दान कहाँ और कितना देना चाहिए? Nitya Oswal द्वारा प्रेरक कथा में हिंदी पीडीएफ

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दान कहाँ और कितना देना चाहिए?

इस काल में दान बहुत सोच-समझकर देने जैसा है। पहले के ज़माने में सच्चा धन आता था, इसलिए दान भी सच्चा दिया जाता था। आजकल आमदनी में गलत धन ज़्यादा आता है। ऐसे में लक्ष्मी का सदुपयोग हो, इसका खास ध्यान रखना चाहिए। नहीं तो ज़रूरत से ज्यादा गलत लक्ष्मी अधोगति की ओर ले जाती है। इसलिए, धर्म के शास्त्रों में कहा गया है कि आमदनी का कुछ हिस्सा दान में देना चाहिए। लेकिन हर किसी को दान देने से पहले यह प्रश्न होता है कि जो दान देते हैं, उस धन का सदुपयोग होता है या दुरुपयोग? इसलिए, दान ऐसी जगह देना चाहिए जहाँ हमें विश्वास हो कि लक्ष्मी का सदुपयोग होता है, और अगर दुरुपयोग होता हो वहाँ नहीं देना चाहिए।

दान में कितना देना चाहिए? अपनी सारी संपत्ति विरासत में बच्चों के लिए रख देनी चाहिए या दान में दे देनी चाहिए? दान कहाँ और किसे देना चाहिए? इन सभी प्रश्नों के जवाब हमें यहाँ परम पूज्य दादाश्री की दृष्टि से स्पष्ट होते हैं।

★ आमदनी का पाँचवाँ हिस्सा दान में
परम पूज्य दादाश्री कहते हैं, “इस जन्म में जो पैसे आएँ, उसका पाँचवाँ हिस्सा भगवान के मंदिर में डाल देना या फिर लोगों के सुख के लिए खर्च करना। इसलिए उतना तो वहाँ ओवरड्राफ्ट पहुँचा!” यानी, इस जन्म में जो कमाई होती है, उसका पाँचवाँ हिस्सा दान जैसे सत्कार्यों में इस्तेमाल करेंगे, तो उतना पुण्य आने वाले जन्म के लिए जमा होगा।

आमदनी का कुछ हिस्सा दान में देने से पहले यह ध्यान रखें कि घर चलाने में कोई परेशानी न आए। इसलिए, दान सरप्लस पैसे से देना चाहिए। सरप्लस यानी रोजमर्रा की ज़रूरतें पूरी होने में कोई अड़चन न आए ऐसा धन। आज दान में पैसा दे दें और कल चिंता हो, ऐसा नहीं करना चाहिए। आने वाले छः महीनों तक कोई परेशानी नहीं होगी, ऐसा सुनिश्चित करने के बाद ही दान में पैसे दें।

भारत में कुछ जातियों के लोगों में पीढ़ी दर पीढ़ी ऐसा रिवाज होता है कि हर साल आमदनी का बीस-पच्चीस प्रतिशत भगवान के मंदिरों या धर्म के स्थानों में दान किया जाए। जैसे खेत में बीज बोएँगे तो वह उगेगा और हमें अनेक गुना होकर मिलता है, उसी तरह धर्म के कार्यों में लक्ष्मी देंगे, तो पुण्य के फलस्वरूप आने वाले जन्म में कई गुना लक्ष्मी आती है। फिर लक्ष्मी का कुछ हिस्सा धर्म के कार्यों में देता है, इसलिए पुण्य कमाता ही रहता है।

★ बच्चों को देने योग्य विरासत
यदि बच्चों के लिए विरासत में बहुत अधिक संपत्ति छोड़ जाएँ और वैभव में पालन-पोषण करें, तो वे लोग शराब जैसे व्यसनों में और गलत मार्ग पर लक्ष्मी बर्बाद कर देंगे। इसलिए, उन्हें अधिक पैसा देना वह गुनाह है। इसके बजाय, हमें बच्चों को पढ़ा-लिखाकर वे नौकरी-धंधे में लग जाएँ, उसकी सभी व्यवस्था कर देनी चाहिए। फिर माता-पिता की बहुत ज़िम्मेदारी नहीं रहती।

समय आने पर, जब बच्चें मुश्किल में पड़ जाएँ, उस समय उनकी मदद करने के लिए बैंक में कुछ रकम रख देनी चाहिए। लेकिन, उन्हें बताना नहीं चाहिए कि इतनी रकम रखी है, नहीं तो जानबूझकर मुश्किल खड़ी करेंगे। बेटियों की शादी करवाएँ, उन्हें सोने के आभूषण और बाकी सब कुछ दें। बेटों को व्यापार करना हो, तो उसमें थोड़ी बहुत मदद करके और बाकी के पैसे उन्हें लोन पर दिलवाने चाहिए। जिससे उनके सिर पर ज़िम्मेदारी रहे और वे लापरवाह न हो जाएँ। जीवन में थोड़ा-बहुत संघर्ष होगा, तभी बच्चें गलत मार्ग पर नहीं जाएँगे।

माता-पिता को अपने भविष्य की सलामती के लिए पर्याप्त पैसे रखने के बाद ही बच्चों को देना चाहिए। वसीयतनामा भी इस तरह बनाना चाहिए, जिससे बेटों का हित भी संभल जाएँ और अपना भी। वसीयत में आधी पूंजी अपने पास रखनी चाहिए और बाकी सब ज़ाहिर कर देनी चाहिए। जितना हमारे बाप-दादा ने हमें विरासत में दिया, उतनी ही मूल्य की विरासत अपने बच्चों के लिए रख देनी चाहिए। इसके अलावा की बाकी की कमाई अपने मृत्यु के बाद धर्म या लोगों के कल्याण के मार्ग में खर्च हो ऐसा करना चाहिए।

★ दान विवेकपूर्वक दें
दान विवेकपूर्वक देना चाहिए। रामायण का एक प्रसंग देखते हैं। जब भगवान राम चौदह वर्ष के वनवास पर गए, तब उन्होंने अपने छोटे भाई भरत को राज्य सौंपते हुए कहा था, कि “प्रजा को दुःखी मत होने देना।” इसलिए भरत ने राज्य के लोगों से कर लेना बंद कर दिया और राज्य का भंडार खाली हो जाए, उस हद तक प्रजा में धन लूटा दिया। परिणामस्वरूप, प्रजा आलसी जीवन जीने लगी, और अंततः बर्बाद हो गई। ज़रूरतमंद लोगों को नकद पैसे देने के बजाय, वह किस तरह जीवन में सुखी हो सकते हैं, किस तरह जीवन जीया जाएँ, इसका मार्ग दिखाना चाहिए। यदि किसी गरीब को हज़ारों रुपए दान में दे दें, तो वह आलसी हो जाएगा और अगले ही दिन से काम-धंधा बंद कर देगा। जैसे ही कमाने से आराम होता है कि मनुष्य गलत रास्ते पर चला जाता है। इसके बजाय ऐसे लोगों को नौकरी में लगवाने या छोटा व्यवसाय शुरू करने में मदद करनी चाहिए या ज़रूरत की वस्तु लाकर दे देनी चाहिए। यदि नकद रुपये दान में दें और बाद में शराब या जुए में रुपये बर्बाद कर दें, तो दान व्यर्थ चला जाता है।

वस्तुओं का दान भी किस तरह से दें, यह समझ के साथ तय करना चाहिए। उदाहरण के लिए, एक व्यक्ति को फुटपाथ पर सोते हुए लोगों को देखकर दया आई और ऐसा भाव हुआ कि बर्फ पड़ने वाली है, इस ठंड में घर में नहीं रहा जाता है, तो ये लोग फुटपाथ पर कैसे रहेंगे? इसलिए, वह अपने पैसे खर्च करके समान्य गुणवत्ता के सौ–सवा सौ नए कंबल खरीदकर ले आए। वह सुबह चार बजे गया और जब सब सो रहे थे, तो गरीबों को ओढ़ाकर आए। लेकिन पाँच-सात दिन बाद वहाँ जाकर देखा तो एक भी कंबल दिखाई नहीं दिया। पता करने पर मालूम हुआ कि वे लोग नए कंबल बेचकर पैसे ले आए।

परम पूज्य दादाश्री कहते हैं, कि इस तरह वस्तुओं का दान नहीं देना चाहिए। उन्हें नए कंबल देने के बजाय, बाजार से कम दाम में पुराने या इस्तेमाल किए हुए साफ़ कंबल लाकर देने चाहिए। क्योंकि, इन्हें बेचने जाओगे, तो कोई नहीं खरीदेगा। यदि प्रति व्यक्ति पाँच सौ रुपए का बजट रखा हो, तो पाँच सौ का एक नया कंबल लेने के बजाय पुराने तीन कंबल खरीदकर दे दें।

इसके अलावा, किसी को नकद पैसे देने के बजाय कहीं से भोजन लाकर खिला दें या मिठाई लाकर बाँट दें। मिठाई का बॉक्स भी नहीं देना चाहिए, नहीं तो दूसरों को आधी कीमत में मिठाई बेचकर पैसे इकट्ठा करेंगे। हिंसक वृत्ति वाले लोगों को दान में नकद रुपये देंगे, तो अधिक हिंसा करेंगे। इसलिए, बहुत सोच-समझकर दान देना चाहिए, जिससे उसका दुरुपयोग न हो।

आजकल गरीब किसे कहें वह मुश्किल है! भिखारी को पैसे देते है, लेकिन उनके पास लाख रुपये बैंक में पड़े होते हैं। भिखारी के नाम पर पैसे इकट्ठे करने का भी व्यापार चल रहा है। वास्तव में दान की ज़रूरत किसे है? जो लोग मुश्किलों में फँसे हैं, लेकिन माँग नहीं सकते, अंदर ही अंदर पिसते रहते हैं और दबाव में जी रहे हैं। ऐसे मध्यम वर्ग के लोगों को दान देने जैसा है।

सच्चा दान देने वाला व्यक्ति स्वभाव से ही एक्सपर्ट होता है। वह व्यक्ति को देखते ही समझ जाता है कि इसकी नीयत सच्ची है या झूठी। मान लीजिए, कोई व्यक्ति उसकी बेटी की शादी के लिए नकद लेने आता है, लेकिन उसकी नीयत ठीक न लगे, तो वहाँ नकद देने के बजाय उसकी बेटी को घर बुलाकर उसे कपड़े, गहने वगैरह देगा, और उसके रिश्तेदारों के यहाँ अपने घर से ही मिठाई भेजवा देता है। इस तरह सब व्यवहार संभालता है, लेकिन हाथ में नकद नहीं देता।

दान तो राज़ी-खुशी से दिया जाए तो ही अच्छा है। दान के लिए घी की बोली लगवाना या ऐसी कोई स्पर्धा करना, सामने से पैसे मांगना वगैरह न हो तो वह उत्तम दान कहलाता है। धर्म के स्थानकों में भी जहाँ पूजनीय व्यक्ति दान की लक्ष्मी को अपने निजी खर्च या लाभ के लिए उपयोग नहीं करते, लेकिन धर्मकार्यों को सहारा देने के लिए लक्ष्मी का उपयोग करते हैं, ऐसी जगह दान देना उत्तम माना जाता है।