दिल्ली जिमखाना क्लब Devendra Kumar द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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दिल्ली जिमखाना क्लब

दिल्ली जिमखाना क्लब

  दिल्ली  के बड़े  बड़े लोगों की जान और शान इस दिल्ली जिमखाना  क्लब के लगता है बुरे दिन आ गए हैं, पर यह तो एक दिन होना ही था.  संत कबीर ठीक ही कह गये है :-

‘सब दिन  होत ना एक समाना,

 एक दिन राजा रामचंद्र जी, चढ़ के जात विमाना  जी,

एक दिन उनको बनवास भयो, जंगल फिरत सयाना, सब दिन होत न एक समाना ’......  

 यह सब तो मनुष्य के जीवन में होता आया है, होता रहेगा मनुष्य ही नहीं और अन्य वस्तुओं में भी यह होता है, प्रकृति के नियमों से हम नहीं बच सकते चाहे कोई भी हो. जिमखाना क्लब के साथ भी यही तो हो रहा है. सब समय और सोच का फेर है. अंग्रेज़ चले गए थे पर अपनी  ब्राउन साहेब औलाद छोड़ गए थे. मेरे सबसे पहले बॉस थे कर्नल बी0 डी0 मल्होत्रा जो इसी अंग्रेजियत भरी नस्ल के थे, गोरे चिट्टे रोबदार पर्सनलिटी. काफी खूबसूरत लम्बी सफ़ेद  भव्य मूंछे. कोई भी देखता बिना प्रभावित हुए नहीं रह सकता था. क्लब और पार्टियों  के बेहद शौक़ीन. शायद फौज की गार्ड पलटन से थे जो मानी हुई है और एक समय आई.एम.ए. देहरादून के एडजुटेंट रह कर मेरी 25 वीं  बटालियन में आये थे. फौज से विदा होकर सीआरपी में, सुना था की कलकत्ता में रहते उन्होंने ज्योति बसु से भारी पंगा लिया था, और बटालियन को वहां से हट कर त्रिपुरा आना पड़ा था.  उन्होंने ही मुझे इस दिल्ली जिमखाना क्लब के अन्दर से  सबसे पहले दर्शन कराये थे जो अब तक दिमाग में चिपके पड़े हैं.  

इतनी रोबदार व खूबसूरत पर्सनलिटी के मालिक होते हुए भी उन्होंने जीवन में कभी शादी नहीं की थी या हुई नहीं थी, क्यों, यह तो पता नहीं पर मैंने  उस समय अपने से पहले कार्यरत बटालियन के अफसरों से सुना था कि उनकी  उनकी हम उम्र एक‘गर्ल फ्रेंड’ भी थी जो हिमाचल में किसी रियासत की राज कुमारी थी, उसने भी शादी नहीं की थी, वह कभी-कभी आकर उनके पास रहती थी और कर्नल साहेब भी अपनी छुट्टियाँ वहां उसी के साथ  बिताते थे. हो सकता है दोनों में पुराना प्रेम हो और शादी में रुकावट या विरोध के कारण दोनों ने शादी नहीं हो पाई और वे  फ्रेंड ही  बने रहे, ये सब अनुमान की बातें हैं, असली तो राम जाने या वे दोनों. ये सब पुरानी बातें हैं, हमें तो वे ही बटालियन के ‘माई बाप’ लगते थे, उन दिनों कमांडेंट की पोस्ट बहुत बड़ी जाती थी.

मैं अपनी तब की सीआरपी और अब की सीआरपीएफ में मध्यप्रदेश के नीमच नामक स्थान से अपनी बेसिक ट्रेनिंग करने के बाद पहली बार ही 25 बटालियन  अगरतला, त्रिपुरा में पहुंचा था. वहां पर बटालियन के सीओ की बड़ी  धाक व मिजाज़ की बात सुन जान कर थोडा भयभीत भी था. मैं वहां  कई दिन का ट्रेन के अंतिम  स्टेशन धर्मा नगर से बस का सफ़र करके थका मांदा शाम के समय बटालियन में पहुंचा था, थैंक गॉड, तब तक सीओ कर्नल बी डी मल्होत्रा बटालियन हेड क्वार्टर  से दूर त्रिपुरा के सीनियर अफसरों की कॉलोनी, कुंजवन के अपने निवास जा चुके थे. बटालियन के एडजुटेंट जे एस चौहान ने बताया कि मुझे अगले दिन  सी.ओ. साहेब के इंटरव्यू के लिए अच्छी तरह से तैयार रहना चाहिए. ताकीद किया कि मेरी यूनिफार्म स्मार्ट और ड्रिल बिलकुल दुरुस्त रहनी चाहिए, और सभी प्रश्नों के उत्तर केवल अंग्रेजी में देना है. वे पूरे ब्राउन साहेब हैं. वे सरकारी लेटर्स में भी अंग्रेजी की गलतियाँ देखते हैं और तभी उस पर साइन करते हैं जब सब तरह से त्रुटिहीन हो. उनकी मेज़ पर केवल एक पुस्तक ‘किंग्स इंग्लिश’ रहती थी

 फोर्सेज में बटालियन कमांडेंट को ‘टाइगर’ कहते हैं, मैंने भी आते समय आते देखा था कि उनके ऑफिस के बाहर बोर्ड  की तख्ती पर लिखा था ‘दि डेन’ अर्थात शेर की मांद. जान बूझ कर सबको और भी खोफ़ और डर दिखलाने के लिए ही यह कवायद की जाती होगी. बेचारे  सेकंड इन कमांड के ऑफिस के बाहर लेम्ब या मेमना लिखा देख कर थोड़ी हंसी भी आई थी. उसे ज्यादा ही कमज़ोर पशु का नाम दिया गया था. सेकंड इन  कमांड को ज्यादा ही कमज़ोर और निरीह शक्तिहीन क्यों समझा जाता था? क्या कमांडेंट के सामने वे मिमयाते हैं इसलिए. केवल कमांडेंट के गैर हाज़िर होने पर ही वे महत्वपूर्ण होते थे.

 अगले दिन मेरा इंटरव्यू  कहूं या पेशी  हुई थी. गनीमत हुई थी कि मेरा इंटरव्यू ठीक ठाक हो गया था. मैं टीटॉटलर हूँ यह उन्हें पसंद नहीं आया था. पहले शाम के डिनर के लिए मुझे आमंत्रित किया पर वेजीटेरियन और व्हिस्की सेवन न करने की जान मेरा बुलावा कैंसिल कर दिया था, जो उस समय मुझे अपमान से ज्यादा राहत लगा था.

 शुरू शुरू में तो उन्होंने  मेरे साथ बहुत सख्ती की,‘ओ.एल.क्यू. अर्थात ‘ऑफिसर लाईक क्व़ालिटी’ को और था मांजने को कहा. पोस्टिंग पर सबसे मुश्किल जगह भेजा पर कुछ दिनों बाद वे नरम पड़ गए थे. उनके हिसाब से वह मेरी एक ट्रेनिंग थी. मेरे बटालियन ज्वाइन करने के लगभग छः महीने बाद ही दिल्ली स्थित सीआरपी महानिदेशालय में उनका ट्रान्सफर हो गया था. उस समय ही मुझे एडजुटेंट चौहान ने बताया था की सीओ मल्होत्रा साहेब क्लब लाइफ के बेहद शौक़ीन हैं, अगरतला  में  भी एक ब्रिटिश टाइम का क्लब था वे  वहीँ नियमित रूप से जाते रहते थे. अगरतला के जाने माने लोग और रॉयल देब बर्मन के परिवार के सदस्य भी वहीँ मिलते रहते थे. वहां बस अंग्रेजियत का माहौल है. वह उनका दूसरा घर समझो. हाँ, वे जो खर्च करते थे अपनी जेब से करते थे किसी बटाo के फण्ड को छूते भी नहीं थे. सजा देने में विश्वास नहीं करते थे  सख्ती के बावजूद कर्नल मल्होत्रा को बटालियन के माई बाप की तरह दिल से प्यार करते थे. कहते थे कि  दिल के राजा हैं, सजा देने में विश्वास नहीं रखते. डरा कर काम करते  हैं किसी के पेट पर लात नहीं मारते. 

मेरे  बटालियन में आने के कोई छ महीने बाद ही उनका ट्रान्सफर आर्डर दिल्ली हो गया था. लोग उनके जाने से दुखी थे. उनके जाने के बाद हमारे दूसरे सी ओ आ गये थे. वे अंग्रेज़ जैसे  तो नहीं थे पर कई दूसरे मामलों में वे ज्यादा टेढ़े थे. उनकी आदतें अलग थी, वे कर्नल मल्होत्रा  की तरह दिलदार नहीं थे, उन्होंने अपने रहने के लिए बटालियन की एक कंपनी जो एक इलेक्ट्रोहाईडेल प्रोजेक्ट को सुरक्षा प्रदान कर रही थी, से बिल्डिंग मटेरियल उठवा कर अपने आराम  के लिए बटालियन हेड क्वार्टर में ही मकान बनवा लिया था. वे कर्नल मल्होत्रा जैसा सम्मान नहीं पा रहे थे.मेरी पूरी कंपनी वार्षिक रोटेशन में अगरतला एअरपोर्ट पर उसकी सिक्यूरिटी  के  लिए तैनात कर दी गयी थी. अगरतला एअरपोर्ट सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण था तथा ईस्ट पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ा टारगेट था.

1971 के आरम्भ से ही पूर्वी पाकिस्तान में काफी उथल पुथल शुरू हो गयी थी, पाक सैनिक शासक जन० टिक्का खां तथा बाद में जन० नियाजी ने जोर ज़बरदस्ती,तथा भीषण अत्याचार से जन-आन्दोलन को दबाना चाहा था, और जैसा सबको मालूम है कि पाकिस्तान ने ही पहले  हमला कर भारत से लड़ाई शुरू की थी. हम तैयार थे हमारे आर्मी चीफ जनरल मानेकशा के नेतृत्व में पाकिस्तान को ऐतहासिक  ज़बरदस्त धूल चटाई थी, पाकिस्तान के टुकड़े हो गए थे. पाक आर्मी को आत्म समर्पण करना पड़ा था.

  मेरी कंपनी ने लड़ाई में बहुत ही अच्छा काम किया था और मुझे बहुत ही बेहद कम उम्र में सराहनीय सेवा के लिए पुलिस पदक मिला था. यह जान कर सख्त और अंग्रेजदां कर्नल मल्होत्रा जो अब महानिदेशालय में पोस्टेड थे, बेहद खुश ही नहीं हुए बल्कि मुझे साथ लेकर डी.जी. से मिलवाया, बाद में अन्य आला अफसरों और समारोह में मौजूद बड़े लोगों से स्वयं साथ चल कर मिलवाया  ये सब बहुत बड़ी सम्मान व प्रसन्नता की बात थी. सबसे कह रहे थे “ये मेरा बेटा है, मेरी बटालियन का, मैंने इसे ट्रेन किया था.”

 मेरे दिल्ली आने पर वे मुझे लंच के लिए उस  इलीट  दिल्ली जिमखाना क्लब लेकर गए जो आजकल देश में चर्चा का बहुत बड़ा विषय है. मैं वहां क्लब में बहुत  सप्रयास संयत रहने की  भरपूर कोशिश कर रहा था, वह मुझे लग ही दुनिया लग रही थी.                                                                                                        

कर्नल मल्होत्रा वहां पूरी तरह से सहज थे, वहां के बैरा, बारटेंडर तक सब उनको जानते थे, पूरा आदर दे रहे थे, उन्हें यूनिफार्म पहने एक मेजर जनरल ने उठ कर तपाक से ‘हग’ किया और ‘यार बन्नी मल्होत्रा’ बोला और कहा “तुम तो बिलकुल भी नहीं बदले, हमेशा की तरह वही रोबदार और ज़बरदस्त प्रजेंस.” पता चला कि दोनों अब की  दि  रेजिमेंट ऑफ़ गार्ड के हैं, सेकंड वर्ल्ड वॉरमें बर्मा मोर्चे पर साथ थे, उस समय उन दोनों की पलटन राजपूत रेजिमेंट की फर्स्ट बटालियन थी. दोनों ने ‘जिन’ ली और मेरे लिए जूस मंगाया था. एक दो और भी उनके पुराने साथी उठ कर उनके पास आ गए थे. पर उन्होंने ज़रा भी मुझे असहज या उपेक्षित जैसा महसूस नहीं होने दिया था. मैं उनके बदले व्यवहार से थोडा चकित भी था.

 मुझे साथ साथ चल कर सरसरी तौर पर इस आलिशान क्लब को घूम कर दिखाया था. दोपहर लंच टाइम में ही काफी लोग थे शाम को तो और अधिक होते होंगें यह मेरा अनुमान था. मेरे लिए 1972 के नवम्बर में यह मेरी पहली इस अत्यंत चुनिंदा खासम खास बड़े लोगों के इस क्लब सैर थी. सैर कराने वाले भी मेरे फर्स्ट कमांडेंट दि रेजिमेंट ऑफ़ गार्ड के ब्राउन साहेब अविस्मरनीय  कर्नल बी डी मल्होत्रा थे जो कभी प्रतिष्ठित आई.एम्.ए. के एडजुटेंट  रह चुके थे. और  इस क्लब के सदस्य थे. मुझे आश्चर्य हो रहा था कि पता नहीं क्या कारण रहा होगा कि वे कर्नल के आगे प्रमोशन नहीं पा सके, तथा  वहां उपस्थित उनके साथ के मेजर जनरल उनके सामने फीके लग रहे थे. अन्दर पुराने सीनियर आर्मी ऑफिसर्स और रिटायर्ड अफसरों से बड़े घुलमिल कर मिल रहे थे. इस सब के बावजूद वे मुझे बिलकुल भी उपेक्षित न कर रहे थे तथा युद्ध के दौरान अगरतला एअरपोर्ट पर की ड्यूटी को शानदार तथा इतनी कम  उम्र और सर्विस में किये पाए पुलिस मैडल की बात बताते रहे. इतनी प्रशंसा सुन कर मैं फूला भी नहीं समां रहा था साथ साथ थोडा संकुचित सा भी हो रहा था. उन्होंने मुझे वहां की बहुत सी सुख सुविधाऐ दिखलाई, ज्यादातर फौजी सीनियर अफसरों पुराने आई सी एस सर्विंग और रिटायर्ड लोग और उनके सदस्य ही वहां दिखलाए दिए थे. मुझे मालूम था यह क्लब हम जैसे साधारण लोगों के लिए नहीं हैं. न ही हम जैसे लोग फिट हो सकते.

 उस दिन के बाद मुझे वहां  इस नामी गिरामी  क्लब में जाने का  लम्बे समय तक कोई अवसर नहीं मिला था.

पर लगभग तीस साल बाद  एक बार और इस माने हुए दिल्ली  जिमखाना  क्लब में जाने का एक  मौका मिल गया था. वह भी बस अपनी अलग तरह का बहुत विचित्र कहानी है. यह अवसर एक मित्र सविंदर सिंह के सौजन्य से प्राप्त हुआ था. वह बंदा  इस क्लब का मेम्बर हो सकता है यह  मेरे लिए बड़े आश्चर्य का विषय भी था. वह  साथी मेरे से नौकरी व उम्र दोनों में कम था तथा फौज से डेपुटेशन से आकर देश की बाह्य खुफिया एजेंसी रॉ में कार्यरत था, वहीँ अब वह अब्ज़ोर्ब हो गया था. उसी ने मुझे इनवाइट किया था.

वह मित्र सविंदर बड़ा बडबोला था, उसमें बहुत अहम् था, शेखी बघारने की भी आदत थी. कहता था कि वह सबसे अमीर ब्यूरोक्रेट है, उसके पास पंजाब में भटिंडा में  खेती की बहुत ज़मींन है, लुधियाना और दिल्ली में भी प्रॉपर्टी है. मुझे तो आश्चर्य हुआ था जब उसने मुझे बताया कि कुछ समय पहले ही उसे जिमखाना क्लब की मेम्बरशिप मिली थीं. मैंने पूछा कि तुम्हें कैसे मिल गयी बड़े बड़े उच्च अधिकारी अप्लाई करने के बाद भी रिटायर हो कर स्वर्ग भी चले जाते प्रतीक्षा करते करते. उसने बताया कि सब हो जाता है पैसे से, उसने नहीं बताया कि कितने लाख में यह मेम्बरशिप   खरीदी  थी.

यह सुना जाता था कि वह मित्र अपने परिवार की तरफ से बहुत अमीर बताता था  तथा पैसे फैंकने में आगे रहता  था . उस के आग्रह करने पर मैं राज़ी हो गया था पर मेरी पत्नी ने वहां जाने  से साफ़ इनकार कर दिया कहा ‘बस तुम्ही चले जाओ,’ मेरी पत्नी को  उसकी शेखी बघारने की आदत से बड़ी एलर्जी थी. कहती थी कि सीधे रास्ते पर चलने से उसके पास इतना पैसा कभी नहीं होता, कहीं दाल में काला है. खैर लम्बी कहानी न कह कर संक्षेप में कहूं तो उसने काफी मोटा पैसा देकर मेम्बर शिप ‘खरीदी’ थी ताकि सब को यह दिखा सके कि वह इलीट है, उसके लिए वह हम जैसों  को प्रभावित करने या रोब ग़ालिब करने ही वहां पर आमंत्रित करता था. खैर शाम के समय जब हम पहुंचे, गेट पर पहुँच कर वहां गेट पर खड़े गेट कीपर को उसने जेब से निकाल कर अपना जिमखाने का कार्ड हिला कर दिखाया, गेट खुला उसे सलूट मिला और उसने मेरी तरफ गर्व से देखा कि कितना प्रभावित हुआ हूँ और कहा “पहली बार आये हो ना?” मैंने बताया की पहली बार तो तीस साल पहले भी आया था, सुन कर उसे धक्का सा लगा, अच्छा  कह कर चुप हो गया था.

  वहां डायनिंग हाल में  कुछ पुराने लोग जमा थे, एक काफी बुज़ुर्ग भी वहां बिलकुल अकेले बैठे थे, सविंदर जब चाय के लिए आर्डर लिखाने के लिए गया मैं उन्हें विश किया और उन्ही की टेबल पर बैठ गया जिससे वह बड़े प्रसन्न हुए लगे. शायद वे जिंदगी की लम्बी यात्रा के अंतिम सोपान पर अकेलेपन से जूझ रहे थे और कोई बात करने वाला मिलने पर प्रसन्न हुए दिख्र रहे थे. मैंने उनसे बात शुरू कर दिया था. मैंने उनसे पूछ लिया कि वे किस सर्विस से रिटायर हुए  हैं ?

शायद वे यही चाहते थे, इस बीच सविंदर भी वहीँ आ गये थे,  बुजुर्गवार ने बताना  शुरू किया कि उनका नाम सुखमय सेनगुप्ता है, वे आई.एफ.ए.एस. हैं, हमने तो इस सर्विस का नाम भी सुना था. हमें चुप और थोडा कंफ्यूज देख कर  उन्होंने अपने आप ही बताया कि अब यह सर्विस नहीं है, पुराने टाइम में हुआ करती थी. उन्होंने बताया की 1947 में देश के स्वतंत्र होने पर भारत के नार्थ ईस्ट के इलाके के लिए विशेष रूप से एक नई सर्विस बनाई गयी थी, वह थी इंडियन फ्रंटियर एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस यानि आई एफ ए एस.  भारत के उत्तर पूर्व के दूर दराज़ के कठिन क्षेत्र  में जहाँ अधिकतर  आदिवासी हैं में भी भारत के अन्य प्रदेशों की तरह  शासन व्यवस्था को धीरे धीरे शुरू किया जा सके. वहां आना जाना दुर्गम था, भाषा की बड़ी भरी कठिनाई थी, दुभाषिये न के बराबर मिल पाते थे. अंग्रेजों ने उन्हें  बिना शासित किये छोड़ा हुआ था केवल ईसाई मिशिनर्रियों के लिए छोड़ा हुआ था, जो उन इलाकों में चर्च बना देते थे स्कूल चलाते, उन्हें क्रिस्चियन बना देते थे, इन इलाकों में भारी धर्म परिवर्तन हो गया था. यह कन्वर्शन  या धर्म परिवर्तन बहुत वर्षों से चला आया जा रहा था , नेफा को छोड़ कर अधिकतर उत्तर पूर्व में आदिवासी ईसाई बन गए थे.

आई एफ ए एस सर्विस में आर्मी ऑफिसर को लिया गया ताकि मुश्किल काम को कठिन इलाकों में किया जा  सके. सेनगुप्ता जी आर्मी में मेजर थे तथा उन्हें भी इसी सर्विस में ले लिया गया था| वे नेफा के डिवीज़नल कमिश्नर बना दिए गए थे| उन्हें अपने डिवीज़न में डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट व डिस्ट्रिक्ट जज की पॉवर प्राप्त थी. उन्होंने अपने उस समय के बहुत से मजेदार किस्से क्लब में बैठ कर सुनाये थे उनमें से एक यों था :

1949 की बात है प्रधानमंत्री नेहरु ने अपनी बेटी इंदिरागांधी के साथ नेफा के कुछ स्थानों का दौरा किया था. उनमें से एक स्थान वहां उस समय का एक छोटा सा टाउन या गाँव ही कहें ‘खोंसा’ भी था जो आजकल तिरप जिले का हेड क्वार्टर है बेहद सुन्दर प्राकृतिक स्थान. श्रीमान सेनगुप्ता जी वहां के डी.सी. की हैसियत से तैनात थे और वहां के और आस-पास के विलेज हेड ग्रामवृद्ध बुलाये हुए थे जिन्हें वहां की परंपरागत ड्रेस और उनकी विशिष्ट पहचान के लिये एक परम्परागत सेरेमोनियल लाल चौड़ी पट्टी दाहिने कंधे से बाईं साइड नीचे तक दी गयी थी जो झालरदार होती थी. वह उनकी सत्ता का प्रतीक होती थी, वास्तव में उन्ही के हाथों में उनकी जनजाति की कमांड थी| वे ही उनके सब फैसले किया करते थे. मुश्किल से सौ लोगों को जुटाया जा सका था. वहां की दो जनजातियों नोक्टेस तथा तुत्सास जनजातियों के डांस भी आयोजित किये जाने थे. प्रधान मंत्री वायुसेना के हेलीकाप्टर से आये थे तथा उनके साथ इस सम्पूर्ण उत्तरपूर्व हिल्स, जिसमें अभी के नागालैंड, मिजोरम, मेघालय, अरुणाचल शामिल हैं, के कमिश्नर इमदाद अली साहब थे-जो इम्पीरियल पुलिस या आई पी  के माने हुए पुलिस ऑफिसर थे, किसी  सिविलयन आई सी एस ऑफिसर को न बना कर उन्हें  विशेष रूप से  मुश्किल काम के लिए चुना गया था, बाद में वे आईजी असम व राजस्थान रहे और अंत में वे सीआरपीएफ के प्रथम महानिदेशक बन कर सेवा निवृत हुए  थे. उनकी योग्यता को देखते हुए रिटायरमेंट के बाद भी वे  सीरिया के एम्बेसडर भी बनाये गए थे. उनका ऑफिस शिलांग में था .

प्रधान मंत्री नेहरु जी व उनकी बेटी इंदिरा गाँधी का खोंसा पहुँचने पर  बहुत गर्मजोशी से स्वागत किया गया था. सभी प्रोग्राम बड़े सुचारू रूप से हो गए थ. प्रधान मंत्री बड़े खुश थे उन्होंने ग्रामबूढों के साथ फोटो खिंचाये तथा अपने लाए हुए उपहार भी दिए.  दुभाषियो की मदद से अपनी ख़ुशी जताई थी.

 कोई डेढ़ घंटे वे वहां रहे. कमिश्नर इमदाद अली साहेब और सेनगुप्ता साहेब संतुष्ट महसूस कर रहे थे कि इतनी महत्वपूर्ण विजिट ठीक से होने वाली है. प्रधान मंत्री व उनकी पुत्री इंदिरा जी हेलीकाप्टर की और चल चुके थे  तभी अचानक एक ग्रामबूढा ( विलेज हेड मेन ) बड़ा उत्तेजित सा हो गया था और श्रीमती इंदिरा गाँधी की तरफ इंगित कर अपनी भाषा बोलता जा रहा था. कभी हाथ की पांच उँगलियाँ करता, फिर छ, सात  दस तक बढाता गया था. बैचैन होता जा रहा था. कुछ दूर स्थित नेहरु जी उस तरफ देख कर कमिश्नर  इमदाद अली जी को जाकर माजरा पूछने के लिये कहा.दुभाषिये ने बताया था कि यह कह रहा है कि ‘वह यहां का राजा है. उसे इंदिरा जी पसंद आ गयी हैं  वह उस से शादी के लिये 5 मिथुन देगा, फिर बोली बढ़ा कर 10 और ज्यादा बढाता जा रहा था,इंदिरा जी को जाने नहीं देगा. भले ही कितने मिथुन उसे देने पड़े. मिथुन कुछ कुछ गाय जैसा पशु होता है जो कीमती मन जाता है. इमदाद अली साहेब के आदेश से सेनगुप्ता उसे समझाते हुए  पकड़ कर दूर ले गए.  इमदाद अली साहेब ने प्रधान मंत्री को जाकर असली बात के स्थान पर अपनी तरफ से इलाके का कोई साधारण कारण बता कर कहा कि डिवीज़नल कमिश्नर उसे समझा रहे हैं.

 वहां से  वायुसेना के हेलीकाप्टर ने प्रधानमंत्री, इंदिरा जी और इमदाद अली ने प्रस्थान किया और तब जाकर सेनगुप्ता साहेब की सांस में सांस आयी थी. अगर प्रधान मंत्री को असली कारण पता लग जाता कि ग्राम बूढा क्या डिमांड कर रहा था, और उसके कहने पर उसकी जनजाति वाले नोक्टेक कुछ  गड़बड़ कर देते तो बड़ी ख़राब स्थिति हो जाती, सब कुछ प्रबंध गुड़-गोबर हो जाता.

इस तरह के पता नहीं कितने किस्से सेनगुप्ता साहब के पास थे| उस के लिए एक दिन के लिए यह  नाकाफी था.

उन्होंने बात बढ़ाते सविन्दर से  भी पूछा था “तुम पंजाबी हो?”

 सविन्दर के हाँ कहने पर फिर कहा तुम ऊन के गोले तो बनाने जानते ही होगें. सविन्दर के इंकार करने पर पूछा तुम्हारी पत्नी पंजाबी नहीं है क्या? उसने कहा है कि वह भी पंजाबी ही है.

 वयोवृद्ध सेनगुप्ता साहेब ने कुछ संजीदा होते हुए शायद कुछ क्षण अपनी पत्नी की याद में डूब गए और बताया कि उनकी पत्नी भी पंजाबी थी, बहुत खूबसूरत और ‘स्मार्ट कुड़ी’ थी. स्वयं भी  काम खूब करती थी और दूसरों से भी काम लेना जानती थी, स्वेटर खूब बुनती थी, सिलाई, कढाई आदि भी करती थी, उसने  आसानी बांग्ला भाषा सीख ली थी. उसने सेनगुप्ता साहेब को उनकी स्मार्ट कुड़ी ने  यह बताया हुआ था कि हर पंजाबिन स्वेटर बुनती है और उनके पतियों को ऊन के गोले बनाने होते हें, इस चक्कर में उन्होंने सारी उम्र पत्नी की ऊन के खूब गोले बनाये थे. उनकी सीधी सच्ची बातों को सुन कर विशेष रूप से उन के मुंह से ‘स्मार्ट कुड़ी’ शब्द  सुन कर मुझे तो बड़ा मज़ा आया था और भी तरह-तरह के पुराने किस्से सेनगुप्ता सुनाते पर काफी देर हो गयी थी, हमारी चाय कब की ख़त्म हो चुकी थी. सेन गुप्ता कह रहे थे कि उनकी पंजाबी पत्नी  हरनाम कौर उनके ही पुराने कर्नल ढिल्लों की बेटी थी, बेहद  खूब सूरत और लम्बी थी, वे उसे मिस करते हैं.  घर में अभी भी ऊन है पर गोला बनवाने वाली नहीं है. उसे ऊपर ईश्वर के पास गए 15 वर्ष हो गए थे. उनके  एक ही बेटा है जो कनाडा में सेटल हो गया है, वे कई बार उसके पास रह आये हैं अब 93 वर्ष में कहीं जाने की उनमें हिम्मत नहीं है, घर में अकेलापन है अब क्लब ही उनका घर है यहाँ के उनके साथी ही से वह दुःख दर्द बाँट लेता है. पहले बहुत कुछ नहीं जानता था तब उसको पूछते थे, अब बहुत कुछ  समय ने सिखा दिया अब कोई मुझसे पूछता ही नहीं.

 उनका दुःख साफ़ झलक रहा था. जिमखाना उनका बहुत बड़ा सहारा था. उन्होंने दिल्ली आ कर हिंदी सीख ली थी उर्दू शायरी के बहुत से शेर उन्हें याद थे. चलते चलते उन्होनें  हमें अकबर इलाह्बादी का एक शेर यूं सुनाया था.

हम क्या कहें अहबाब क्या कारे नुमाया कर गए ,

बी ए हुए नौकर हुए पेंशन मिली और फिर मर गए.

 यह शेर देर तक मेरे जहन में गूंजता रहा था कि कितने भी बड़े पद पर नौकरी के दौरान रह चुके हो,  सरकारी नौकरी के बाद पेंशन ही जीवन आधार रह जाती है, तथा पद छूट जाने के बाद मनुष्य की गति फ्यूज बल्ब की तरह हो जाती है भले वह पांच सौ वाट को चाहे जीरो वाट का. सेन गुप्ता साहेब  पहले कितने भी बड़े बड़े पद और प्रतिष्ठता पाए हो अब तो उनकी बात सुनने वाले भी नहीं मिल पाते होंगें ,यह प्रतिष्ठित जिमखाना क्लब में उनका समय बिताना उनका सबसे बड़ा शगल है, इसके बिना जीवन को वे सोच नहीं सकते, यहाँ से निकलते ही वे निरीह से हो जाते हैं.

इसके बाद सविंदर ने थोडा क्लब दिखाया, घुमाया, जल्दी ज़ल्दी दो पटियाला पेग भी लगाये थे. अभी वह वहां ज्यादा फिट हुआ नहीं लग रहा था. इस क्लब में ज्यादा परिवर्तन नहीं हुआ था बस सर्विस से इतर धनी व्यक्ति भी वहां दिखाई दिए थे. सेन गुप्ता साहेब ने अपने आप  ही इस पर थोडा रोष जताया था.

इस घटना को हुए काफी लम्बा समय हो चुका है, मुझे यहाँ अपना गेस्ट बना कर लाने वाले दोनों ही भगवान को कभी के प्यारे हो चुके हैं. अब मैं जब आजकल अखबार में तथा मीडिया में जोर शोर से चल रही केंद्र सरकार द्वारा क्लब  पर बेदखली की तलवार लटकने की बात पढता हूँ या सुनता हूँ वहां दो बार जाने और ले जाने वालों की बात, वहां बिताया थोडा सा समय याद आ रहा है.

देखना है अब  भारत  सरकार की  दिल्ली जिमखाना क्लब असली मंशा क्या है? वहां के मेम्बर भी कोर्ट में चले गए गए हैं. देखना है कानूनी पक्ष किसका कितना मज़बूत है, और  आगे जाकर क्या होगा? यह सब तो मालूम नहीं है, इसे अधिग्रहण करना चाहिए या नहीं पर एक बात है इस 1913 में बनी सौ वर्ष से पुरानी संस्था के मानवीय पक्ष के बारे में भी विचार ज़रूर करना चाहिए. इसके पुराने समय में रहे शक्तिशाली और अब दुबले, बूढ़े, शक्तिहीन पड़े सदस्यों का ख्याल भी ज़रूरी है, उनकी इज्जत का मसला भी है. कोर्ट कचहरी कितनी राहत दे पायेंगे या नहीं दे पायेंगे ? फैसले का इंतजार रहेगा.

यहाँ एक और विचार आ रहा है कि सरकार की यह चेष्टा है कि अंग्रेजियत वाले ‘इलीट’ को समाप्त करना चाहिए तथा ब्रिटिश समय के साहेब जो खाकी में थे उनके बदले मिल की खादी से नए फैशन करने वाले इलीट का ज़माना है जो इलेक्शन की धांधली से आये हो, भले ही उनके विरुद्ध दुनिया भर के अपराध के मुकदमे चल रहे हों. आजकल  कोई साधारण व्यक्ति इलेक्शन में जीतने की छोडिये लड़ने की भी नहीं सोच सकता. जिमखाना  जैसे इलीट क्लब  भले ही अधिग्रहण हो जाएँ पर नए तरह के इलीट तो बड़ी संख्या में पंचायत से पार्लियामेंट द्वारा थोक में लगातार आते ही रहेंगें. उनके नाम ‘सेवा भवन’ जैसे होंगे, पर सेवा वे अपनी ही करवाएंगें. अलग तरह के ऐश गाह बनेंगें.

लिखते लिखते  याद आ रही है  स्वर्गीय ओम प्रकाश ‘आदित्य’ की बहुत तीखी और उनके समय से भी  अधिक प्रासंगिक नीचे दी हुई  कविता  जो बहुत  कुछ कह गयी है, यह स्थिति है कि बड़े बड़े विद्वान पढ़े लिखे आज  के नए  ‘इलीट’ की चापलूसी में व्यस्त हैं और फायदों की फसल काट रहे हैं ‘गधे’ बड़े आसनों पर बैठे हंस रहे हैं, खुश हैं  और आम आदमी रों रहा है. सिर्फ हिन्दुस्तान में ही नहीं, यहाँ तो फिर भी कुछ गनीमत है, दुनिया के सर्वोच्च शक्तिशाली  माने जाने वाले सिंहासन पर जो आजकल विराजमान हैं और जो कर रहा है, वह सब को मालूम है. बड़े बड़े  देशों के अध्यक्ष मज़बूर हो चापलूसी में ऊपर से नीचे मुंडी हिला रहें है या चुप्पी साधे बैठे हैं. देखिये यह कालजयी रचना  जिसमें देश के हालात पर जबरदस्त व्यंग कसा हुआ है, देश दुनिया अब कुछ ही ऐसी ही स्थिति में है.

इधर भी गधे हैं, उधर भी गधे हैं
जिधर देखता हूं, गधे ही गधे हैं


गधे हँस रहे, आदमी रो रहा है
हिन्दोस्तां में ये क्या हो रहा है

जवानी का आलम गधों के लिये है
ये रसिया, ये बालम गधों के लिये है

ये दिल्ली, ये पालम गधों के लिये है
ये संसार सालम गधों के लिये है

पिलाए जा साकी, पिलाए जा डट के
तू विहस्की के मटके पै मटके पै मटके

मैं दुनियां को अब भूलना चाहता हूं
गधों की तरह झूमना चाहता हूं

घोडों को मिलती नहीं घास देखो
गधे खा रहे हैं च्यवनप्राश देखो

यहाँ आदमी की कहाँ कब बनी है
     ये दुनियां गधों के लिये ही बनी है

जो गलियों में डोले वो कच्चा गधा है
जो कोठे पे बोले वो सच्चा गधा है

जो खेतों में दीखे वो फसली गधा है
जो माइक पे चीखे वो असली गधा है

मैं क्या बक गया हूं, ये क्या कह गया हूं
नशे की पिनक में कहां बह गया हूं

मुझे माफ करना मैं भटका हुआ था
   वो ठर्रा था, भीतर जो अटका हुआ था..