जन्म से ही हमारे भीतर कामवासना नाम की एक वृत्ति या प्रवृत्ति मौजूद रहती है। यह प्रकृति की अपनी व्यवस्था है कि जैसे-जैसे मनुष्य उम्र में आगे बढ़ता है, वैसे-वैसे यह प्रवृत्ति भी सक्रिय होती जाती है। प्रकृति का उद्देश्य सीधा है—जब व्यक्ति माता-पिता बनने की अवस्था में पहुँचे, तब वह संतान उत्पत्ति कर सके, ताकि सृष्टि की निरंतरता बनी रहे। यहाँ तक सब कुछ स्वाभाविक है। लेकिन जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं, हमारे जीवन में बाहरी प्रभाव भी प्रवेश करने लगते हैं—सिनेमा, अश्लील दृश्य, गंदी फिल्में और तरह-तरह के उत्तेजक माध्यम—जो इस प्रवृत्ति को आवश्यकता से अधिक भड़का देते हैं। और यदि बाहरी प्रभाव न भी हों, तो शरीर के भीतर हार्मोन तो हैं ही; इसलिए यह प्रवृत्ति किसी न किसी रूप में सामने आनी ही है। जो भीतर है, वह कभी न कभी बाहर प्रकट होगा ही।
अब मूल बात को समझते हैं। हमारे भीतर जो अहं बैठा है—“मैं”—वही इस पूरी प्रक्रिया का संचालन करता है। जैसे-जैसे व्यक्ति बड़ा होता है, अहं का विस्तार होता हैं और उसी विस्तार की श्रृंखला में एक साथी की चाह होने लगती है। वह प्रकृति में अपने लिए एक उपयुक्त शरीर खोजने लगता है—जिसे हम सुंदर लड़की या लड़का कहते हैं। अहं को लगता है कि मैं अकेला हूँ, कोई चाहिए जो मेरा अकेलापन दूर कर सके।
इसी विचार से "अहम" या "मैं" को लगता हैं कि मैं किसी के बहुत पास आ जाऊँ, तो शायद मुझे शांति मिल जाए। इसी तलाश में वह संबंध बनाता है। सच यह है कि वहाँ थोड़ी-सी शांति की झलक मिलती भी है, लेकिन वह क्षणिक होती है। और उसी के बाद कामवासना और अधिक तीव्र हो जाती है। यह कभी पूरी नहीं होती—बस एक बेहोशी की आदत बन जाती है।
जैसे ही अहम(मैं, मुझे) को इस छोटी-सी शांति का स्वाद लग जाता है, वह मान लेता है कि शायद यही शांति है, यही सब कुछ है। क्योंकि अहं हर समय शांति की खोज में रहता है और यहाँ उसे उसकी एक झलक मिल जाती है। फिर पूरा मन उसी के इर्द-गिर्द घूमने लगता है—बस एक बार और पास आ जाएँ, फिर नहीं चाहेंगे। लेकिन यह “फिर” कभी खत्म नहीं होता। इच्छा बार-बार उठती है, और उसकी पूर्ति कभी स्थायी नहीं होती। और जब इच्छा होती है लेकिन कोई उपलब्ध नहीं होता, तो वही कामवासना व्यक्ति को भीतर से खाने लगती है। बेचैनी बढ़ती है, विकृति जन्म लेती है। यही वह बिंदु है जहाँ जीवन नारकीय हो जाता है—कभी हिंसा के रूप में, कभी अश्लीलता के रूप में, कभी आत्म-विनाश के रूप में।
अहं का खेल बड़ा विचित्र है। जब तक कोई व्यक्ति अच्छा लगता है, तब तक उसका उपयोग किया जाता है, और जैसे ही मन भर जाता है, निगाहें कहीं और घूमने लगती हैं। क्योंकि जब रिश्ता केवल शरीर देखकर बनाया जाता है, तो वह शरीर तक ही सीमित रहता है। जब तक शरीर से सुख मिला, रिश्ता चला; जैसे ही सुख कम हुआ, नया शरीर खोज लिया गया। यह पूरा संबंध मन से नहीं, केवल देह से होता है।
अहं शरीर से इस कदर चिपका रहता है कि वह अपनी असलियत तक भूल जाता है। शरीर को सजाया जाता है, प्रस्तुत किया जाता है, ताकि सामने वाला फँस जाए। असल रूप छुपा लिया जाता है। और जब सामने वाला जुड़ जाता है, तब धीरे-धीरे असल चेहरा सामने आता है। यह सब केवल भोग की व्यवस्था है, प्रेम नहीं। अहं को उन चीज़ों में अधिक आनंद आता है जहाँ मेहनत कम और सुख अधिक हो—चाहे वह शराब हो, नशा हो, भोग हो या आलस्य। फिर जीवन भर वही दोहराव चलता रहता है, और अंत में वही व्यक्ति रोता है कि जीवन व्यर्थ चला गया।
इसका पूरा ढर्रा लगभग तय होता है—जन्म, पढ़ाई, पेट के लिए काम, थोड़ा डर, थोड़ा भगवान, फिर संतान, फिर उनकी शादी, और अंत में शरीर का अंत। लेकिन इस पूरी यात्रा में खुद को जानने का प्रयास ही नहीं होता। यहाँ यह कहने का अर्थ नहीं हैं कि जीवन के आवश्यक काम न किए जाएँ, बल्कि केवल इतना कि करने से पहले यह जाना जाए कि करने वाला कौन हैं? हमारे अंदर ऐसा कौन बैठा है जो ये सब करता हैं।
जिस शरीर से हम इतना चिपके रहते हैं, उसकी वास्तविकता को समझना भी ज़रूरी है। उसी शरीर को, जिससे हम जीवन भर पहचान बनाते हैं, प्राण निकलने के बाद कोई छूना भी पसंद नहीं करता। यदि वही शरीर कुछ दिन और रखा जाए, तो वह बीमारी फैलाने लगता है। जिस पर हमने जीवन भर इतना समय लगाया, यदि उसी समय का थोड़ा-सा हिस्सा किसी बड़े लक्ष्य, किसी ऊँची समझ में लगाया होता, तो जीवन की दिशा ही बदल सकती थी। इसका अर्थ यह नहीं कि शरीर की उपेक्षा की जाए, बल्कि यह कि शरीर को सब कुछ न समझा जाए। शरीर के भीतर जो है, उसे जाना जाए।
अब प्रश्न आता है कि कामवासना को कैसे समझा जाए? पहला और सबसे प्रभावी उपाय है—अपने आप को किसी बड़े लक्ष्य को सौंप देना। लक्ष्य इतना बड़ा हो कि फालतू सोचने और करने का समय ही न बचे। दूसरा, अपने आस-पास ऐसा वातावरण बनाना जो इस पागलपन को बढ़ावा न दे अर्थात् आप बिना खुद को जाने या कोई बिना आंतरिक स्पष्टता के सिर्फ शरीर के आधार पर आप किसी के साथ न हो। तीसरा, स्वयं को जानना, इस वृत्ति को समझना और ज्ञान के साथ रहना। शरीर को यह स्पष्ट रूप से बता देना कि उससे (शरीर आधारित संबंध) कुछ मिलने वाला नहीं है—केवल और बेचैनी के सिवा।
शारीरिक संबंध न अच्छा है, न बुरा—वह जैसा है, वैसा है। उसका मूल उद्देश्य संतान उत्पत्ति है। जिनका मन शांत होता है, उनके जीवन में यह सब सहज रहता है। ऋषियों के भी बच्चे हुए, लेकिन वहाँ बेचैनी नहीं थी, तड़प नहीं थी। सेक्स मिला तो ठीक, न मिला तो भी ठीक। मनोरंजन के लिए नहीं, उत्तरदायित्व के लिए। जब मन सहज नहीं होता, तब वही वृत्ति व्यक्ति को अंधा बना देती है।
सम्बन्ध में प्रेम प्रधान हो, सेक्स गौण। लेकिन इसके लिए मन को उस स्तर तक लाना पड़ेगा जहाँ एक दूसरे का रिश्ता शरीर से ज्यादा एक दूसरे के बोध, ज्ञान, कौशल, पर आधारित हो।
तब जो जब संतान आती है, तब माता-पिता को फिर से मानसिक रूप से छोटा बनना पड़ता है—बच्चे को समझने के लिए। एक माता-पिता का सबसे बड़ा धर्म यही है कि वह बच्चे को केवल दुनिया के लिए नहीं, बल्कि शांति और आत्म-बोध के लिए तैयार करे। अन्यथा बच्चे तो बहुत पैदा होते हैं, लेकिन ज़िम्मेदारी के बिना। आध्यात्म इसलिए माता-पिता की भी परिभाषा देता है—वही माता-पिता योग्य हैं जो स्वयं को जानते हों और बच्चे को भी उस दिशा में ले जा सकें।
यही कामवासना को समझने का सही तरीका है—दमन नहीं, पलायन नहीं, बल्कि समझ, संतुलन और आत्म-बोध।
~ कपिल तिवारी “यथार्थ”