*शीर्षक: दादी के हाथ का जादूई अचार*
*लेखक: आकांक्षा दुबे*
गर्मी की छुट्टी थी। गांव में आम के पेड़ के नीचे ढेर सारे कच्चे आम पड़े थे। मैं भाग के दादी के पास गई और बोली "दादी आज अचार बनाएंगे?" दादी हंस के बोली "हां मेरी गुड़िया, चल चाकू ले आ।"
दादी का अचार पूरे गांव में मशहूर था। जो एक बार खा लेता, वो स्वाद जिंदगी भर नहीं भूलता था। इतना लजीज था कि आज भी बुजुर्ग बैठ के याद करते हैं "दादी के हाथ वाला आम का अचार... हाय क्या बात थी!"
दादी के पास न कोई किताब थी, न मोबाइल। बस हाथ और अंदाजा। नमक इतना... मिर्च उतनी... हल्दी "थोड़ी सी"। मैं पूछती "दादी माप क्या है?" दादी बोलती "बेटा माप दिल से होता है, तराजू से नहीं।" दादी के मसाले ओखली में कूटते थे। सरसों के बीज, साफ किया हुआ तेल... उसकी खुशबू अलग ही होती थी। कूटते ही पूरा घर महक उठता था। लगता था जैसे लक्ष्मी खुद आ गई हो।
दादी जब भी अचार बनाने की तैयारी करती, मैं उनके पीछे-पीछे लग जाती थी। वो बगीचे से कच्चे आम तोड़ के लाती, काट के हल्दी-नमक लगा के धूप में सुखाने डाल देती।
हम सब भाई-बहन तभी से छुप-छुप के खाना शुरू कर देते। थोड़ी डांट भी पड़ती। दादी बोलती "अरे रुक जाओ! अचार बना भी नहीं और तुम लोग शुरू हो गए। बन तो जाने दो!"
लेकिन हमें कहां चैन था। हम तो छुप-छुप के ही खाते रहते। और जब दादी अचार बना के कांच के डब्बे में भर के धूप में रख देती, बोलती "कुछ दिन बाद खाना, अभी कच्चे हैं मसाले"... फिर भी हम कहां मानते। हमें तो बस खाना था।
अब दादी बूढ़ी हो गई हैं। अच्छे से चल फिर नहीं पाती क्योंकि अब उनकी उम्र हो गई है। पर उनका अंदाज अभी भी जिंदा है। अब वो मम्मी को सिखाती हैं कैसे बनाना है। मम्मी भी बहुत अच्छा बना लेती हैं... लेकिन वो बात कहां।
आज भी जब अचार खाती हूं ना, दादी सामने बैठ के हंसती हैं। बोलती हैं "बेटा माप दिल से होता है"। मैं उनके हाथ पकड़ लेती हूं... और सोचती हूं कि दादी तुम हो ना, तो मेरी जिंदगी का अचार कभी खराब नहीं होगा। दादी तुम लंबी उम्र जियो... और रोज नया नुस्खा सिखाती रहो। हमरी दादी के हाथ के स्वाद की बर्बादी कोई कर ही नहीं सकता उनका जो स्वाद है वो किसी अमृत से कम नहीं। और हम सब मजे से खाते थे।
आज सोचती हूं तो वो बीते हुए पल बहुत याद आते हैं। याद करके अच्छा लगता है... और आंख भी भर आती है। दादी तुम्हारा अचार खत्म हो जाए, पर तुम्हारी यादें कभी खत्म ना हों। दादी के अचार को याद हम ही नहीं बाल्की आज तक जो खाया वो सब याद करता है बोलता था क्या अचार बनता था दादी वो स्वाद ही अलग था अचार तो बहुत खाए लेकिन वो स्वाद नहीं आया आप के यहाँ भी कोई ऐसा है जिसके हाथ का स्वाद आप नहीं भूले तो बताएं और उनके हाथ का आपको क्या पसंद है वह भी बताएं।