बेसमेंट का भारी लोहे का दरवाज़ा अपने-आप बंद हो चुका था।
धड़ाम...!
आवाज़ इतनी तेज़ थी कि पूरी इमारत काँप उठी।
अनिकेत ने घबराकर दरवाज़ा खोलने की कोशिश की।
लेकिन दरवाज़ा बाहर से लॉक हो चुका था।
चारों तरफ़ घना अँधेरा...
सिर्फ़ इंस्पेक्टर राघव की टॉर्च की हल्की रोशनी।
और उसी रोशनी में...
दीवार पर लाल रंग से लिखा था—
"WELCOME, ANIKET"
अनिकेत की धड़कनें तेज़ हो गईं।
"यहाँ मेरा नाम किसने लिखा?"
तभी...
अँधेरे में किसी के ताली बजाने की आवाज़ आई।
ठक... ठक... ठक...
फिर वही भारी आवाज़...
"तुम ठीक समय पर आए हो..."
राघव ने तुरंत अपनी पिस्तौल निकाल ली।
"कौन है? सामने आओ!"
लेकिन कोई दिखाई नहीं दिया।
कुछ सेकंड बाद...
बेसमेंट की पुरानी ट्यूब लाइट अपने-आप जल उठी।
अनिकेत ने चारों तरफ़ देखा...
और उसकी साँस अटक गई।
पूरे कमरे की दीवारों पर...
सैकड़ों सफ़ेद लिफाफे टंगे हुए थे।
हर लिफाफे पर किसी न किसी इंसान का नाम लिखा था।
कुछ नामों पर लाल रंग का निशान बना था...
कुछ बिल्कुल नए लग रहे थे।
अनिकेत धीरे-धीरे आगे बढ़ा।
उसने एक लिफाफा उठाया।
उस पर लिखा था—
"रोहन शर्मा"
उसका दिल ज़ोर से धड़कने लगा।
उसने दूसरा लिफाफा देखा।
उस पर लिखा था—
"इंस्पेक्टर राघव"
राघव भी सन्न रह गए।
"मेरा... नाम?"
तभी...
अनिकेत की नज़र सबसे आख़िरी लिफाफे पर गई।
उसके हाथ काँपने लगे।
उस पर लिखा था—
"अनिकेत मल्होत्रा"
और नीचे...
लाल स्याही से लिखा था—
"29 दिन बाकी..."
"यह सब क्या है?"
अनिकेत चीख पड़ा।
तभी...
कमरे के कोने में रखा एक पुराना रेडियो अपने-आप चालू हो गया।
उसमें से एक धीमी आवाज़ आने लगी—
"अगर तुम यह सुन रहे हो... तो समझ लो... तुम चुने जा चुके हो..."
"हर तीस साल बाद...
एक नया खिलाड़ी चुना जाता है।"
"जो खेल पूरा करेगा...
वह ज़िंदा रहेगा।"
"जो हार जाएगा...
उसका नाम भी इस दीवार पर हमेशा के लिए टँग जाएगा..."
आवाज़ अचानक बंद हो गई।
राघव ने तुरंत पूरी दीवार की जाँच शुरू की।
उन्हें एक पुरानी लकड़ी की अलमारी मिली।
अलमारी पर भारी ताला लगा था।
राघव ने गोली मारकर ताला तोड़ दिया।
अंदर...
पुरानी डायरी...
कुछ तस्वीरें...
और एक वीडियो कैसेट रखी थी।
डायरी का पहला पन्ना खुला।
उस पर तारीख़ थी—
17 जुलाई 1996
नीचे लिखा था—
"अगर कोई यह डायरी पढ़ रहा है... तो शायद मैं अब ज़िंदा नहीं हूँ।"
"मेरा नाम...
विक्रम है।"
"और मुझे भी यही सफ़ेद लिफाफा मिला था..."
अनिकेत और राघव एक-दूसरे को देखने लगे।
मतलब...
यह खेल सचमुच तीस साल पुराना था।
तभी...
ऊपर की मंज़िल से किसी के दौड़ने की आवाज़ आई।
धम... धम... धम...
राघव बोले—
"यहाँ कोई और भी है!"
दोनों दौड़ते हुए सीढ़ियों की तरफ़ बढ़े।
जैसे ही वे ऊपर पहुँचे...
उन्हें एक काले कपड़ों में आदमी दिखाई दिया।
उसने चेहरा मास्क से ढका हुआ था।
वह हाथ में वही पुरानी डायरी लेकर भाग रहा था।
"रुको!"
राघव चिल्लाए।
लेकिन वह आदमी खिड़की से कूद गया।
अनिकेत और राघव बाहर पहुँचे...
सड़क खाली थी।
कोई नहीं।
सिर्फ़ एक काली कार...
जो तेज़ी से अँधेरे में गायब हो रही थी।
अनिकेत वापस बेसमेंट में लौटा।
उसे लगा...
शायद कोई सुराग छूट गया हो।
तभी...
उसे फ़र्श पर एक पुरानी तस्वीर मिली।
तस्वीर में पाँच लोग खड़े थे।
बीच में एक छोटा बच्चा था।
पीछे लिखा था—
"सेंट जोसेफ अनाथालय – 1996"
अनिकेत तस्वीर को ध्यान से देखने लगा।
अचानक...
उसकी आँखें फैल गईं।
उस तस्वीर में...
एक आदमी बिल्कुल इंस्पेक्टर राघव जैसा दिख रहा था।
अनिकेत ने तस्वीर राघव को दिखाई।
राघव का चेहरा सफेद पड़ गया।
उन्होंने काँपती आवाज़ में कहा—
"यह... मैं नहीं हूँ..."
"यह...
मेरा बड़ा भाई, अर्जुन है।"
अनिकेत हैरान रह गया।
"लेकिन आपने तो कभी बताया ही नहीं कि आपका कोई भाई था!"
राघव ने गहरी साँस ली...
और धीरे से कहा—
"क्योंकि... तीस साल पहले... वह मर चुका था..."
उसी क्षण...
बेसमेंट की सारी लाइटें एक साथ बुझ गईं।
पूरा कमरा फिर अँधेरे में डूब गया।
और अँधेरे में...
किसी ने फुसफुसाकर कहा—
"राघव... तुमने झूठ बोला है..."
राघव का चेहरा डर से जम गया।
क्योंकि...
यह आवाज़ उसके मृत भाई अर्जुन की थी।
बेसमेंट पूरी तरह अँधेरे में डूब चुका था।
सिर्फ़ इंस्पेक्टर राघव की टॉर्च जल रही थी।
लेकिन...
टॉर्च की रोशनी भी बार-बार झिलमिला रही थी।
अचानक...
फिर वही आवाज़ आई—
"राघव... तुमने मुझे मरने के लिए छोड़ दिया था..."
राघव के हाथ से पिस्तौल गिर गई।
अनिकेत ने पहली बार इंस्पेक्टर राघव को डरते हुए देखा।
"सर... यह आवाज़ किसकी है?"
राघव काँपती आवाज़ में बोले—
"मेरे... भाई अर्जुन की..."
"लेकिन... यह असंभव है।"
"मैंने उसकी लाश अपनी आँखों से देखी थी।"
उसी समय...
बेसमेंट के सबसे आख़िरी कमरे का दरवाज़ा अपने-आप खुल गया।
चूँ... चूँ...
अंदर से हल्की पीली रोशनी आ रही थी।
दोनों धीरे-धीरे अंदर पहुँचे।
कमरा बिल्कुल खाली था।
बीच में सिर्फ़ एक पुरानी लकड़ी की कुर्सी...
और उसके सामने एक टेबल।
टेबल पर एक टेप रिकॉर्डर रखा था।
उस पर एक चिट्ठी चिपकी थी—
"PLAY ME"
राघव ने काँपते हाथों से बटन दबाया।
रिकॉर्डिंग शुरू हुई।
कुछ सेकंड तक सिर्फ़ साँसों की आवाज़ आती रही।
फिर...
एक आदमी बोलने लगा।
"अगर यह रिकॉर्डिंग चल रही है... तो इसका मतलब है कि मैं मर चुका हूँ..."
"मेरा नाम अर्जुन है..."
राघव की आँखें फैल गईं।
रिकॉर्डिंग में आगे आवाज़ आई—
"राघव... अगर तुम यह सुन रहे हो... तो इसका मतलब है... तुम सच से अब भी भाग रहे हो..."
राघव ज़ोर से चिल्लाए—
"नहीं...!"
"यह झूठ है!"
लेकिन रिकॉर्डिंग चलती रही।
**"मैं दुर्घटना में नहीं मरा था..."
"मुझे... मारने की कोशिश की गई थी।"
अनिकेत स्तब्ध रह गया।
राघव के माथे पर पसीना आ गया।
रिकॉर्डिंग में अर्जुन ने एक और नाम लिया...
**"जिस आदमी ने मुझे मारने की कोशिश की... उसका नाम था..."
अचानक...
टक...!
रिकॉर्डर बंद हो गया।
बैटरी खत्म।
पूरा कमरा फिर सन्नाटे में डूब गया।
"नाम क्या था?"
अनिकेत ने घबराकर पूछा।
राघव बिना कुछ बोले रिकॉर्डर को घूरते रहे।
तभी...
उनकी नज़र कमरे के कोने में रखी एक पुरानी अलमारी पर पड़ी।
अलमारी का दरवाज़ा आधा खुला था।
उन्होंने उसे खोला...
अंदर...
सैकड़ों फाइलें थीं।
हर फ़ाइल पर एक तारीख़।
और हर तारीख़ के साथ...
एक मौत।
अनिकेत ने एक फ़ाइल निकाली।
उसमें रोहन की तस्वीर लगी थी।
नीचे लिखा था—
"स्थिति : समाप्त"
उसने दूसरी फ़ाइल निकाली।
उसमें अपना फोटो देखकर उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
नीचे लिखा था—
"स्थिति : प्रक्रिया जारी..."
और सबसे नीचे...
लाल अक्षरों में लिखा था—
"30वाँ दिन – अंतिम फैसला।"
उसी समय...
राघव को एक और फ़ाइल मिली।
उस पर लिखा था—
"अर्जुन राघव सिंह"
राघव ने जल्दी से फ़ाइल खोली।
पहला पन्ना खाली था।
दूसरे पन्ने पर सिर्फ़ एक लाइन लिखी थी—
"अगर तुम यह पढ़ रहे हो... तो असली गुनहगार तुम्हारे बहुत करीब है..."
तीसरे पन्ने पर...
एक पुरानी तस्वीर चिपकी थी।
तस्वीर में...
अर्जुन...
राघव...
और उनके साथ एक तीसरा आदमी खड़ा था।
उस तीसरे आदमी का चेहरा काले मार्कर से पूरी तरह मिटा दिया गया था।
राघव धीरे से बोले—
"मुझे याद है...
इस फोटो में कौन था..."
अनिकेत ने पूछा—
"कौन?"
राघव कुछ बोल पाते...
उससे पहले...
बाहर ज़ोरदार धमाका हुआ।
धड़ाम...!
पूरी इमारत हिल गई।
छत से मिट्टी गिरने लगी।
दोनों बाहर भागे।
उन्होंने देखा...
जिस जीप से वे आए थे...
वह आग में जल रही थी।
और उसकी बोनट पर...
लाल रंग से लिखा था—
"अगली बारी... राघव की।"
उसी पल...
अनिकेत के मोबाइल पर एक मैसेज आया।
UNKNOWN NUMBER
उसने काँपते हाथों से मैसेज खोला।
उसमें सिर्फ़ एक फोटो थी।
फोटो देखकर...
उसके हाथ सुन्न पड़ गए।
वह फोटो...
आज सुबह की थी।
उसमें अनिकेत और राघव इसी अनाथालय के अंदर खड़े थे।
मतलब...
कोई पूरे समय उन्हें देख रहा था।
और फोटो के नीचे सिर्फ़ एक लाइन लिखी थी—
"पीछे मुड़कर मत देखना..."
अनिकेत का दिल ज़ोर से धड़कने लगा...
क्योंकि...
उसने वह मैसेज पढ़ते ही...
अनजाने में पीछे मुड़कर देख लिया...
और वहाँ...
अँधेरे में...
एक आदमी खड़ा मुस्कुरा रहा था