भूतों का टापू - 1 Wow Mission successful द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

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भूतों का टापू - 1

हिंद महासागर के बीचों-बीच एक ऐसा टापू था, जो किसी भी नक्शे में नहीं मिलता था। समुद्र में भटकने वाले जहाज़ या नाव कभी-कभी अचानक घने कोहरे में घिर जाते... और जब कोहरा छंटता, तो वे उसी रहस्यमयी टापू पर होते।टापू पर एक पुराना, वीरान गाँव था। वहाँ टूटे-फूटे घर, एक खामोश मंदिर, एक सूखा कुआँ और जंगल के बीच एक काला किला था। सबसे अजीब बात यह थी कि वहाँ पहले से कई लोग फँसे हुए थे—कोई 5 साल से, कोई 20 साल से। लेकिन कोई भी उस टापू से बाहर नहीं निकल पाया।हर शाम सूरज ढलते ही पूरे टापू में एक घंटी बजती। घंटी बजते ही सभी लोग अपने घरों के दरवाज़े बंद कर लेते। क्योंकि रात में "परछाइयाँ" निकलती थीं। वे इंसानों जैसी दिखती थीं, लेकिन उनकी आँखें पूरी तरह काली होती थीं। वे दरवाज़ा नहीं तोड़ती थीं... बस मीठी आवाज़ में किसी अपने का नाम लेकर बुलाती थीं। जो भी उनकी बातों में आकर दरवाज़ा खोल देता... वह अगली सुबह हमेशा के लिए गायब हो जाता।कहा जाता था कि इस टापू के बीच बने काले किले में एक ऐसा राज़ छिपा है, जो पूरे टापू को कैद किए हुए है। लेकिन जो भी उस किले के अंदर गया... वह कभी लौटकर नहीं आया।अब एक नई नाव तूफ़ान में रास्ता भटककर उसी टापू पर पहुँच चुकी थी...क्या ये लोग टापू का रहस्य सुलझाकर ज़िंदा बाहर निकल पाएँगे... या फिर हमेशा के लिए भूतों के टापू का हिस्सा बन जाएँगे?भूतों का टापू – भाग 2: पहली रात

नई नाव से आए 12 लोग अभी भी समझ नहीं पा रहे थे कि वे कहाँ आ गए हैं। तभी गाँव का एक बूढ़ा आदमी, जिसका नाम रहीम चाचा था, तेज़ आवाज़ में बोला—

"सवाल बाद में करना... पहले सूरज डूबने से पहले किसी घर के अंदर चलो। अगर देर हुई, तो सुबह नहीं देख पाओगे।"

सब लोग घबरा गए। दूर आसमान में सूरज धीरे-धीरे समुद्र के पीछे छिप रहा था। पूरे टापू पर अजीब-सी खामोशी फैल गई।

जैसे ही अंधेरा हुआ...

टन... टन... टन...

एक पुरानी घंटी की आवाज़ पूरे टापू में गूँज उठी।

सभी लोगों ने तुरंत दरवाज़े और खिड़कियाँ बंद कर दीं। किसी ने बाहर झाँकने की भी हिम्मत नहीं की।

रात के कुछ देर बाद...

ठक... ठक... ठक...

दरवाज़े पर दस्तक हुई।

नई टोली में शामिल एक लड़के ने धीरे से पूछा,"कौन है?"

बाहर से उसकी माँ जैसी आवाज़ आई—

"बेटा... दरवाज़ा खोलो। मैं तुम्हें लेने आई हूँ।"

लड़के की आँखों में आँसू आ गए। लेकिन रहीम चाचा ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।

"मत खोलना! ये तुम्हारी माँ नहीं है..."

बाहर से फिर वही आवाज़ आई—

"तुम मुझे पहचानते नहीं क्या?"

कुछ ही पल बाद आवाज़ बदल गई। अब वह हँसी में बदल चुकी थी...

धीरे-धीरे दस्तक बंद हो गई।

सबने राहत की साँस ली।

लेकिन तभी...

छत पर किसी के चलने की आवाज़ आने लगी।

ठक... ठक... ठक...

ऐसा लग रहा था जैसे कोई पूरे घर के ऊपर चक्कर लगा रहा हो।

अचानक गाँव के दूसरे छोर से किसी की ज़ोरदार चीख सुनाई दी...

फिर सब कुछ शांत हो गया।

सुबह होने पर लोग बाहर निकले।

एक घर का दरवाज़ा खुला हुआ था...

अंदर कोई नहीं था।

फर्श पर समुद्र की गीली रेत के निशान थे, जो घर से निकलकर सीधे जंगल की तरफ जा रहे थे।

रहीम चाचा उन निशानों को देखते हुए धीमे से बोले—

"उन्होंने फिर किसी को चुन लिया..."

और पहली बार उन्होंने काले किले की तरफ देखा।

"अब वो लोग जाग चुके हैं..."

भूतों का टापू – भाग 3: काले किले का पहला राज़

सुबह की पहली किरण के साथ पूरे गाँव में सन्नाटा पसरा हुआ था। रात को जो आदमी गायब हुआ था, उसका कोई निशान नहीं मिला।

लेकिन घर के बाहर गीली रेत पर एक अजीब-सा चिन्ह बना था...

एक काला गोला... जिसके बीच में एक आँख बनी हुई थी।

रहीम चाचा का चेहरा डर से पीला पड़ गया।

उन्होंने धीरे से कहा,"जिसके घर के बाहर ये निशान बन जाए... समझ लो अगली रात उसकी बारी है।"

यह सुनते ही पूरे गाँव में खौफ फैल गया।

उसी समय नई टोली का एक युवक बोला,"हम डरकर नहीं बैठेंगे। इस टापू का रहस्य जानना ही होगा।"

दोपहर होते ही पाँच लोग जंगल की तरफ निकल पड़े। रास्ते में उन्हें विशाल पेड़ मिले, जिनकी जड़ें ज़मीन के ऊपर साँपों की तरह फैली हुई थीं।

चलते-चलते उन्हें एक पुराना पत्थर मिला, जिस पर लिखा था—

"जो किले का सच देखेगा... वह कभी पहले जैसा नहीं रहेगा।"

कुछ दूर जाने पर घने पेड़ों के बीच वह दिखाई दिया...

काला किला।

किले की दीवारें टूटी हुई थीं, लेकिन ऐसा लग रहा था जैसे कोई आज भी वहाँ रहता हो।

जैसे ही वे अंदर जाने वाले थे...

अचानक ज़मीन ज़ोर से हिलने लगी।

किले का विशाल दरवाज़ा अपने-आप खुल गया...

घर्ररर...

अंदर घना अंधेरा था।

तभी अंधेरे से एक छोटी-सी लड़की बाहर आई।

उसने सफेद कपड़े पहन रखे थे, लेकिन उसके पैरों की जगह सिर्फ़ काला धुआँ था।

वह मुस्कुराई और बोली—

"तुम बहुत देर से आए हो..."

"टापू तुम्हारा इंतज़ार कर रहा था।"

इतना कहकर वह पल भर में गायब हो गई।

उसी समय किले के अंदर से किसी भारी आवाज़ ने पूरे जंगल को हिला दिया—

"अब खेल शुरू होगा..."

सभी लोग डरकर पीछे हट गए।

लेकिन जब उन्होंने पीछे मुड़कर देखा...

जिस रास्ते से वे आए थे...

वह रास्ता गायब हो चुका था।

अब उनके सामने सिर्फ़ काला किला था...

और पीछे अंतहीन जंगल।भागना अब नामुमकिन था।

अब आगे क्या होगा ? 😲😲

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