हमारे सभ्य समाज में प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी प्रकार से अपनी आजिविका कमाने के लिए प्रयासरत है। कुछ विशेष प्रवृति के प्राणी भी हमारे इसी समाज में पाये जाते हैं जो दिन-भर कुछ नहीं करते पर फिर भी उनकी जीवन की गाड़ी हिचकोले लेती हुई चलती रहती हैं। ऐसे ही एक महापुरूष इस कहानी के मुख्य प्रात्र श्रीमान हरीश चन्द्र माथुर जी है जिन्हें प्यार से घरवाले हन्सु पुकारतें है। कद-काठी से तो कोई विशेष व्यक्त्वि है नहीं इनका, छोटे कद के दरम्याने शरीर के है। रंग कुछ गेहुआं कह सकते हैं। हमारे और नौजवानों की भांति ये भी सिनेमा के कलाकारों से खासे प्रभावित हैं। साउथ सिनेमा के सुपरस्टार रजनीकांत के तो मानो इस दुनियां में यही एकमात्र फैन हों। उनकी हर स्टाईल, कपड़े पहनने का ढ़ग, चलने की अदा सब कुछ इन्होंने घोट-घोट कर पिया हुआ है। पिता के डर से रजनी के सिगरेट वाले स्टाईल को आमतौर पर ये छुप कर ही अंजाम देते हैं। इनका ज्यादातर समय अपने कमरे में बड़े से शीशे के सामने (जो हाल-फिलहाल में इन्होंने अपने एक मित्र से विशेषतौर से वाराणसी से मंगवाया है) व्यतीत होता है। आज भी ये उसी शीशे के सामने खडे होकर अपने नये हेयर स्टाईल को और संवारने की कोशिश में लगे है कि तभी नीचे से इनकी पूज्य माताजी इनको पुकारती हैं।
‘अरे हन्सु नीचे आ जा, तेरा नाश्ता ठंडा हो रहा है’
‘पता नहीं ये लड़का सारा दिन ऊपर कमरे में क्या करता रहता है’ नाश्ते की प्लेट को टेबल पर रखती हुई मां बुदबुदायी।
‘आ रहा हुं अम्मा’ थोड़ा खिजयाते हुआ हन्सु बोला।
अपनी नई शर्ट पर खुशबुदार परफ्यूम लगाकर नई फिल्म का गाना गुनगुनाते हुए हन्सु सीढ़ीयों से नीचे उतरा।
‘तु सारा दिन कहां भटकता रहता है हन्सु, कुछ देर जाकर पिताजी के साथ दुकान पर भी बैठ जाया कर, बेचारे सारा दिन हमारे लिए दुकान पर खटते रहते हैं’ मां ने कपड़े अलमारी में रखते हुए कहा।
‘मां तुम हर वक्त ये हन्सु-हन्सु मत बोला करो। अब में बड़ा हो गया हूं मुझे हरीश बोला करो’ हन्सु लगभग चिढ़ते हुये बोला।
मां थोड़ा मुस्कुराई और बोली ‘पगले मेरे लिए तो तु हमेशा ही बच्चा रहेगा चाहे कितना भी बड़ा हो जाये और ये तो तेरा बचपन का प्यारा सा नाम है’
‘पर मां मुझे ये नाम अब अच्छा नहीं लगता। सब मुझे इसी नाम से ही बुलाते हैं। अब तो काॅलेज वालों को भी इस नाम का पता चल गया है।’ रूआसां सा होकर हन्सु बोला।
‘अच्छा बाबा अब कुछ खा ले’ लाड करती हुई मां बोली। तभी घर के बाहर किसी बाईक के रूकने की आवाज से हन्सु चैंका। झांककर देखा तो उसका परम मित्र नरेश बाईक पर बाहर से अंदर झाकते हुए बोला ‘हन्सु कहां है भाई अभी तक तैयार नहीं हुआ क्या?’
‘आ रहा हूं’ जल्दी-जल्दी परांठे के टुकड़े को मुंह में ठुसता हुआ हन्सु बोला।
‘अरे-अरे नाश्ता तो आराम से कर ले बेटा’ मां चिल्लाई।
‘हो गया अम्मा’ लगभग भागता हुआ अपना बैग, चश्मा और कुछ जरूरत की चीजें लेता हुआ हन्सु बोला।
बाहर आकर बाईक पर बैठते हुए हन्सु ने नरेश का कहा ‘चल जल्दी अब’।
‘रोज तेरी वजह से ही लेट हो जाते हैं।’ गुस्से से नरेश ने कहा और बाईक स्र्टाट कर दी।
गली के मोड़ से निकलते ही हन्सु आखांे पर काला चश्मा लगा कर देवानंद का स्टाईल दिखाते हुए वो इधर-उधर देखने लगा की तभी गली के सामने वाली दुकान पर बैठे बच्चे ने आवाज दी-
‘ओ हन्सु भैया कहां के लिए निकले हो आज’ छिददू हलवाई की दूकान पर काम करने वाला गोली बोला।
‘तु चुपचाप अपना काम कर और चलते हुए टोका मत कर’ गुस्से से हन्सु बोला।
गोली...... यह भी इस कहानी का एक पात्र है। इसका नाम गोली कैसे पडा इसका तो किसी को भी नहीं पता। कोई इसे एक रात के अंधेरे में छिददू हलवाई की दूकान के बाहर बने चबूतरे पर छोड गया था। सुबह जब छिददू ने इसे कपडे़ में लिपटा देखा तो उसकी ममता जाग गई और उसने इसे अपने पास रख लिया। गोली सारा दिन दूकान के सामने से जाने वालों से फिरकी लेता रहता है, आवाज थोडी तेज है तो शायद इसी वजह से किसी ने इसका नाम गोली रख दिया होगा। चलिए अब कहानी को आगे की तरफ ले जाते है। बच्चे की तरफ आंखें तरेरते हुए हन्सु आगे की ओर बढ़ गया और थोड़ी देर में बाईक काॅलेज के सामने आकर रूकी जहाँ पहले से ही हन्सु के कुछ लफंगें यार उसका इंतजार कर रहे थे (इस बात से आप लोग ये मत समझना की हन्सु अभी भी काॅलेज में पढता है। तीन साल के काॅलेज को पांच साल में जैसे तैसे पास करने वाले हन्सु का मोह अभी भी काॅलेज से है पर वो मोह पढ़ाई से नहीं बल्कि यहां पढ़ने वाली सुन्दर लडकीयों से है)।
“अरे हन्सु आज कहां देर लगा दी, तेरे वाली अभी क्लास में गई है” - एक दोस्त उतावला सा होकर बोला।
”ओ हो..... आज फिर मिस कर गया यार। आज तो रोक कर बात करनी थी उससे” - हन्सु उदास सा होकर बोला।
हन्सु और उसके दोस्त रोज़ ही काॅलेज के सामने जमा होकर इसी तरह से लडकीयों को देखा करते थे और आपस में ही एक दुसरे के साथ उनका बटवारा भी कर लेते थे। ये अलग बात है की कोई भी लड़की उनको घास तक नहींे डालती थी बल्कि ये सभी उनके लिए हंसी का पात्र थे। उनकी हंसी को ये लोग पे्रम का आह्यवान समझ कर मन ही मन प्रसन्न होते और नादान भंवरों की तरह कालेज की इर्द-गिर्द मंडराते रहते।
अपने मौहल्ले में रहने वाली रजनी, जो इसी कालेज में पढ़ती थी, हन्सु भैया उसपर अपना दिल हार बैठे थे। उसको मन ही मन अपनी जीवन संगनी बनने का प्रण कर बैठे थे। परन्तु इसमें सबसे बडी कठिनाई थी की रजनी ठाकुर समाज से थी और दुसरा ये प्रेम अभी एकतरफा था। हन्सु रोज ही ये निश्च्य करके आता की आज तो रजनी से अपने दिल की बात कह ही देगा परन्तु उसको सामने पाकर उसकी हिम्मत जवाब दे जाती। अपने मौहल्ले में भी जब वो दिख जाती तो उसके मन में शहनाई सी बज उठती। उसको देखने को उसकी आंखें बैचेन रहती। लाख कोशिश करने पर भी वो उससे अपने मन की बात नहीं कह पाया। रजनी को भी उसके प्रति कोई लगाव कभी महसूस नहीं हुआ बस यही बात हन्सुं हमेशा खटकती थी। कालेज में भी जब रजनी किसी और लडके से हँस कर बात करती दिखाई देती थी तब मानो हन्सुं के दिल के कई टुकडे हो जाते थे।
एक दो बार हन्सु ने रजनी से बात करने की काशिश की। रजनी ने भी उसको बताया की वो जानती है की तुम मेरे ही मौहल्ले में रहते हो। बस इतनी सी बात हो सकी थी। कालेज की और लड़कियों ने रजनी को बताया की किस तरह हन्सु और उसके दोस्त सारा दिन कालेज के सामने डेरा जमाये बैठे रहते है और आने जाने वाली लड़कियों को किस प्रकार घुर-घुर कर देखा करतें है।
आज मंगल का दिन था। रोज की तरह हन्सु और उसके दोस्त कालेज के सामने जमे थे तभी सामने से रजनी एक सहेली के साथ उसकी ओर आती दिखाई दी। एक दोस्त ने हन्सु को कोहनी मारते हुए कहा -
भाई तेरे वाली यहीं आ रही है।
रजनी को अपनी ओर आते देख हन्सु ने हाथ में लगी सिगरेट फेंक दी और मुंह को रूमाल से साफ करने लगा।
रजनी को देख कर उसका मन जोर-जोर से धडक रहा था। उसको अपने प्रेम की डूबी कश्ती के पार लगने की उम्मीद जागती सी दिखाई दी।
तुम पहले इसी कालेज में पढ़ते थे हरीश - रजनी ने हन्सु की ओर देखते हुए कहा।
हाँ.....उउउउउ जी - थोड़ा सकपकाते हुए हन्सु ने जवाब दिया।
तो आजकल यहां क्यों बैठे रहते हो, कुछ काम या जाॅब नहीं शुरू की अभी तक - रजनी थोडा मुस्कुराते हुए बोली।
जी.... जाॅब की जरूरत नहीं है। मेरे पिताजी का अपना बिजनेस है - हन्सु ने माथे का पसीना पोछते हुए जवाब दिया।
ओ के, यह कहती हुई रजनी थोड़ा हँसती हुई अपनी सहेली के साथ चली गई पर उसकी ये हँसी पता नहीं क्यों हन्सु के दिल पर एक चोट सी कर गई। दुसरों की बात को कभी भी गंभीरता से न लेने बाला हन्सु इस बात को लेकर कुछ ज्यादा ही संजिदा हो गया।
इस घटनाक्रम को अभी कुछ ही समय बीता था कि एक और सनसनीखेज घटना ने रूद्ररूप धारण कर लिया। काॅलेज की एक लड़की को हन्सु की मित्र मंडली के एक सदस्य ने छेड़ दिया और बात हद से आगे बढ़ गई। पूरे काॅलेज में हंगामा हो गया। यह परिस्थिति देख कर हन्सु और उसके मित्र मैदान छोड कर भाग निकले। हन्सु अभी घर के किनारे तक ही पहुंचा था कि यकायक उसे रजनी अपने माता-पिता के साथ अपने घर के दरवाजे की ओर जाती दिखी। हन्सु को तो मानो काटे खुन नहीं। उसकी जान तो हलक तक आ गई। आज तो मारे गये-मन ही मन उसने सोचा। उसको घरवालों का डर नहीं था परन्तु रजनी के पिता के सामने अपनी नाक नहीं कटवाना चाहता था। अपने धडकते दिल को सम्हालता हुआ हन्सु घर की ओर बढ़ा। मन ही मन अपने दोस्तों को कोस रहा था कि सालों ने मेरे प्यार की नैया को आखिर डुबो ही दिया। खैर अब हो ही क्या सकता है, मन को दिलासा देता हुआ सारे भगवानों देवी देवताओं को याद करता हुआ उनकी मिन्नतें करतो हुआ वो घर के अंदर दाखिल हुआ। सामने रजनी और उसके पिता कुर्सी पर बैठे थे तथा रजनी की माताजी हन्सु की मां के साथ खडी थी और उनके सामने पिताजी गंभीर मुंद्रा में.....
कमाल है पिताजी इस समय घर में कैसे। ये तो भूकंप के आने पर भी दुकान को नहीं छोडते- हन्सु ने मन ही मन सोचा। सामने के नजारे को देख कर उसका मन कुछ भारी सा होने लगा। पिताजी का इस समय यहां होना किसी तूफान के आगमन का प्रतीक लग रहा था और ऊपर से उनके चेहरे की खामोशी हन्सु के कलेजे को कंपाने के लिए काफी थी।
अरे हरीश बेटा आ गए तुम..... मां ने हन्सु को देखकर पुकारा।
सभी की नजरें हन्सु की ओर घुम गई। घर के माहौल को देखकर लग रहा था की काॅलेज वाला बवंडर अभी यहां भीं पहुंच गया है। एकाएक पिताजी घूमे और गम्भीर स्वर में बोले - कहां से आ रहे हो तुम इस समय। इस सवाल को सुनकर हन्सु की जान मानो हलक में अटक गई हो।
जी ईउउउउउ... यहीं पास में ही था दोस्तों के साथ - हन्सु थोड़ा अपने आप को सम्हालते हुए बोला।
ये सब में क्या सुन रहा हूं....तुम सारा दिन काॅलेज के गेट के आगे अपने दोस्तो के साथ बैठे रहते हो और अपना समय बर्बाद करते रहते हो - पिताजी थोडी आंखों को तरेरकर बोले।
नहीं पिताजी ऐसा कुछ भी नहीं है। बस थोडी देर अपने दोस्तों के पास चला जाता हूं।
हन्सु अब अपने उपर आने वाली मिसाईल के वार को झेलने के लिए अपने आप को तैयार कर रहा था कि अचानक सब खिलखिलाकर हंसने लगे।
अब बस भी करो आप लोग, देखो तो बेचारे के चेहरे का रंग तक उड़ गया है... मां ने मुस्कुराते हुए कहा।
तभी पिताजी ने मेरी ओर देखते हुए कहा - ’’हरीश भंडारी साहब हमारी सोसाइटी के सभ्य नागरिक है और मैं भी लगभग 30-32 साल से इन्हें पहचानता हूं। ये भंडारी जी की बेटी रजनी है और ये भी तुम्हारे ही काॅलेज से पढ़ी है। मैनें और भंडारी जी ने तुम दोनों की शादी पक्की कर दी है। अब तुम दोनों ही शादी के लायक हो गये हो और दोनों ने अपना काॅलेज भी खत्म कर लिया है उम्मीद है की तुम दोनों को भी हमारी ये बात पसंद होगी।’’ पिताजी की यह बात सुनकर हन्सुं का मन मयूर नाच उठा। उसकी तो मानो मन मांगी इच्छा पूरी हो गयी हो। शरमाते हुए घीरे से बोला आप लोग बड़े है जैसा आप लोगों को अच्छा लगे। मेहमानों के घर से जाते ही हन्सु ने यह खुशखबरी तुरंत अपनी मित्र मंडली में प्रसारित कर दी। जल्द ही यह खबर पूरे मौहल्ले और हन्सु के काॅलेज में जंगल की आग की तरह फैल गयी। एक के बाद एक दोस्तों (और साथ ही हन्सु के प्रेम में रोडा बनने वाले दुश्मनों) के फोन पर बधाई देने का सिलसिला शुरू हो गया। दोस्त जहाँ इस ख़बर से प्रसन्न थे हन्सु के दुश्मनों की छाती पर सांप लोट रहा था। बुझे मन से सब उसको बधाई दे रहे थे।
इस बात को लगभग एक सप्ताह बीत गया। अब जब भी हन्सु घर से बाहर निकलता तो सीना चैड़ा करके निकलता और उसको ऐसा लगता मानो उसको पदम्श्री से नवाज़ दिया गया हो, आखिर हो भी क्यों ना मौहल्ले की जिस लड़की के पीछे सारे लड़के लगे हुए थे अब उसका विवाह हन्सु से जो हो रहा था। यह समय का ही फेर था जिसको सोच कर हन्सु मन ही मन मुस्कुराता था कि जिस लड़की से बात तक करने को वह कई-कई घन्टे काॅलेज के बाहर बैठा रहता था और जिससे बात तक करने की उसकी हिम्मत नहीं पड़ती थी अब उससे रोज़ कई घन्टे फोन पर भी बात होती है और वही रजनी अब उसकी हमसफ़र बनने जा रही है। एक लम्बे इंतजार के बाद आखिरकार वो घड़ी भी आ गई जिसका हन्सु को बेसब्री से इन्तजार था। आज उसका और रजनी का परिणय था। दोनो ने आंखों में एक उज्जवल भविष्य के सपने संजोते हुए ईश्वर को साक्षी मानकर अग्नि के फेरे लेकर एक नए जीवन का आरंभ किया।
- राकेश शर्मा