धर्मराज की सभा
प्रथम अध्याय : यमलोक की आपातकालीन सभा
पृथ्वी पर पाप, भ्रष्टाचार, छल, कपट और अन्याय का ऐसा अंधकार फैल चुका था कि धर्म का संतुलन डगमगाने लगा था। मनुष्य अपनी बुद्धि और चतुराई के बल पर कानूनों को भी धोखा देने लगा था। धन, पद और स्वार्थ ने सत्य, करुणा और ईमानदारी को पीछे छोड़ दिया था। धर्म का वास्तविक स्वरूप धीरे-धीरे कर्मकाण्ड तक सीमित होता जा रहा था।
इन परिस्थितियों को देखकर धर्मराज यम गहरे चिंतन में डूब गए। युगों से न्याय करने वाले धर्मराज ने ऐसा समय पहले कभी नहीं देखा था। अंततः उन्होंने यमलोक में एक आपातकालीन देवसभा बुलाने का आदेश दिया।
कुछ ही क्षणों में यमलोक का विशाल सभामंडप देवताओं, देवियों, यक्षों, गंधर्वों, यमदूतों और दिव्य गणों से भर गया। मध्य में स्वर्णमय सिंहासन पर धर्मराज विराजमान थे। उनके दाहिनी ओर चित्रगुप्त अपने दिव्य कर्म-ग्रंथों के साथ उपस्थित थे।
सभा में पूर्ण शांति छा गई।
धर्मराज ने गंभीर स्वर में कहा—
"चित्रगुप्त! सभा की कार्यवाही प्रारंभ की जाए।"
चित्रगुप्त अपने आसन से उठे और दोनों हाथ जोड़कर बोले—
"आदरणीय देवगण एवं देवियों! आप सभी का इस विशेष सभा में स्वागत है।
आप सब भली-भाँति जानते हैं कि इस समय पृथ्वी पर भारी संकट का दौर चल रहा है। पाप और भ्रष्टाचार दिन-प्रतिदिन बढ़ते जा रहे हैं। मनुष्य इतना चतुर हो गया है कि अनेक बार हमारे दूत भी उसके छल और कपट से आश्चर्यचकित रह जाते हैं।
हमारे गण पूरी निष्ठा से अपने कर्तव्य का पालन करते हैं, फिर भी अनेक पापी अपने अपराधों को धर्म, दान और सेवा का आवरण पहनाकर समाज में सम्मानित बने हुए हैं।
ऐसा प्रतीत होता है कि समय के अनुसार हमारी व्यवस्था में भी कुछ आवश्यक परिवर्तन करना होगा। इसी विषय पर विचार करने के लिए आज यह विशेष सभा आयोजित की गई है।
अब मैं धर्मराज से निवेदन करता हूँ कि वे अपना मार्गदर्शन प्रदान करें।"
चित्रगुप्त के बैठते ही धर्मराज धीरे-धीरे अपने सिंहासन से उठे। उनकी गंभीर दृष्टि पूरी सभा पर घूमी। उनके मुख पर करुणा भी थी और न्याय का तेज भी।
उन्होंने कहना प्रारम्भ किया—
"देवगण!
अब वह समय नहीं रहा जब मनुष्य धर्म की खोज में निकल पड़ता था। वह स्वयं को जानने के लिए गुरु की शरण में जाता था। शास्त्र केवल पढ़े नहीं जाते थे, बल्कि जीवन में उतारे जाते थे।
आज धर्म का सार पीछे छूट गया है और कर्मकाण्ड आगे आ गया है। मनुष्य मंदिर तो बनाता है, पर अपने भीतर का मंदिर उजाड़ देता है। पूजा तो करता है, पर उसके व्यवहार में सत्य, करुणा और ईमानदारी दिखाई नहीं देती।
मनुष्य ने विज्ञान में अद्भुत प्रगति की है, परंतु उसी बुद्धि का उपयोग छल, कपट और स्वार्थ के लिए भी करने लगा है। कई बार तो वह अपने अपराधों को इतनी चतुराई से छिपा देता है कि पृथ्वी का न्याय भी भ्रमित हो जाता है।
हमारी नीति सदैव रही है कि प्रत्येक पापी को पश्चाताप और सुधार का अवसर दिया जाए। परंतु जब सुधार का अवसर ही दुर्बलता समझ लिया जाए, तब नीति में परिवर्तन आवश्यक हो जाता है।
अब समय आ गया है कि पाप करने वालों के मन में पुनः न्याय का भय जागृत हो।"
सभा में बैठे सभी देवता गंभीर हो गए। किसी के मुख से एक शब्द भी नहीं निकला।
कुछ क्षण मौन रहने के बाद धर्मराज ने चित्रगुप्त की ओर देखा और बोले—
"चित्रगुप्त! दो दिन पूर्व पृथ्वी से जो मनुष्य यहाँ लाया गया था, उसकी पूरी कथा इस सभा को सुनाइए। उसके जीवन का प्रत्येक कर्म देवसभा के सामने प्रस्तुत कीजिए। आज उसी घटना से हम सबको नई दिशा मिलेगी।"
चित्रगुप्त ने अपने दिव्य कर्म-ग्रंथ खोले। सभा की प्रत्येक दृष्टि अब उन्हीं पर टिकी थी।
उन्होंने गंभीर स्वर में कहना आरम्भ किया—
"महाराज! जिस मनुष्य की चर्चा होने जा रही है, उसका जीवन बाहर से जितना साधारण दिखाई देता था, भीतर से उतना ही भयावह था। उसके कारनामों के सामने बड़े-बड़े अपराधी भी छोटे प्रतीत होते हैं।
उसका नाम था—बाबा मोतीलाल।
आयु लगभग पचास वर्ष। शिक्षा—एम.बी.ए.। बुद्धि अत्यंत तीक्ष्ण, वाणी मधुर और व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली कि पहली भेंट में कोई भी उसे समाजसेवी समझ बैठता था।"
धर्मराज ने आश्चर्य से पूछा—
"एम.बी.ए. होकर भी ऐसा जीवन?"
चित्रगुप्त ने उत्तर दिया—
"हाँ महाराज। उसने अपनी शिक्षा का उपयोग समाज निर्माण में नहीं, बल्कि अपराध को उद्योग बनाने में किया।
उसने पूरे भारत में भिक्षावृत्ति के नाम पर एक विशाल अवैध नेटवर्क खड़ा कर दिया था। अलग-अलग राज्यों में उसके सैकड़ों एजेंट थे। बेरोजगार युवकों, गरीब और असहाय लोगों को अधिक कमाई का लालच देकर अपने गिरोह में शामिल किया जाता था।
इसके बाद उन्हें विशेष प्रशिक्षण दिया जाता था। कोई लंगड़े का अभिनय सीखता, कोई अंधे का, कोई गूँगे का, कोई विकलांग होने का। चेहरे पर कृत्रिम घाव बनाना, दर्दभरी आवाज़ निकालना और लोगों की करुणा जगाने की कला सिखाई जाती थी।
प्रशिक्षण इतना वास्तविक होता था कि बड़े-बड़े चिकित्सक भी पहली दृष्टि में धोखा खा जाते। कई पढ़े-लिखे बेरोजगार युवक भी अधिक कमाई के लालच में इस गिरोह का हिस्सा बन गए। उनसे अनुबंध कराया जाता, जिससे वे संगठन छोड़ न सकें।
महाराज! यह केवल भीख माँगना नहीं था, बल्कि मनुष्य की करुणा का व्यापार था।"
सभा में बैठे देवताओं के मुख पर आश्चर्य और पीड़ा एक साथ झलकने लगी।
धर्मराज ने पूछा—
"उसकी संपत्ति कितनी थी?"
चित्रगुप्त ने उत्तर दिया—
"सैकड़ों करोड़ रुपये। अनेक शहरों में आलीशान भवन, फ्लैट, कृषि भूमि, कंपनियों में निवेश और अपार धन-संपत्ति।
समाज उसे दानवीर कहता था, पर उसका साम्राज्य छल, भय और शोषण पर खड़ा था।"
यह सुनते ही पूरे सभामंडप में गहरा सन्नाटा छा गया।
चित्रगुप्त ने कर्म-ग्रंथ का अगला पन्ना खोला। उनके मुखमंडल पर पहले से भी अधिक गंभीरता थी।
उन्होंने धीमे स्वर में कहा—
"महाराज... यह तो उसके जीवन का केवल पहला पृष्ठ है।
उसके सबसे बड़े अपराध का वर्णन अभी शेष है। जब वह सत्य इस सभा के सामने आएगा, तब देवता भी आश्चर्यचकित रह जाएँगे और पृथ्वी पर बढ़ते अधर्म का वास्तविक स्वरूप सबके सामने प्रकट हो जाएगा..."
इतना कहकर चित्रगुप्त मौन हो गए।
पूरी सभा की दृष्टि अब उनके हाथों में खुले कर्म-ग्रंथ पर टिकी थी।
और यमलोक का वह दिव्य सभामंडप अगले उद्घाटन की प्रतीक्षा में निस्तब्ध खड़ा था...
क्रमशः...
Jayguru
वंदे पुरूषोत्तमम
Chandra satsang kendra
Bokaro ,Jharkhand