बंद लिफाफा - 4 Digant J Patel द्वारा थ्रिलर में हिंदी पीडीएफ

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बंद लिफाफा - 4

सुबह के छह बज चुके थे।
पहाड़ी के नीचे टूटी हुई जीप के पास अनिकेत अकेला खड़ा था।
इंस्पेक्टर राघव का कोई पता नहीं था।
चारों तरफ़ सिर्फ़ धुआँ...
टूटा हुआ शीशा...
और जीप के दरवाज़े पर उँगली से लिखा हुआ संदेश—
"राघव हमारे साथ है..."
अनिकेत ने फिर से वह धातु की प्लेट उठाई।
उस पर उभरा हुआ चिन्ह था—
एक सफेद लिफाफा... और उसके चारों ओर बना हुआ एक गोल घेरा।
नीचे सिर्फ़ दो शब्द लिखे थे—
THE CIRCLE
तभी पीछे से किसी ने कहा—
"अगर ज़िंदा रहना है...
तो उस निशान को अभी फेंक दो।"
अनिकेत पलटा।
करीब साठ साल का एक बूढ़ा आदमी वहाँ खड़ा था।
सफेद दाढ़ी...
कंधे पर पुराना बैग...
और आँखों में अजीब-सी बेचैनी।
"आप कौन हैं?"
बूढ़े ने धीरे से कहा—
"मेरा नाम कबीर है..."
"और तीस साल पहले...
मैं भी 'द सर्कल' का हिस्सा था।"
अनिकेत उसे पास के एक पुराने चर्च में ले गया।
कबीर ने बैग से एक मोटी डायरी निकाली।
उसके पहले पन्ने पर लिखा था—
"द सर्कल नियमों से चलता है। जो नियम तोड़ता है... वह मरता नहीं... गायब हो जाता है।"
अनिकेत ने पूछा—
"द सर्कल है क्या?"
कबीर कुछ पल चुप रहे।
फिर बोले—
"यह कोई गैंग नहीं...
कोई कंपनी नहीं...
यह ऐसे लोगों का गुप्त संगठन है...
जो सरकारों से भी ऊपर रहकर फैसले लेते हैं।"
"उनका काम है...
कुछ सच दुनिया से हमेशा के लिए छिपाना।"
"और मेरा इससे क्या संबंध है?"
अनिकेत ने पूछा।
कबीर ने जेब से एक पुरानी फोटो निकाली।
वही तस्वीर...
जो लिफाफे में मिली थी।
लेकिन इस बार फोटो पूरी थी।
उसमें अनिकेत के माता-पिता के साथ...
एक और आदमी खड़ा था।
काले सूट में...
चेहरे पर हल्की मुस्कान।
कबीर ने तस्वीर पर उँगली रखी।
"इसे पहचानते हो?"
"नहीं।"
कबीर ने गहरी साँस ली।
"यही...
द सर्कल का संस्थापक था।"
अनिकेत ने तस्वीर पलटी।
पीछे एक नाम लिखा था—
"आदित्य राय"
उसी पल...
कबीर के चेहरे का रंग उड़ गया।
चर्च की खिड़की से एक लाल लेज़र डॉट उसके सीने पर आकर रुका।
स्नाइपर!
अनिकेत चिल्लाया—
"नीचे झुको!"
लेकिन देर हो चुकी थी।
धाँय!
गोली चली।
कबीर ज़मीन पर गिर पड़े।
मरने से पहले उन्होंने अनिकेत का हाथ पकड़ा।
जेब से एक छोटी-सी पीतल की चाबी निकाली।
उस पर खुदा था—
LOCKER – 307
कबीर ने टूटती साँसों में कहा—
**"तुम्हारे सवालों का जवाब... इस चाबी में नहीं... उस लॉकर में है..."
"लेकिन याद रखना..."
"जिस दिन तुम लॉकर खोलोगे..."
"उस दिन...
द सर्कल भी तुम्हें ढूँढ़ लेगा..."
इतना कहकर कबीर की साँस रुक गई।
अनिकेत ने चाबी कसकर पकड़ ली।
उसी समय उसका मोबाइल बजा।
स्क्रीन पर कोई नंबर नहीं था।
सिर्फ़ लिखा था—
PRIVATE CALL
उसने कॉल उठाया।
दूसरी तरफ़ एक शांत आवाज़ आई।
**"अनिकेत... तुम बहुत आगे आ चुके हो।"
"अब वापस लौटना संभव नहीं।"
अनिकेत गुस्से में बोला—
"तुम लोग चाहते क्या हो?"
कुछ सेकंड सन्नाटा रहा।
फिर वही आवाज़ बोली—
**"हम तुम्हें मारना नहीं चाहते..."
"हम चाहते हैं...
कि तुम हमारी जगह संभालो।"**
अनिकेत के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
"क्या मतलब?"
आवाज़ हँसी...
और बोली—
**"क्योंकि...
तुम्हें चुना नहीं गया...
तुम्हारा जन्म ही इसके लिए हुआ था।"
कॉल कट गया।
अनिकेत स्तब्ध खड़ा रह गया।
क्या उसके माता-पिता की मौत...
सिर्फ़ एक हादसा नहीं...
बल्कि उसकी ज़िंदगी की शुरुआत थी?

और सबसे बड़ा सवाल—
आख़िर अनिकेत कौन था... सच में?

रात के 11:40 बज रहे थे।
बारिश लगातार हो रही थी।
कबीर की मौत के बाद अनिकेत के पास सिर्फ़ एक ही सुराग बचा था...
पीतल की छोटी-सी चाबी।
उस पर उकेरा हुआ था—
LOCKER – 307
कबीर के आख़िरी शब्द बार-बार उसके कानों में गूँज रहे थे—
"लॉकर खुलते ही... खेल बदल जाएगा।"
अगली सुबह...
अनिकेत शहर के सबसे पुराने रेलवे स्टेशन पहुँचा।
स्टेशन के पीछे अंग्रेज़ों के ज़माने की एक इमारत थी।
बाहर जंग लगा बोर्ड टंगा था—
"सेंट्रल सेफ डिपॉज़िट वॉल्ट"
यह जगह लगभग बंद हो चुकी थी।
अंदर सिर्फ़ एक बूढ़ा चौकीदार बैठा था।
अनिकेत ने चाबी दिखाई।
चौकीदार का चेहरा अचानक बदल गया।
उसने घबराकर पूछा—
"यह चाबी तुम्हें किसने दी?"
"कबीर ने।"
यह नाम सुनते ही चौकीदार कुछ पल के लिए चुप हो गया।
फिर धीरे से बोला—
"तो... वह भी चला गया।"
चौकीदार अनिकेत को नीचे बने पुराने तहख़ाने में ले गया।
लोहे की लंबी गलियारे में दोनों चलते रहे।
हर तरफ़ सैकड़ों लॉकर थे।
आख़िरकार...
वे 307 के सामने रुके।
चौकीदार ने कहा—
"मैं तीस साल से इस लॉकर की रखवाली कर रहा हूँ।"
"लेकिन इसे खोलने वाला आज तक कोई नहीं आया।"
अनिकेत ने काँपते हाथों से चाबी ताले में डाली।
टक...!
ताला खुल गया।
धीरे-धीरे उसने लॉकर खोला।
अंदर सिर्फ़ तीन चीज़ें थीं।
एक पुरानी वीडियो कैसेट।
एक डायरी।
और...
एक छोटा-सा जन्म प्रमाणपत्र।
अनिकेत ने सबसे पहले जन्म प्रमाणपत्र उठाया।
उसकी आँखें फैल गईं।
उस पर लिखा था—
नाम : आर्यन
पिता : अज्ञात
माता : अज्ञात
नीचे लाल मुहर लगी थी—
"नया नाम दिया गया – अनिकेत मल्होत्रा।"
अनिकेत के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
"नहीं..."
"यह झूठ है..."
"मैं... अनिकेत नहीं हूँ?"
तभी...
चौकीदार बोला—
"तुम्हें सच कभी नहीं बताया गया।"
"तुम्हें गोद नहीं लिया गया था..."
"तुम्हें छिपाया गया था।"
अनिकेत ने तुरंत डायरी खोली।
पहले पन्ने पर लिखा था—
"अगर यह डायरी मेरे बेटे तक पहुँचे... तो समझ लेना... मैं हार गया।"
नीचे हस्ताक्षर थे—
आदित्य राय
वही नाम...
जो तस्वीर के पीछे लिखा था।
अनिकेत तेज़ी से पन्ने पलटने लगा।
एक जगह लिखा था—
"द सर्कल का नया उत्तराधिकारी मेरा बेटा होगा।"
"लेकिन अगर संगठन मेरे खिलाफ़ हो जाए... तो उसे नई पहचान देकर दुनिया से छिपा देना।"
अनिकेत के हाथ काँपने लगे।
"मतलब..."
"आदित्य राय..."
"मेरे पिता थे?"
उसी समय...
तहख़ाने की सारी लाइटें बुझ गईं।
पूरा गलियारा अँधेरे में डूब गया।
फिर...
एक परिचित आवाज़ गूँजी—
"आख़िरकार... तुम्हें सच मिल ही गया..."
अनिकेत ने टॉर्च जलाई।
सामने...
काले सूट में एक आदमी खड़ा था।
चेहरे पर वही हल्की मुस्कान...
जो पुरानी तस्वीर में थी।
अनिकेत की साँस रुक गई।
"न... नहीं..."
"तुम..."
आदमी मुस्कुराया।
**"हाँ..."
"मैं ही हूँ..."
"आदित्य राय।"
अनिकेत के हाथ से डायरी गिर गई।
"लेकिन..."
"तुम तो मर चुके थे!"
आदित्य धीरे-धीरे उसकी तरफ़ बढ़ा।
फिर बोला—
"यही तो सबसे बड़ा झूठ था..."
**"जिस आदमी का अंतिम संस्कार हुआ था..."
"वह मैं नहीं था।"
उसी पल...
तहख़ाने का भारी दरवाज़ा अपने-आप बंद हो गया।
धड़ाम...!
आदित्य ने जेब से एक सफ़ेद लिफाफा निकाला...
और अनिकेत की तरफ़ बढ़ाते हुए मुस्कुराकर कहा—
**"अब फैसला तुम्हारा है..."
"बेटे..."