मैं वो हूँ जो नहीं है ,जो नहीं है वो मैं हूँ।
जो अस्तित्व के परे है वो मैं हूँ।
जो दृष्टिगोचर हैं वो सृष्टि है, जो सृष्टि के परे हैं वो मैं हूँ।
जो श्रव्य हैं वो शब्द है , जो शब्द अतीत है वो मैं हूँ।
शिव अर्थात सत्यम, शिवम्, सुंदरम। सत्य ही शिव है और शिव ही सुंदर है। सत्य कोई वस्तु नहीं जिसे पाया जा सके, न कोई अनुभव है जिसे महसूस किया जा सके, न कोई कल्पना है जिसे सोचा जा सके। सत्य न कहीं आता है, न कहीं जाता है। वह न जन्म लेता है, न मरता है। न उसे देखा जा सकता है, न समझा जा सकता है, न सुना जा सकता है। वह सब कुछ से आगे है, सबके पहले है, सबके भीतर है। ऐसा है शिव। इसलिए शिव को पाया नहीं जा सकता, केवल शिव में लीन हुआ जा सकता है। आप शिव को बुला नहीं सकते, क्योंकि जो सर्वत्र है उसे बुलाया कैसे जाए। सत्य के पास जाना पड़ता है, स्वयं को बदलकर, स्वयं को गहराकर। शिवमय होने का अर्थ है स्वयं को जानना, अपनी चेतना को ऊँचा उठाना, अपने सीमित अहं को छोड़ देना। शिव में लीन होना स्वयं को खोना नहीं, बल्कि स्वयं को पहली बार सही अर्थों में पाना है।
जहाँ शिव है, वहीं शुभ है। शिव को न सृष्टि रचने से कोई सरोकार है, न उसे चलाने से। शिव का संबंध विनाश से है, पर यह विनाश किसी की हत्या नहीं, किसी के अंत का उत्सव नहीं। यह विनाश है अज्ञान का, अंधविश्वास का, भ्रम का, भय का। यह विनाश है उन व्यवस्थाओं का जो भीतर जड़ हो चुकी हैं। यह टूटना है माया का, मोह का, लोभ का, ईर्ष्या का, काम और क्रोध का। इसी कारण शिव को वैराग्य का प्रतीक कहा गया है—न वस्त्रों का मोह, न संग्रह का आग्रह, न खोने का भय। जिन्हें कहीं शरण नहीं मिलती, उन्हें शिव शरण देते हैं। न पाने का मोह, न खोने का डर—यही शिव हैं। पशु, पक्षी, सर्प, कीट—सब शिव के हैं, और गहराई से देखें तो सब शिव ही हैं। कथाएँ झूठ नहीं होतीं, पर मनुष्य उनके अर्थों को पकड़ने के बजाय उन्हीं में उलझ जाता है। कथाएँ संकेत हैं, स्मरण हैं—यह बताने के लिए कि दिशा कहाँ है।
जब कोई शिवमय होने की ओर बढ़ता है, तो उसका विनाश शुरू होता है। यह विनाश उसके भीतर घटता है। उसकी झूठी पहचानें टूटती हैं, उसकी सीमाएँ गिरती हैं, उसका पुराना ढाँचा बिखरता है। यही विनाश उसे शिवमय बनाता है। इसलिए शिव भयावह नहीं हैं, बल्कि मुक्तिदाता हैं।
हमने शिव को भी एक ऐतिहासिक पात्र बना दिया—मानो वे कैलाश में रहते हों, परिवार चलाते हों, कहीं आते-जाते हों। जबकि शिव सत्य हैं, ब्रह्म हैं। उन्हें कहीं रहने की आवश्यकता नहीं। पार्वती प्रकृति का प्रतीक हैं। गणेश मानव और प्रकृति के उस गहरे संबंध का संकेत हैं जिसमें मानव और प्रकृति का साथ जुड़ा हो। कैलाश किसी पर्वत का नाम भर नहीं, वह चेतना की सर्वोच्च ऊंचाई का प्रतीक है—जहाँ से आगे कुछ नहीं। भांग किसी नशे का महिमामंडन नहीं, बल्कि उस मस्त अवस्था का संकेत है जिसमें व्यक्ति स्वयं में डूबा होता है, स्वयं को जानने के आनंद में स्थित होता है, अपनी नकारात्मक वृत्तियों को समर्पित कर देता है।
शिवलिंग का अर्थ भी विकृत कर दिया गया है। लिंग का अर्थ है संकेत—जो सत्य की ओर इशारा करता है। शिवलिंग के नीचे का आधार प्रकृति का प्रतीक है और उसके केंद्र में स्थित लिंग सत्य का। इसका अर्थ यह है कि सत्य तक पहुँचने के लिए पहले प्रकृति को समझना होगा—अपनी वृत्तियों को, अपने मोह-माया को, अपने भीतर के अंधकार को। जब तक प्रकृति को नहीं समझा जाएगा, तब तक केंद्र तक पहुँचना संभव नहीं। शिवलिंग शांति का मार्ग है, न कि कोई देहात्मक प्रतीक।
आज शिव को मनोरंजन बना दिया गया है। कहीं वे सोशल मीडिया पर मज़ाक बनते हैं, कहीं नारे बन जाते हैं। हर कोई खुद को महाकाल का भक्त कह देता है, पर स्वयं से टकराने का साहस नहीं रखता। शिव कोई ढील नहीं हैं कि आप जैसा चाहें वैसा जी लें। शिव तो कठोर सत्य हैं। जो उनसे प्रेम करता है, उसका रूपांतरण होता है। उसकी छोटी, सीमित संभावनाएँ मरती हैं। इसलिए शिव मृत्यु से भी बड़े हैं—वे मृत्युंजय हैं।
वह शांति कैसी जो सीमाएँ मान ले। वह प्रेम कैसा जो बंधन स्वीकार कर ले। वह सत्य क्या जो बँधा हुआ हो। शिव की तीन आँखें—सूर्य, चंद्र और अग्नि—द्वैत और अद्वैत का संकेत हैं। दिन और रात वह सब दिखाते हैं जो खंडित है, जो दिखाई देता है। तीसरी आँख उस अग्नि की है जो इस द्वैत को जला देती है और सत्य को प्रकट करती है।
शिव कोई देवता नहीं, कोई कथा-पात्र नहीं। शिव ही सत्य हैं—निर्भय, निराकांक्षी, असीम। शिवमय होना ही जीवन की परम संभावना है।
~ कपिल तिवारी "यथार्थ"