार।

दूसरा...

तीसरा...

कमरे में मौजूद बाकी बच्चे काँप रहे थे।

लेकिन मानव...

न रोया...

न चीखा...

बस उसकी आँखें भैरव सिंह के चेहरे को याद कर रही थीं।

जैसे दिल नहीं...

दिमाग बदला लिख रहा हो।


उस रात...

बाकी बच्चे सो गए।

लेकिन मानव छत पर बैठा आसमान देख रहा था।

तभी उसका दोस्त छोटू उसके पास आया।

"तू हर बार मार खाकर भी रोता क्यों नहीं?"

मानव हल्का-सा मुस्कुराया।

"क्योंकि आँसू कमज़ोर लोगों का हथियार होते हैं..."

"और मैं कमज़ोर पैदा नहीं हुआ..."

"मुझे कमज़ोर बनाया गया है।"

छोटू कुछ समझ नहीं पाया।

लेकिन उस रात...

आसमान ने शायद उसकी बात सुन ली थी।


अगले दिन...
शहर के एक बड़े स्कूल के कुछ अमीर बच्चे अनाथालय घूमने आए।

वे कपड़े बाँट रहे थे...

मिठाइयाँ बाँट रहे थे...

और साथ ही...

गरीबी का मज़ाक भी उड़ा रहे थे।

एक लड़का मानव के सामने आया।

उसने पाँच सौ का नोट ज़मीन पर फेंका।

"ले..."

"उठा ले..."

"यही तेरी कीमत है।"

पूरा हॉल हँसी से गूँज उठा।

मानव कुछ सेकंड तक उस नोट को देखता रहा।

फिर...

उसने नोट उठाया...

सबको लगा वह पैसे रख लेगा।

लेकिन अगले ही पल...

उसने वही नोट उस लड़के के चेहरे पर फेंक दिया।

पूरा हॉल सन्न रह गया।

"भीख..."

मानव की आवाज़ पहली बार गूँजी।

"मैं भूखा रह सकता हूँ..."

"लेकिन बिक नहीं सकता।"


भैरव सिंह गुस्से से आग-बबूला हो गया।

उसने सबके सामने मानव को इतना पीटा कि वह बेहोश होकर ज़मीन पर गिर पड़ा।

लेकिन...

उस दिन एक बच्चा नहीं टूटा।

उस दिन...

उसके अंदर इंसानियत की आख़िरी साँस टूट गई।


बेहोश मानव के होंठ धीरे-धीरे हिले...

"आज तुम मुझे रुला रहे हो..."

"एक दिन ऐसा आएगा..."

"जब पूरी दुनिया..."

"मेरे नाम से काँपेगी।"

और उसी क्षण...

एक मासूम अनाथ की कहानी खत्म हुई।

एक खतरनाक तूफ़ान का जन्म हुआ।